क्या आपने सोचा है कि अगर जनता दल अपने मूल रूप में रहता तो कांग्रेस का क्या होता? जो दल कई बार टूटने के बाद भी कई राज्यों में मजबूती से कायम है, वो अपने मूल स्वरूप में कितना शक्तिशाली होता? राजनेताओं की व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं ने जमीन से जुड़ी पार्टी को इतना कमजोर कर दिया कि वो खत्म हो गई.
कई बार पार्टी कार्यकर्ता और नेता अपने सर्वमान्य नेता के प्रति निष्ठा जताने और जनता में इसको भुनाने के लिए ऐसा प्रयोग करते हैं तो कई बार विवाद की स्थिति में भी ऐसा करना पड़ता है. जैसे: शिवसेना, एनसीपी, अपना दल और लोजपा के साथ तो कम से कम यही हुआ था.
पहले बख्तियारपुर का नाम नीतीशपुरम करने की मांग की गई, जिसे पार्टी आलाकमान ने कोई भाव नहीं दिया, लेकिन जनता दल यूनाइटेड का नाम बदलने की राय तो आलाकमान से ही आया है. देखना होगा कि संजय कुमार झा की इस राय को पार्टी कैसे लेती है.