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राजनीति में बयान और बयानों की टाइमिंग बहुत मायने रखती है. कभी शब्दों से विवाद खड़ा हो जाता है तो कभी कोई शब्द या नाम बहस का मुद्दा बन जाता है. जैसे, अब्दुल को ही ले लीजिए. इन दिनों अब्दुल शब्द राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में है. यूपी चुनाव से पहले ओवैसी की जुबान पर भी अब्दुल है और अमेरिका में मिडटर्म इलेक्शन में यूएस प्रेसिडेंट डॉनल्ड ट्रंप की जुबान पर भी अब्दुल है. आखिर अमेरिका में रहकर ट्रंप अब्दुल का नाम क्यों ले रहे हैं, ये हम आपको आगे बताएंगे.
पहले, ये समझिए कि ओवैसी के लिए यूपी में अब्दुल इतना जरूरी क्यों हो गया है? AIMIM के अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी चुनाव की घोषणा से पहले ही यूपी में ताल ठोक रहे हैं. मुस्लिम आबादी वाले इलाकों में घूम-घूमकर वो जनसभाएं कर रहे हैं. अपनी हर सभा में ओवैसी मुस्लिम हित और मुस्लिमों की राजनीतिक हिस्सेदारी बढ़ाने की बात कर रहे हैं और इसके लिए उन्होंने अब्दुल को चेहरा बनाया है.
ओवैसी के 'अब्दुल'..ट्रंप के भी 'अब्दुल' UP से USA..'अब्दुल' क्यों है चर्चा में? हर कोई..'अब्दुल' को क्यों खोज रहा है? https://t.co/0TBsaEN4Wn
— Zee News (@ZeeNews) October 26, 2026
आप सोच रहे होंगे कि ये अब्दुल है कौन. आखिर ओवैसी क्यों कह रहे हैं कि अब्दुल दरी नहीं बिछाएगा. ओवैसी किस अब्दुल को नेता, विधायक और सांसद बनाना चाहते हैं. मुसलमानों के हक की बात करने वाले ओवैसी सिर्फ अब्दुल का ही जिक्र बार बार क्यों कर रहे हैं. वो अली क्यों नहीं कह रहे. रहमान, सलमान क्यों नहीं कह रहे. अख्तर का नाम क्यों नहीं ले रहे हैं. इन सवालों का जवाब हमने मुस्लिम धर्मगुरुओं से भी जानने की कोशिश की.
इसी कोशिश के दौरान, हमारी मुलाकात आज कुछ ऐसे लोगों से भी हुई जिनका नाम अब्दुल है. उनकी बात भी आपको बताएंगे. लेकिन, इन सवालों का जवाब उस राजनीतिक इतिहास में भी छिपा है. जिसने अब्दुल को एक आम नाम से आगे बढ़ाकर मुस्लिम मतदाता के प्रतीक के तौर पर इस्तेमाल करना शुरू कर दिया.
दिसंबर 2022 में उत्तर प्रदेश के रामपुर विधानसभा में उपचुनाव हो रहा था. इस चुनाव में प्रचार के दौरान तत्कालीन उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक ने एक सभा में कहा था कि बड़े मियां से कह दो, अब्दुल अब उनका हुक्का नहीं भरेगा. इसके बाद आज़म ख़ान के पूर्व मीडिया प्रभारी फसाहत अली ख़ान शानू ने बीजेपी में शामिल होने के बाद ये जुमला दिया था.. 'अब्दुल अब दरी नहीं बिछाएगा.' ये नारा उस वक्त काफी चर्चित हुआ था.
इस जुमले के जवाब में आज़म ख़ान ने तंज कसते हुए कहा था, 'अब्दुल अब दरी ही नहीं बिछाएगा, बल्कि पोछा भी लगाएगा.' यहीं से अब्दुल शब्द मुस्लिम वोटबैंक का प्रतीक बन गया और राजनीतिक भाषणों में इसे मुस्लिम समुदाय और उसके वोटों का प्रतीक बनाकर इस्तेमाल किया जाने लगा.
अब चार साल बाद असदुद्दीन ओवैसी ने वही पुराना जुमला उठाकर अपने अंदाज में पेश कर दिया. यहां आपको ये समझना चाहिए कि ओवैसी ने अब्दुल का नाम लेकर क्या संदेश देने का प्रयास किया है. पहला, मुस्लिम मतदाता की राजनीतिक अहमियत. दूसरा, राजनीतिक दलों के लिए काम करने और खुद राजनीतिक नेतृत्व हासिल करने के बीच का फर्क और तीसरा, मुस्लिम वोटों के आधार पर राजनीति करने वाले दलों को चुनौती देने की कोशिश.
ओवैसी अब्दुल का नाम लेकर मुस्लिम समुदाय तक अपना राजनीतिक संदेश पहुंचाने का प्रयास कर रहे हैं. लेकिन क्या उनका संदेश पहुंच रहा है. भारत में अब्दुल की अहमियत के बाद अब समझिए, अमेरिका में अब्दुल क्यों अहम हो गया है?
अमेरिका में 3 नवंबर को अमेरिका में मिड टर्म चुनाव के लिए वोटिंग होने वाली है. लेकिन इससे ठीक पहले यूएस प्रेसिडेंट डोनाल्ड ट्रंप अब्दुल नाम लेकर अपने विरोधियों पर निशाना साध रहे हैं. ट्रंप ने मिशिगन के डेमोक्रेटिक उम्मीदवार अब्दुल अल सय्यद का नाम लेकर अपने विरोधियों पर निशाना साधा है.
ट्रंप जहां भी रैली कर रहे हैं, वहां पर अब्दुल अल सय्यद का नाम ले रहे हैं. उनपर मुस्लिम ब्रदरहुड से जुड़े होने का आरोप लगा रहे हैं. यहां ट्रंप अब्दुल का नाम लेकर चुनाव में बढ़त हासिल करने का प्रयास कर रहे हैं. दो देश. दो अलग अलग चुनाव. लेकिन दोनों में नाम एक ही- अब्दुल.