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नीतीश संवाद यात्रा के दौरान खगड़िया में एक सभा के दौरान जनता दल यूनाइटेड के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष संजय कुमार झा ने पार्टी का नाम नीतीश कुमार के नाम पर करने का प्रस्ताव रखा था. उनका कहना था कि नीतीश कुमार के योगदानों को देखते हुए पार्टी का नाम 'जनता दल नीतीश' रखा जाना चाहिए. उनके इस प्रस्ताव पर बिहार में तरह तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं. जनता दल यूनाइटेड के कई नेताओं ने इस प्रस्ताव का स्वागत किया. अब कल शुक्रवार यानी 18 सितंबर, 2026 को जनता दल यूनाइटेड की कार्यकारिणी की बैठक होने जा रही है. बहुत संभव है कि पार्टी का नाम बदलने का प्रस्ताव इस कार्यकारिणी की बैठक में आ जाए और कोई फैसला भी ले लिया जाए. ऐसा पहली बार नहीं है कि किसी पार्टी का नाम बदलने या उसमें सर्वोच्च नेता का नाम जोड़ने की बात कही जा रही है. इससे पहले कई दलों ने अपने नाम में सर्वोच्च नेता का नाम जोड़ा है. ऐसी ही कुछ पार्टियों के बारे में हम आपको बताएंगे.
सबसे पहले अपने विभाजनकाल में देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस के एक धड़े का नाम पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के नाम पर कांग्रेस आई रखा था. आई मतलब इंदिरा गांधी माना गया था. इमरजेंसी के बाद 1977 में हुए आम चुनाव में कांग्रेस की करारी हार हुई थी, जिसके बाद पार्टी में कलह मच गई थी. तब के पार्टी अध्यक्ष के. ब्रह्मानंद रेड्डी और देवकांत बरुआ जैसे नेताओं से मतभेदों के बाद इंदिरा गांधी के समर्थकों ने नई दिल्ली में एक राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन किया और वहां अलग पार्टी का ऐलान किया गया, जिसका नाम कांग्रेस (I) रखा गया था.

ओडिशा (तब उड़ीसा) में गैर कांग्रेसी राजनीति की धुरी रहे बीजू पटनायक के नाम पर उनके बेटे नवीन पटनायक ने बीजू जनता दल का गठन किया. 17 अप्रैल, 1997 को बीजू पटनायक के निधन के बाद उसी साल 26 दिसंबर, 1997 को बीजू जनता दल की स्थापना हुई थी. स्वतंत्रता सेनानी बीजू पटनायक के आदर्शों और उनकी राजनीति विरासत को आगे बढ़ाने के लिए पार्टी बनाई गई थी. बीजू पटनायक के निधन के बाद ओडिशा में जनता दल पूरी तरह नेतृत्वविहीन हो गया था. पार्टी विधायकों और कार्यकर्ताओं में निराशा देख बीजू पटनायक के बेटे नवीन पटनायक ने अपने पिता के नाम पर बीजू जनता दल नाम की नई पार्टी बनाई थी.
आंध्र प्रदेश के लोकप्रिय मुख्यमंत्री रहे डॉ. वाईएस राजशेखर रेड्डी के आकस्मिक निधन, कांग्रेस आलाकमान से टकराव और उत्तराधिकार की लंबी लड़ाई के बाद 12 मार्च, 2011 को वाईएसआर कांग्रेस पार्टी बनाई गई थी. वैसे तो वाईएसआर कांग्रेस का नाम युवजन श्रमिक रायथू कांग्रेस पार्टी है, लेकिन यह पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. वाईएस राजशेखर रेड्डी के नाम से भी मेल खाता है. डॉ. वाईएस राजशेखर रेड्डी को राजनीति में वाईएसआर के शॉर्ट नाम से ही जाना जाता था.
दरअसल, डॉ. वाईएस राजशेखर रेड्डी के हेलीकॉप्टर दुर्घटना में मौत के बाद उनके बेटे जगनमोहन रेड्डी मुख्यमंत्री बनना चाहते थे, लेकिन आलाकमान ने तब के. रोसैया को मुख्यमंत्री बना दिया था. उसके बाद जगनमोहन रेड्डी ने पूरे राज्य में ओदारपु यात्रा निकालने का ऐलान कर दिया, लेकिन आलाकमान ने इसे अनुशासनहीनता माना और यात्रा को अनुमति देने से मना कर दिया. जगनमोहन ने आलाकमान की अनदेखी कर यात्रा निकाली, जिससे जनता में उनकी लोकप्रियता तेजी से बढ़ी. उसके बाद जगनमोहन और उनकी मां ने कांग्रेस छोड़ दी और 12 मार्च, 2011 को नई पार्टी वाईएसआर कांग्रेस अस्तित्व में आई थी.
बालासाहेब ठाकरे ने 1966 में शिवसेना नाम की एक पार्टी बनाई थी, जिसका 2022 में विभाजन हो गया था. विधायकों का एक बड़ा गुट एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में अलग धड़ा बनाकर एनडीए में शामिल हो गया था. उसके बाद दोनों गुट शिवसेना के नाम और पार्टी निशान पर दावा ठोक रहे थे. मामला चुनाव आयोग में गया. चुनाव आयोग ने पार्टी का मूल नाम शिवसेना और निशान मशाल छाप एकनाथ शिंदे गुट को दे दिया और उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाले गुट को शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) नाम दिया.
जिस तरह महाराष्ट्र में शिवसेना में बगावत हुई, उसी तरह की बगावत शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी में हुई थी. शरद पवार के भतीजे अजीत पवार ने बड़ी बगावत को अंजाम देते हुए विधायकों के एक बड़े गुट को अपने साथ मिला लिया. यह मामला भी चुनाव आयोग की चौखट पर पहुंचा और आयोग ने शिवसेना की तरह ही इस मामले को भी देखा. मूल पार्टी अजीत पवार को सौंप दी और शरद पवार के नेतृत्व वाले धड़े में उनका नाम पार्टी के मूल नाम राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के साथ जोड़ दिया. इस तरह राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी तो अजित पवार की हो गई और शरद पवार के पास जो पार्टी बची, उसका नाम एनसीपी शरद पवार हो गया.
सन् 2000 में रामविलास पासवान ने लोक जनशक्ति पार्टी की स्थापना की थी. 2020 में उनके निधन के अगले साल पार्टी में भारी बगावत हुई थी. 6 में से 5 सांसदों ने रामविलास पासवान के भाई पशुपति कुमार पारस के नेतृत्व में पाला बदल लिया था और एनडीए में शामिल हो गए थे. एक तो पिता रामविलास पासवान का निधन और फिर पार्टी में विभाजन ने चिराग पासवान को हिलाकर रख दिया था. हालांकि, वे डिगे नहीं. मामला चुनाव आयोग में गया था और उसके बाद अक्टूबर, 2021 में लोक जनशक्ति पार्टी रामविलास का गठन हुआ था. हालांकि, चुनाव आयोग ने मूल लोक जनशक्ति पार्टी का नाम और उसके चुनाव चिह्न बंगला छाप को फ्रीज कर लिया था.
4 नवंबर, 1995 को कांशीराम के पूर्व सहयोगी सोनेलाल पटेल ने अपना दल की स्थापना की थी. सोनेलाल पटेल के निधन के बाद रोहनिया विधानसभा सीट पर उपचुनाव में कृष्णा पटेल हार गई थीं. 2015 में कृष्णा पटेल ने अनुप्रिया पटेल को पार्टी विरोधी हरकतों का आरोप लगाकर निष्कासित कर दिया. कृष्णा पटेल और बेटी अनुप्रिया पटेल के बीच पारिवारिक विवाद के बाद अपना दल सोनेलाल अस्तित्व में आया. दोनों गुटों ने चुनाव आयोग के सामने मूल पार्टी अपना दल और उसके चुनाव चिह्न कप और प्लेट पर दावा ठोका. उसके बाद आयोग ने पार्टी के नाम और प्रतीक को फ्रीज कर दिया. 2017 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले अनुप्रिया पटेल ने अपना दल सोनेलाल नाम से एक नई पार्टी बनाई. दूसरी ओर, कृष्णा पटेल और उनकी दूसरी बेटी पल्लवी पटेल ने खुद की पार्टी को अपना दल कमेरावादी बनाया था.
छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ (जे.) नाम से पार्टी बनाई थी. आम बोलचाल की भाषा में इसे जोगी कांग्रेस भी कहा जाता है. राज्य में कांग्रेस के भीतर चल रही गुटबाजी, अंतागढ़ टेप कांड और जोगी परिवार के निष्कासन के बाद यह पार्टी अस्तित्व में आई थी.