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उत्तराखंड को देवभूमी भी कहा जाता है. आज हम बागेश्वर जिले के बदियाकोट गांव के एक बेहद अनोखी परंपरा के बारे में बताएंगे.
बदियाकोट गांव में एक शक्तिपीठ मौजूद है जिसका नाम मां आदि बद्री भगवती मंदिर है. यहीं मां भगवती ने दैत्य निशुम्भ को मारा था.
लेकिन यहां सबसे हैरान करने वाली बात तो ये है कि इस मंदिर की देखभाल शिकारियों के वंशज करते हैं.
इस इलाके का नाम बार बदकोटी है. मान्यताओं के हिसाब से इसके संबंध मंदिर स्थापना से जुड़ी हुई है.
अब आपके मन में भी ये सवाल आ रहा होगा कि मंदिर की देखरेख शिकारी के वंशज क्यों करते हैं. तो इसके पीछे एक पौराणिक लोककथा है.
पहले गढ़वाल के जंगलों में छलि और बलि नाम के दो शिकारी थे. दोनों ने एक दिन शिकार करते समय सुंदर मृग देखा.
शिकार करने के चक्कर में दोनों भाई पीछे भागे. उसके पीछे भागते-भागते बागेश्वर की ऊंची पहाड़ियों पर स्थित बदियाकोट तक पहुंच गए.
जब वहां दोनों पहुंचे तो मृग गायब हो चुका था और वहां माता भगवती एक छोटी कन्या के रूप में खड़ी थी.
उन्होंने बताया कि वो कौन हैं, और समझाया कि जहां वो खड़े हैं उस जगह का क्या महत्व है. जिसके बाद से उन्होंने शिकार छोड़ दिया.
माता के आदेश के बाद दोनों ने एक पवित्र मंदिर बनवाया. माता ने उन्हें अपना पहला पुजारी बनाया.
देवी के मंदिर का दोनों भाई बहुत ख्याल रखते थे. कुछ समय बाद माता के आशीर्वाद से दोनों को छह-छह बेटे हुए.
दोनों भाईयों के बाद उनके बच्चों ने माता के मंदिर की सुरक्षा में समर्पित हो गए. उनकी भक्ती को देखकर वहां के लोग भी उनका सम्मान करने लगे.
आगे चलकर इन 12 भाइयों के समूह को बार बदकोटी कहा जाने लगा. आज भी स्थानीय परंपरा में इन 12 भाइयों के वंशजों को बहुत श्रद्धा के साथ याद किया जाता है.
बागेश्वर के इस शक्तिपीठ में आज भी वही सदियों पुरानी परंपरा देखने को मिलती है. नवरात्र हो या कोई दुसरा त्योहार, यहां के स्थानीय रीति-रिवाज इस प्राचीन कथा से जुड़े हुए हैं.
स्थानीय लोगों का मानना है कि देवी ने खुद इन शिकारियों के वंश को अपनी सेवा का अधिकार दिया था.
यही कारण है कि पीढ़ी-दर-पीढ़ी चला आ रहा यह सेवा-भाव आज भी इस धाम की सबसे बड़ा खास माना जाता है.
Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारी स्थानीय लोककथाओं, पौराणिक मान्यताओं और मंदिर के प्रामाणिक इतिहास पर आधारित है.