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मां दुर्गा की कृपा पाने के लिए दुर्गा चालीसा का पाठ करना बहुत लाभदायी माना गया है. देवी मां के भक्त नवरात्र में या रोजाना दुर्गा चालीसा पढ़ते हैं. जिसमें देवी मां की शक्ति और महिमा का गुणगान किया गया है. क्या आप जानते हैं कि जिस दुर्गा चालीसा का पाठ करते हैं, उसे किसने लिखा है, उसके रचियता कौन हैं? जबकि दुर्गा चालीसा के आखिरी दोहे में इसके रचयिता का नाम भी आता है, लेकिन कम ही लोग इस पर ध्यान देते हैं.
दुर्गा चालीसा के लेखक महाकवि देवीदास हैं, जो कि मां दुर्गा के अनन्य उपासक थे. हालांकि उनके बारे में विस्तृत जानकारी के लिए कोई दस्तावेज या जीवनी उपलब्ध नहीं है. लेकिन दुर्गा चालीसा के अंत में उन्होंने खुद को मां दुर्गा के चरणों का सेवक बताते हुए अपना नाम मेंशन किया.
दुर्गा चालीसा कब लिखी गई इसे लेकर सही समय का कहीं उल्लेख नहीं मिलता है. लेकिन इतिहासकारों के अनुसार, यह रचना मध्यकाल में की गई. यह वो समय था जब संस्कृत की बजाय अवधी या ब्रज भाषा में देवी-देवताओं के आरती-चालीसा लिखने की परंपरा चरम पर थी. दुर्गा चालीसा किसी ग्रंथ का हिस्सा नहीं है, बल्कि यह पीढ़ी-दर-पीढ़ी मौखिक तौर पर या आरती-चालीसा संग्रह की धार्मिक किताबों के जरिए ही आगे बढ़ी.
माना जाता है कि दुर्गा चालीसा की रचना हनुमान चालीसा से प्रेरित होकर की गई. गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित हनुमान चालीसा में 40 चौपाइयां हैं. इसके बाद दुर्गा चालीसा, शिव चालीसा आदि कई चालीसा उससे ही प्रेरित होकर लिखे गए.
जिस तरह हनुमान चालीसा की शुरुआत 2 दोहों से होती है और समापन में एक दोहा आता है. वैसे ही दुर्गा चालीसा में भी शुरुआत में एक दोहा और अंत में एक दोहा है और बीच में 40 चौपाइयां हैं.
दुर्गा चालीसा में मां दुर्गा के सौम्य, ममतामयी रूप से लेकर रौद्र रूप तक का वर्णन है. मान्यता है कि इसका पाठ करने से शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती है. भय दूर होता है, साहस बढ़ता है, सुख-शांति मिलती है. विशेष तौर पर सभी नवरात्र, शुक्रवार को दुर्गा चालीसा का पाठ करना चाहिए. वहीं रोजाना पूजा में दुर्गा चालीसा बहुत लाभ देता है.
दुर्गा चालीसा की 40 चौपाइयों के बाद आखिरी दोहे में इसके रचयिता देवीदास जी का नाम आता है.
दोहा - ''देवीदास शरण निज जानी।
करहु कृपा जगदम्ब भवानी॥''
इसका अर्थ है - सब जान लेने पर देवीदास ने आपकी शरण में आया है. हे जगदम्बा भवानी कृपा करो.
(Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारी धार्मिक मान्यताओं और प्रचलित पाठ पर आधारित है. अलग-अलग संस्करणों में पाठ के शब्दों या क्रम में अंतर हो सकता है. पाठक मूल ग्रंथ या प्रमाणित संस्करण से जानकारी का मिलान कर सकते हैं.)