)
जनता दल यूनाइटेड की आज शुक्रवार को प्रबोधन बैठक चल रही है. इस बैठक में पार्टी का नाम जनता दल नीतीश करने पर भी चर्चा हो सकती है. पिछले दिनों खगड़िया में नीतीश संवाद यात्रा के दौरान पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष संजय कुमार झा ने इसका प्रस्ताव दिया था, जिस पर पार्टी का कहना था कि कार्यकारिणी और राष्ट्रीय परिषद की बैठक में इस पर विचार किया जा सकता है. जनता दल यूनाइटेड को मूल जनता दल की दूसरी पीढ़ी का दल कहा जा सकता है. पहले इसका नाम समता पार्टी था, लेकिन शरद यादव के साथ आने के बाद पार्टी का नाम जनता दल यूनाइटेड कर दिया गया था. अब आपके जेहन में सवाल होगा कि मूल जनता दल आज कहां है और किस रूप में है? है भी कि नहीं? ये सब जानने से पहले यह जान लेते हैं कि जनता दल कैसे बना था और कैसे बिखरता चला गया.

कैसे बना था जनता दल?
बोफोर्स का मुद्दा उछालने के चक्कर में कांग्रेस ने वीपी सिंह को जब निकाला, तब उसे अंदाजा भी नहीं था कि यह व्यक्ति 415 सीटों के विशाल बहुमत से सत्ता में आई राजीव गांधी की सरकार को उखाड़ फेंकेगा. कांग्रेस से निकाले जाने के बाद वीपी सिंह ने अरुण नेहरू, आरिफ मोहम्मद खान और मुफ्ती मोहम्मद सईद जैसे असंतुष्ट कांग्रेसियों के साथ मिलकर जनमोर्चा बनाया था. यह मोर्चा कोई राजनीतिक दल नहीं था. यह एक दबाव समूह के रूप में बनाया गया था, जिसका मकसद भ्रष्टाचार के खिलाफ और सत्ता के विकेंद्रीकरण के लिए जनमत तैयार करना था.
11 अक्टूबर, 1988 को बेंगलुरू में जनमोर्चा, चौधरी देवीलाल और चौधरी अजीत सिंह के धड़ों वाले दोनों लोकदल, जनता पार्टी और कांग्रेस एस. का विलय कर जनता दल की स्थापना की गई थी. 11 अक्टूबर का दिन इसलिए चुना गया था, क्योंकि इस दिन लोकनायक जयप्रकाश नारायण का जन्मदिन है. वीपी सिंह को जनता दल का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया गया. चुनाव आयोग ने जनता दल को चक्र चुनाव निशान आवंटित किया था.
जनता दल के गठन के बाद इसके नेताओं ने तेलुगुदेशम, असम गण परिषद और डीएमके को मिलाकर राष्ट्रीय मोर्चा बनाया था. 1989 के लोकसभा चुनाव में जनता दल ने अनोखी नीति अपनाई थी. उसने एक तरफ दक्षिणपंथी भारतीय जनता पार्टी से भी हाथ मिला लिया था और दूसरी ओर धुर वामपंथी लेफ्ट फ्रंट को भी साथ ले लिया था. नतीजा यह हुआ कि कांग्रेस मात्र 197 सीटों पर सिमट गई और जनता दल के नेता वीपी सिंह के नेतृत्व में रामो वामो की सरकार बनी थी. रामो मतलब राष्ट्रीय मोर्चा और वामो मतलब वाम मोर्चा.
एक साल बाद ही टूट गई थी पार्टी
युवातुर्क कहे जाने वाले चंद्रशेखर ने 1990 में वीपी सिंह सरकार से बगावत कर दी थी और 64 सांसदों को साथ लेकर कांग्रेस के बाहरी समर्थन से अपनी सरकार बनाई. इस तरह जनता दल बनने के एक साल बाद ही इसमें विभाजन हो गया. चंद्रशेखर ने तब अपनी पार्टी का नाम जनता दल समाजवादी रखा था. हालांकि बाद में उन्होंने अपनी पार्टी का नाम बदलकर समाजवादी जनता पार्टी कर दिया था.
1999 में खत्म हो गया था मूल जनता दल
हालांकि, 1996 में जनता दल को एचडी देवगौड़ा के रूप में दूसरा प्रधानमंत्री मिल गया था. नीतिगत मुद्दे को लेकर कांग्रेस ने समर्थन वापस ले लिया तो जनता दल की ओर से इंद्र कुमार गुजराल को प्रधानमंत्री बनाया गया था. इस तरह एक दशक के भीतर जनता दल ने देश को 3 प्रधानमंत्री दिए थे. हालांकि, 1999 में जनता दल पूरी तरह समाप्त हो गया और उसका चुनाव निशान भी फ्रीज कर दिया गया था.
दरअसल, 1999 में जनता दल दो टुकड़ों में बंट गया था. एक धड़ा तब भारतीय जनता पार्टी के साथ जाने को इच्छुक था, जिसका नेतृत्व शरद यादव कर रहे थे, तो दूसरा धड़ा जिसका नेतृत्व पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा कर रहे थे, इस दक्षिणपंथी पार्टी के साथ नहीं जाना चाहता था. इस तरह मूल जनता दल दो अलग अलग दलों में बंट गया: जनता दल यूनाइटेड और जनता दल सेक्युलर.
बाद में, समता पार्टी का जनता दल यूनाइटेड में विलय हो गया था. जनता दल यूनाइटेड बिहार तक सिमट गया तो जनता दल सेक्युलर केवल कर्नाटक तक सीमित रहा. इस तरह मूल जनता दल का आज अस्तित्व नहीं है, लेकिन वो अपने बिखरे हुए कुनबे के साथ आज भी जिंदा है.
मोदी सरकार आने के बाद शुरू हुई थी विलय की कवायद
2014 में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी ने अकेले अपने दम पर बहुमत हासिल किया तो क्षेत्रीय दलों को खुद पर खतरा महसूस होने लगा था. तब मुलायम सिंह के नेतृत्व में जनता दल के सभी टूटे हुए तिनकों को एक करने की कवायद शुरू हुई थी. नई दिल्ली में मुलायम सिंह यादव के घर पर 6 दलों जैसे समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल, जनता दल सेक्युलर, जनता दल यूनाइटेड, इंडियन नेशनल लोकदल और समाजवादी जनता पार्टी के नेताओं का जुटान हुआ था.
इन सभी दलों के नेताओं ने मुलायम सिंह यादव को अपना नेता माना था और विलय की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने की कवायद शुरू हुई थी. हालांकि, उसी साल बिहार विधानसभा चुनाव में राष्ट्रीय जनता दल, जनता दल यूनाइटेड और कांग्रेस के बीच सीटों के तालमेल से नाराज होकर समाजवादी पार्टी ने खुद को इस प्रक्रिया से अलग कर लिया था.
दरअसल, बिहार विधानसभा चुनाव, 2015 में राष्ट्रीय जनता दल और जनता दल यूनाइटेड ने 243 में से 100 सीटें आपस में बांट ली थीं और 40 सीटें कांग्रेस को दी थीं. समाजवादी पार्टी को केवल 3 सीटें ऑफर की गई थीं. समाजवादी पार्टी ने इसे मुलायम सिंह और पार्टी के कद का अपमान माना और विलय की प्रक्रिया वहीं रुक गई थी.
सूख गया जनता दल रूपी वटवृक्ष
इस तरह, जिस जनता दल के वटवृक्ष से इतने सारे दल पैदा हुए और कांग्रेस विरोध और मंडल आंदोलन की राजनीति को जीवन मिला था, वो अपने ही नेताओं की व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं की भेंट चढ़ गई और वो मूल पेड़ ही सूख गया, जिसके तले ये नेता राजनीति कर रहे थे. हालांकि, जनता दल से निकले दल आज भी अपने अपने राज्यों में मजबूत स्थिति में हैं. कुछ दल सत्ता में साझीदार हैं तो कुछ मुख्य विपक्षी पार्टी का तमगा लिए घूम रहे हैं.