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Shardiya Navratri 2026 Kaal Bhairav Puja: हिंदू धर्म के प्रमुख त्योहारों में से एक है शारदीय नवरात्र जिससे जुड़ी अनेक मान्यताएं हैं. मां दुर्गा की उपासना के इस पर्व पर काल भैरव की आराधना का भी बड़ा महत्व बताया गया है. ऐसी मान्यता है कि मां की पूजा तभी पूर्ण मानी जाती है जब तक काल भैरव की पूजा न कर ली जाए. यही कारण है कि नवरात्रि की तिथियों पर मां दुर्गा की विशेष पूजा करते हुए कई भक्त काल भैरव की भी पूजा करते हैं. जिससे मां को प्रसन्न होती हैं. अष्टमी या नवमी तिथि पर जब कन्या पूजन में नौ कन्याओं को बुलाया जाता है तो इसमें बटुक भैरव के रूप में एक बालक को भी बुलाया जाता है. ऐसे में नवरात्र में मां दुर्गा की पूजा करते समय काल भैरव की पूजा करने का महत्व कहीं अधिक बढ़ जाता है. आइए इस लेख में विस्तार से जानें कि काल भैरव का शक्तिपीठ से संबंध क्या है और कैसे शिव जी के इस उग्र रूप का जन्म हुआ?
पौराणिक कथा है कि एक बार ब्रह्मा, विष्णु और महेश के बीच विवाद शुरू हुआ कि श्रेष्ठ कौन है. जिसे सुलझाने के लिए ऋषि-मुनियों ने विचार किया कि भगवान शिव ही सर्वोच्च हैं. हालांकि, भगवान ब्रह्मा को यह बात स्वीकार्य नहीं था. ऐसे में उन्होंने भगवान शिव का अपमान करना चाहा. जिससे भगवान शिव क्रोधित हो गए और उनके क्रोध से ही उसके रौद्र रूप काल भैरव का आवतार हुआ. वहीं, इसके इतर भी शिव पुराण और अन्य शैव परंपराओं में शिव जी के काल भैरव रूप के प्राकट्य संबंधी कथाएं हैं. जिनमें से एक कथा देवी सती से जुड़ी है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, उनका स्वरूप भले ही उग्र हो लेकिन सच्चे मन से उनकी जो भी उपासना करता है काल भैरव उसकी रक्षा करते हैं.
एक और कथा है कि देवी सती बिना बुलावे के ही अपने पिता दक्ष प्रजापति के यहां यज्ञ आयोजन में चली गई. इस यज्ञ आयोजन में राजा दक्ष ने शिव जी के बारे में अनरगल बातें बोली और उनका अपमान किया. जिसे देवी सती क्रोधित हो गए और यज्ञ कुंड में ही अग्नि स्नान कर लिया. वहीं दूसरी ओर जब पूरी घटना के बारे में शिव जी को पता चला वो क्रोध से भर गए. उनके इसी क्रोध से उनके उग्र रूप से काल भैरव की उत्पत्ति हुई जिसे उन्होंने यज्ञ स्थल पर भेजा. काल भैरव के रौद्र रूप को देख देवी-देवता, ऋषि सब डर गए. काल भैरव ने बिना देर किए राजा दक्ष के सिर को काट दिया. थोड़ी देर में वहां भगवान शिव आए और देवी सती के देह को लेकर पूरे ब्रह्माण्ड में घूमने लगे. उनकी ऐसी स्थिति देख विष्णु जी ने अपने चक्र से देवी सती को अपने चक्र की सहायता से 51 भाग में बांट दिया. जहां-जहां देवी के अंग गिरे वहां-वहां शक्तिपीठ बन गए. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार शिव जी ने काल भैरव को देवी के सभी शक्तिपीठों की सुरक्षा के लिए तैनात कर दिया. यही कारण है कि उन्हें माता का रक्षक और द्वारपाल कहा जाता है. ध्यान दें धार्मिक परंपराओं में शक्तिपीठों की संख्या के साथ ही उसकी मान्यताओं को लेकर अंतर होना संभव है.
काल भैरव भगवान शिव का उग्र स्वरूप हैं जिसके कारण उनकी पूजा तंत्र साधना से संबंधित है. लेकिन ऐसा नहीं है कि गृहस्थ के लिए काल भैरव की पूजा पूरी तरह से वर्जित है. धार्मिक मान्यता है कि गृहस्थ जीवन जीने वाले लोग काल भैरव के बाल रूप यानी बटुक भैरव की पूजा कर सकते हैं. खासकर नवरात्र पर्व में बटुक भैरव की उपासना करने का विधान है. जो नियमित पूजा की तरह ही होता है जो सरल विधियों के द्वारा ही की जाती है. काल भैरव की पूजा श्रद्धा भाव और नियम अनुसार करें तो जीवन की परेशानियों का अंत हो सकेगा. मन का भय भी दूर होगा.
(Disclaimer: यहां दी गई जानकारी धार्मिक मान्यताओं, शिव पुराण और लोक कथाओं पर आधारित है। इसका उद्देश्य केवल जानकारी देना है, वैज्ञानिक प्रमाण नहीं.)