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कांग्रेस अध्यक्ष ने बीजेपी को यह मौका ऐसे वक्त में दिया है, जब इंडिया गठबंधन खुद एक नवंबर को दिल्ली में सरकार के खिलाफ बड़े स्तर पर रैली करने की तैयारी में है. इसलिए आप इसे मल्लिकार्जुन खरगे का सेल्फ गोल भी कह सकते हैं. यही कारण है कि कांग्रेस के जिस कार्यकर्ता की वजह से खरगे ने ये बयान दिया, वो अंडरग्राउंड हो गया है. हालांकि, कांग्रेस तर्क दे रही है कि खरगे ने वैसी ही भाषा का प्रयोग किया है, जैसी भाषा बीजेपी के नेता बोलते हैं.
गृहमंत्री अमित शाह पर विवादित टिप्पणी को लेकर आज ही राहुल गांधी को आठ साल पुराने केस में राहत मिली है. लेकिन कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के एक बयान पर राजनीतिक महाभारत छिड़ी हुई है. बीजेपी के नेता देशभर में सड़कों पर उतरकर कांग्रेस के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं.
बीजेपी ने सोशल मीडिया पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रंगीन चश्मे वाली एक तस्वीर के साथ संदेश जारी किया है, जिसमें लिखा है कि पीएम मोदी कहीं नहीं जाएंगे. वह तीसरी बार प्रधानमंत्री चुने गए हैं. उनके पास हमारे वोट हैं, भाई. कुछ ऐसा जो तुम्हारे मालिक के पास कभी नहीं होगा.
बीजेपी ने यह तस्वीर जारी करके कांग्रेस, मल्लिकार्जुन खरगे और राहुल गांधी के नाम जेन-जी अंदाज में जो संदेश दिया है, उसकी वजह कांग्रेस अध्यक्ष का क्रोध से भरा एक बयान है.
मल्लिकार्जुन खरगे के अमर्यादित शब्द बीजेपी को शूल की तरह चुभ गए हैं. खरगे तब पटना में थे. बिहार के पहले मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण सिंह की जयंती पर कांग्रेस ने एक कार्यक्रम आयोजित किया था. उसी कार्यक्रम में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे पहुंचे थे. खरगे अपने संबोधन के दौरान केंद्र से बीजेपी की सरकार को हटाने का आह्वान कर रहे थे. इसी दौरान एक कार्यकर्ता ने पीछे से चिल्लाते हुए कहा कि जब तक विद्रोह नहीं होगा, तब तक नरेंद्र मोदी नहीं हटेंगे. लेकिन खरगे साहब ने सिर्फ उसका दूसरा हिस्सा सुना और वे हत्थे से उखड़ गए.
सुना आपने. वह कहीं से भी यह नहीं कह रहा था कि मोदी सरकार को हटाना असंभव है. वह तो इसका जिक्र कर रहा था कि सरकार कैसे हटेगी, लेकिन खरगे साहब ने सिर्फ आधी बात सुनी. वह अपने ही कार्यकर्ता को पहचान नहीं पाए और फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लेकर शाब्दिक मर्यादा को विसर्जित कर दिया. सवाल है कि खरगे साहब ने अपने कार्यकर्ता को धैर्य से क्यों नहीं सुना? क्योंकि जब वो सुनते तो पता चलता कि संतोष कुमार भी उनकी ही विचारधारा का वाहक है.
हॉल के अंदर कांग्रेस के नेताओं ने खरगे से संवाद करने वाले संतोष कुमार को धक्का देकर बाहर कर दिया. जब वह बाहर निकला, तो उसने बताया कि वह कांग्रेस का ही कार्यकर्ता है. वह भी बीजेपी की सरकार के खिलाफ ही लड़ रहा है. हालांकि, जब से संतोष कुमार ने खरगे को जवाब दिया है, तब से वो अंडरग्राउंड हैं.
संतोष कुमार छपरा के रहने वाले हैं. लेकिन वह कांग्रेस संगठन से किस स्तर पर जुडे हुए हैं और अभी कहां हैं, इस पर न तो कांग्रेस के प्रदेश स्तर के नेता कुछ बोल रहे हैं और न ही जिला स्तर पर कोई जवाब मिल रहा है. यहां तक कि कांग्रेस के सांसद अखिलेश प्रसाद सिंह, जिन्होंने यह कार्यक्रम आयोजित किया था, वे भी कैमरे के सामने आकर कुछ नहीं बोल रहे हैं.
जी न्यूज़ की टीम ने भी अपने स्तर पर संतोष कुमार को तलाश करने की कोशिश की. जिस संतोष के कारण आज खरगे असंतोष से भर गए और बीजेपी सड़क पर उतरी हुई है, वो अंडरग्राउंड हैं. उनके बारे में कोई बोलने के लिए तैयार नहीं है. सोचिए, यह कैसे संभव है कि जिला स्तर पर भी वहां के नेताओं को संतोष के बारे में पता नहीं होगा? और अगर कोई कुछ नहीं जानता, तो फिर मीडिया के सामने आकर क्यों नहीं बोलता कि संतोष का कांग्रेस से कोई संबंध नहीं है? इन सवालों के बीच बीजेपी को बड़ा मौका मिल गया है.
कहते हैं कि राजनीति में सिर्फ सही होना काफी नहीं होता. सही वक्त पर होना और उस अवसर को पकड़ लेना भी अहम होता है. बीजेपी ने यही किया है. पटना में जैसे ही मल्लिकार्जुन खरगे ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लेकर अमर्यादित शब्दों का प्रयोग किया, वैसे ही बीजेपी के नेताओं ने इसे लपक लिया. पहले तो बीजेपी के नेताओं ने कांग्रेस अध्यक्ष के बयान पर आपत्ति जताई और फिर देशभर में सड़कों पर उतरने का फैसला किया.
सोमवार को समूचे देश में बीजेपी के नेता सड़क पर उतरे हुए हैं. पटना, दिल्ली, भोपाल, वाराणसी, जम्मू से लेकर बेंगलुरु और हैदराबाद तक, हर जगह विरोध प्रदर्शन हुआ. बीजेपी के कार्यकर्ताओं ने मल्लिकार्जुन खरगे का पुतला जलाया.
आचार्य चाणक्य का मानना था कि राजनीति में शासक या नेता की जीभ ही उसका सबसे बड़ा अस्त्र है और वही उसका सबसे बड़ा शत्रु भी. अत्यधिक बोलना और असमय बोलना अपनी ही सेना और साम्राज्य के विनाश को निमंत्रण देना है. असमय क्रोध क्रोध करके कांग्रेस अध्यक्ष ने बीजेपी को बैठे-बिठाए एक नया मुद्दा दे दिया.
यह कोई पहली बार नहीं है, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के माता-पिता को लेकर इस तरह की व्यक्तिगत टिप्पणी की गई हो. फरवरी 2023 में पार्टी के प्रवक्ता पवन खेड़ा ने पीएम मोदी के पिता के नाम का मजाक उड़ाया था. 2018 में राज बब्बर ने पीएम मोदी की मां के लिए अशोभनीय टिप्पणी की थी. कांग्रेस के पूर्व केंद्रीय मंत्री विलास मुत्तेमवार ने भी उसी साल पीएम मोदी के पिता को लेकर अमर्यादित टिप्पणी की थी. अब इस बार मल्लिकार्जुन खरगे ने न्यूनतम मर्यादा का तर्पण कर दिया है.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से राजनीतिक प्रतिद्वंदिता है. अगर किसी की निजी कटुता भी है तो वो सार्वजिक स्तर पर नहीं दिखना चाहिए था. शब्दों में शालीनता ही वैचारिक परिपक्वता को दर्शाती है. किसी के साथ भी संवाद करते समय या किसी पर टिप्पणी करते समय ऐसे शब्दों से बचना चाहिए, जिन्हें अगर कोई पलटकर आपको कह दे, तो आपको भी बुरा लगे. लेकिन अति-महत्त्वाकांक्षा और दूसरों को नीचा दिखाने की लालसा में हमारे देश के नेता अक्सर शाब्दिक मर्यादाओं का पिंडदान करते रहे हैं.
आपको जानकर ताज्जुब होगा कि जिस दौर के नेताओं को शाब्दिक मर्यादा बनाए रखने के लिए जाना जाता है, उसी दौर में ही अपमानजनक शब्दों का चलन भी शुरू हो गया था. 1958 में लोकसभा के एक सांसद ने प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की तुलना नाथूराम गोडसे से की थी. इस टिप्पणी को संसदीय रिकॉर्ड से हटा दिया गया. 1966 में समाजवादी नेता डॉक्टर राम मनोहर लोहिया ने संसद में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को 'गूंगी गुड़िया' कहा. इसे स्वतंत्र भारत की राजनीति के शुरुआती और व्यक्तिगत अपमान माना जाता है.
1969 में मोरारजी देसाई ने इंदिरा गांधी की अपरिपक्वता बताने के लिए स्तरहीन शब्द का इस्तेमाल किया था. यह उस दौर में एक राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी के लिए गरिमा से नीचे की टिप्पणी मानी गई थी. बाद के दिनों में राजनीति में मर्यादा की लकीर मिटती गई और राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों के बीच अपशब्दों की प्रतियोगिता शुरू हो गई. अब यह रोग कमोबेश सर्वदलीय हो चुका है. देश की शायद ही कोई पार्टी बची हो, जो अपने विरोधियों के लिए अमर्यादित भाषा का प्रयोग नहीं करती हो. हर दल के नेताओं के शब्दकोश में 'नीच' और 'स्तरहीन' जैसे शब्द भरे पड़े हैं, जिनका वे समय-समय पर प्रयोग करते हैं.
दुर्भाग्य देखिए, देश के प्रधानमंत्री पर अमर्यादित टिप्पणी होने के बावजूद कांग्रेस के नेता उस बयान का बचाव कर रहे हैं. सोचिए, जो नेता प्रधानमंत्री पर व्यक्तिगत टिप्पणी करते हुए मर्यादा की लकीर लांघ रहा है और कोई उसका समर्थन भी कर रहा है, तो ऐसे में लोकतंत्र की सुरक्षा कैसे होगी?
दूसरे देशों में राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों को व्यक्तिगत रूप से अपमानित करने का चलन रहा है. ब्रिटिश संसद अपनी तीखी बहसों के लिए जानी जाती है, जहां सांसद एक-दूसरे पर बेहद कड़े और अपमानजनक व्यक्तिगत तंज कसते हैं. ब्राजील, फिलीपींस और वेनेजुएला जैसे देशों के राष्ट्र प्रमुखों के ऐसे कई सार्वजनिक बयान दर्ज हैं, जिनमें उन्होंने खुलेआम मंचों से गालियों और बेहद आपत्तिजनक शब्दों का प्रयोग किया है. लेकिन सांस्कृतिक रूप से समृद्ध हमारे देश में जिस तरह यह रोग फैल रहा है, वह बहुत ही चिंताजनक है.
चिंताजनक इसलिए भी है क्योंकि साल 2025 में दुनिया के 179 देशों में राजनीतिक दलों द्वारा नफरत फैलाने वाले भाषण देने के मामले में भारत 16वां सबसे खराब देश था. इसमें राष्ट्रीय हो या क्षेत्रीय हर दल के नेताओं का योगदान है.
देश का कोई भी दल हो, कोई बड़ा से बड़ा नेता हो, वह कितना भी लोकप्रिय हो, लेकिन अगर वह न्यूनतम मर्यादा का सम्मान भी नहीं कर पा रहा है, तो उसे अवश्य आत्ममंथन करना चाहिए. ऐसे नेताओं को सोचना चाहिए कि वे देश को किस स्तर पर नुकसान पहुंचा रहे हैं. हालांकि, मल्लिकार्जुन खरगे के बयान से उनकी पार्टी को भी नुकसान पहुंचा है.