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यहां जानवर आजाद, कैद में इंसान: एम्स्टर्डम के अनोखे म्यूजियम में पिंजरे में बंद होते हैं टूरिस्ट; सिर के ऊपर दिखते हैं मगरमच्छ

म्यूजियम का नाम सुनते ही दिमाग में पिंजरों में बंद जानवर और उन्हें देखने पहुंचे लोगों की तस्वीर सामने आती है. लेकिन नीदरलैंड के एम्सटर्डम में एक ऐसा म्यूजियम है, जहां यह नजारा बिल्कुल उल्टा है. यहां जानवर खुले नजर आते हैं और उन्हें देखने आने वाले लोग लोहे की जालियों से घिरे रास्तों में चलते हैं. यहां कहीं सिर के ऊपर विशाल मगरमच्छ लटका है तो कहीं कोने में चीता आराम करता दिखाई देता है.

यहां जानवर आजाद, कैद में इंसान: एम्स्टर्डम के अनोखे म्यूजियम में पिंजरे में बंद होते हैं टूरिस्ट; सिर के ऊपर दिखते हैं मगरमच्छ
Image Credit: @artzoomuseum | एम्स्टर्डम के अनोखे म्यूजियम में पिंजरे में कैद रहते हैं पर्यटक!

आमतौर पर म्यूजियम में लोग अलग-अलग चीजों को शीशे के पीछे या सेफ डिस्टेंस पर रखे देखते हैं. जानवरों से जुड़े म्यूजियम में भी कुछ ऐसा ही इंतजाम होता है. लेकिन एम्सटर्डम का आर्ट जू म्यूजियम इस सोच से बिल्कुल अलग है. यहां का नजारा किसी भी आम म्यूजियम से बिल्कुल उल्टा है.

यहां पहुंचने वाले लोगों को ऐसा महसूस होता है, जैसे वे किसी अजीबोगरीब दुनिया में आ गए हों. जानवरों के बड़े-बड़े सैंपल अलग-अलग जगहों पर रखे हैं, जबकि उनके आसपास बने काले लोहे के पिंजरों से होकर दर्शकों को गुजरना पड़ता है. इसका मतलब है कि यहां जानवरों को देखने के लिए इंसानों को ही पिंजरे के अंदर जाना पड़ता है. यही इस म्यूजियम की सबसे खास बात है.

17वीं सदी की पुरानी इमारत में बना है म्यूजियम

एम्सटर्डम की एक पुरानी नहर के किनारे बनी 17वीं सदी की इमारत में यह म्यूजियम तैयार किया गया है. इसे नीदरलैंड के दो कलाकार याप सिंके और फेरी वैन टोंगेरेन ने मिलकर बनाया है. दोनों कलाकारों ने इस जगह को ट्रेडिशनल म्यूजियम की तरह सजाने के बजाय एक बड़ी आर्टवर्क में बदल दिया है. यहां कमरों के आसपास काले रंग की लोहे की जालियां लगाई गई हैं. इन्हीं के बीच से होकर लोग अलग-अलग जानवरों और चीजों को देखते हैं. कलाकार फेरी वैन टोंगेरेन ने एसोसिएटेड प्रेस (AP) से बातचीत में बताया कि उन्हें यह विचार पसंद आया कि सभी इंसान पिंजरे में हों और जानवर आजाद नजर आएं. उनके अनुसार, यह पूरा म्यूजियम अपने आप में एक आर्ट है.

सिर के ऊपर मगरमच्छ, कोने में आराम करता चीता

इस म्यूजियम में कदम रखते ही कई ऐसे नजारे दिखाई देते हैं, जिन्हें देखकर कोई भी कुछ पल के लिए रुक सकता है. यहां करीब 12 फीट लंबा मगरमच्छ मुंह खोले लटका हुआ है. वहीं एक कोने में चीता इस अंदाज में रखा गया है, जैसे वह आराम कर रहा हो. इसके अलावा जापान का विशाल स्पाइडर क्रैब भी यहां आकर्षण का केंद्र है. इसके पैर करीब छह फीट तक फैले हुए हैं. म्यूजियम में जानवरों की हड्डियों का भी बड़ा कलेक्शन है. यहां तक कि मैस्टोडॉन नाम के विलुप्त हो चुके हाथी जैसे जीव के अवशेष भी देखने को मिलते हैं. इन सभी चीजों को जिस अंदाज में रखा गया है, उससे लगता है कि जानवर किसी कहानी के किरदार हों और हर कमरे में उनकी अपनी अलग दुनिया बसी हो.

 

 

पुराने दौर के 'क्यूरियोसिटी कैबिनेट' से आया आइडिया

एसोसिएटेड प्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, इस म्यूजियम को तैयार करने वाले कलाकारों को पुराने समय के 'वंडरकैमर' यानी क्यूरियोसिटी कैबिनेट से आइडिया मिला है. 16वीं और 17वीं सदी में यूरोप के अमीर लोग ऐसी खास जगहें बनवाते थे, जहां दुनिया भर की अनोखी चीजें जमा करके रखी जाती थीं. इन कलेक्शन में दुर्लभ जानवर, उनकी हड्डियां, नेचर में अजीब दिखने वाली चीजें और ऐसी वस्तुएं शामिल होती थीं, जिन्हें देखकर लोग हैरान रह जाएं. सिंके और वैन टोंगेरेन ने भी इसी सोच को अपने अंदाज में आगे बढ़ाया है. वे जानवरों को सिर्फ सामान्य स्थिति में दिखाने के बजाय उन्हें अलग-अलग पोज और अंदाज में पेश करते हैं. इससे उनके सैंपल किसी तस्वीर या मूर्ति की तरह दिखाई देते हैं.

जंगल से पकड़कर नहीं लाए गए जानवर

म्यूजियम में इतने सारे जानवरों को देखकर एक सवाल उठना भी स्वाभाविक है कि आखिर इन्हें यहां लाया कहां से गया? कलाकारों का कहना है कि उनके कलेक्शन में शामिल कोई भी जानवर जंगल से पकड़कर नहीं लाया गया है. याप सिंके के अनुसार, इन जानवरों के नमूने ऐसे चिड़ियाघरों से मिले हैं, जहां उनकी प्राकृतिक कारणों से मौत हुई थी. कलाकार मुख्य रूप से यूरोप के चिड़ियाघरों से ही सैंमल जुटाते हैं, जिससे उनके बारे में जानकारी और इतिहास का पता रखा जा सके.

चार्ल्स डार्विन को मानते हैं तीसरा साथी

इस म्यूजियम की कहानी में मशहूर वैज्ञानिक चार्ल्स डार्विन का भी खास स्थान है. दोनों कलाकार उन्हें अपने काम की बड़ी प्रेरणा मानते हैं. यहां तक कि वे मजाकिया अंदाज में डार्विन को अपनी जोड़ी का तीसरा सदस्य भी बताते हैं. म्यूजियम में डार्विन की कई मूर्तियां भी रखी गई हैं. इन्हें एक अलग अंदाज में पेश किया गया है. दिलचस्प बात यह है कि जिस बिल्डिंग में आज यह म्यूजियम है, वहां पहले बाइबिल म्यूजियम हुआ करता था. ऐसे में डार्विन को दी गई यह जगह बिल्डिंग के पुराने इतिहास से बिल्कुल अलग नजर आती है.

यहां नकली समुद्री राक्षस भी देखने को मिलेंगे

म्यूजियम में रखी हर चीज वैसी नहीं है, जैसी पहली नजर में दिखाई देती है. यहां 'जेनी हैनिवर्स' नाम की अजीब आकृतियां भी मौजूद हैं. दरअसल, पुराने समय में नाविक समुद्री रे मछलियों के अवशेषों को काट-छांटकर ऐसी आकृतियां बना देते थे, जो देखने में किसी रहस्यमयी समुद्री राक्षस जैसी लगती थीं. 16वीं सदी में ऐसी चीजों को लेकर लोगों के बीच कई तरह की कहानियां प्रचलित थीं. कलाकारों ने इन्हें भी अपने कलेक्शन का हिस्सा बनाया है.

कला, इतिहास और रहस्य का अनोखा मेल

आर्ट जू म्यूजियम सिर्फ जानवरों को देखने की जगह नहीं है. यहां कला, प्राकृतिक इतिहास और पुराने दौर की अजीबोगरीब चीजें एक साथ देखने को मिलती हैं. इसकी सबसे बड़ी खासियत यही है कि यहां पहुंचकर इंसान खुद को दर्शक नहीं, बल्कि किसी अनोखी दुनिया का हिस्सा महसूस करता है. जानवरों को पिंजरे में देखने की आदत वाले लोगों के लिए यह अनुभव बिल्कुल उल्टा और यादगार हो सकता है.

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About the Author

Santosh Kumar Mishra

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संतोष मिश्रा जी न्यूज में सब एडिटर के तौर पर कार्यरत हैं. वह पिछले 4.5 वर्षों से डिजिटल मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय हैं. ट्रैवल, फीचर, ऑफबीट, ट्रेंडिंग और वायरल खबरों के साथ-साथ टेक और साइंस से जुड़ी खबरों में भी उनकी विशेष विशेषज्ञता है. उनकी खबरें अपनी विश्वसनीयता और सटीक जानकारी के लिए जानी जाती हैं. आसान और सहज भाषा में लिखे गए उनके कंटेंट को पाठक काफी पसंद करते हैं. सोशल मीडिया की दुनिया (Instagram, X, Reddit, Threads और Facebook) पर उनकी अच्छी पकड़ है. वह ट्रेंडिंग विषयों पर लगातार नजर रखते हैं और फ्रेश व यूनिक खबरें पाठकों तक पहुंचाने के लिए जाने जाते हैं. संतोष मिश्रा इससे पहले News Nation और India Ahead जैसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में भी काम कर चुके हैं. उन्होंने बुंदेलखंड विश्वविद्यालय से मास कम्युनिकेशन में पोस्ट ग्रेजुएशन (PG) किया है.
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