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दुर्गा सप्तशती मां दुर्गा को समर्पित बेहद ताकतवर पाठ है. जिसका पाठ देवी मां के भक्त नवरात्र में या रोजाना भी करते हैं. मां दुर्गा की कृपा दिलाने वाले, मनोकामनाएं पूरी करने वाले दुर्गा सप्तशती पाठ के लेखक कौन हैं और कैसे उनके भक्ति के आगे यमराज भी झुक गए और उन्हें बिना प्राण लिए खाली हाथ लौटना पड़ा, इसकी बेहद रोचक कहानी है. आइए जानते हैं महर्षि मार्कंडेय की कहानी.
सतयुग में भृगु वंश के ऋषि मृकण्डु (मृकंद) और उनकी पत्नी मरुदमती (मानस्विनि) के घर हुआ था. ऋषि और उनकी पत्नी लंबे समय तक नि:संतान थे. फिर ऋषि मृकण्डु ने भगवान शिव की खूब तपस्या की और संतान देने की प्रार्थना की. तब शिव जी ने उन्हें संतान को लेकर 2 विकल्प दिए. पहला - संतान अल्पायु होगी लेकिन परमज्ञानी और गुणवान होगी. दूसरा - संतान दीर्घआयु होगी लेकिन वो सामान्य होगी, उसमें ऐसे कोई विशेष गुण नहीं होंगे. तब ऋषि मृकण्डु ने पहला विकल्प चुना.
ऋषि मृकण्डु के घर पुत्र हुआ, जिसका नाम मार्कंडेय रखा गया. मार्कंडेय बचपन से ही परमज्ञानी और शिव भक्त थे. जब वह 16 साल के हुए तो उनके प्राण लेने स्वयं यमराज पहुंच गए क्योंकि उनकी मृत्यु 16 साल में तय थी. लेकिन मार्कंडेय ऋषि परम शिव भक्त थे. जैसे ही यमराज उन्हें लेने पहुंचे वे महामृत्युंजय मंत्र का जाप करते हुए शिवलिंग से लिपट गए.
यमराज ने जैसे ही मार्कंडेय ऋषि के प्राण लेने के लिए पाश फेंका, तो वह पाश शिवलिंग पर भी लग गया. इससे शिवलिंग से शिव जी प्रकट हो गए. उन्होंने अपने भक्त को बचाने के लिए आयु बंधन से मुक्त कर दिया और चिरायु होने का वरदान भी दिया. इसलिए कई पुराणों में मार्कंडेय ऋषि को चिरंजीवी कहा गया है.
मार्कंडेय ऋषि बेहद विद्वान थे. उनके नाम पर महर्षि वेद व्यास ने मार्कंडेय पुराण लिखा. इस पुराण में महर्षि मार्कंडेय के महर्षि जैमिनी और महर्षि क्रॉष्टुकी के बीच मां दुर्गा के महात्म्य पर जो चर्चा हुई है, उसका पूरा संकलन किया गया है. मार्कंडेय पुराण में ही दुर्गा सप्तशती पाठ है. मार्कंडेय पुराण में 137 अध्याय और करीब 9 हजार श्लोक हैं, जिसका हिस्सा दुर्गा सप्तशती बेहद प्रसिद्ध है. इस पूरे पाठ में मां दुर्गा की महिमा का गुणगान किया गया है.
इस तरह से दुर्गा सप्तशती के रचनाकर महर्षि मार्कंडेय हैं, लेकिन उसको लिपिबद्ध महर्षि वेदव्यास ने किया है.
(Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारी धार्मिक ग्रंथों, पौराणिक कथाओं और पारंपरिक मान्यताओं पर आधारित है. अलग-अलग ग्रंथों और परंपराओं में कथा के विवरण भिन्न हो सकते हैं. इसका उद्देश्य धार्मिक एवं सांस्कृतिक जानकारी प्रदान करना है.)