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शिकारी से बने पुजारी: जानिए कौन हैं 'बार बदकोटी' और क्या है मां आदि बद्री मंदिर का इतिहास

बागेश्वर के मां आदि बद्री भगवती मंदिर में बार बदकोटी परंपरा छलि और बलि नामक दो शिकारियों से जुड़ी है. देवी के कन्या रूप में दर्शन पाकर वे पुजारी बने. उनके 12 पुत्र बाद में बार बदकोटी कहलाए, जिन्हें वहां के लोग पूजनीय माना जाता है.

शिकारी से बने पुजारी: जानिए कौन हैं 'बार बदकोटी' और क्या है मां आदि बद्री मंदिर का इतिहास

उत्तराखंड को देवभूमी भी कहा जाता है. आज हम बागेश्वर जिले के बदियाकोट गांव के एक बेहद अनोखी परंपरा के बारे में बताएंगे.

बदियाकोट गांव में एक शक्तिपीठ मौजूद है जिसका नाम मां आदि बद्री भगवती मंदिर है. यहीं मां भगवती ने दैत्य निशुम्भ को मारा था.

लेकिन यहां सबसे हैरान करने वाली बात तो ये है कि इस मंदिर की देखभाल शिकारियों के वंशज करते हैं.

इस इलाके का नाम बार बदकोटी है. मान्यताओं के हिसाब से इसके संबंध मंदिर स्थापना से जुड़ी हुई है.

जब दो शिकारियों के सामने प्रकट हुईं देवी

अब आपके मन में भी ये सवाल आ रहा होगा कि मंदिर की देखरेख शिकारी के वंशज क्यों करते हैं. तो इसके पीछे एक पौराणिक लोककथा है.

पहले गढ़वाल के जंगलों में छलि और बलि नाम के दो शिकारी थे. दोनों ने एक दिन शिकार करते समय सुंदर मृग देखा.

शिकार करने के चक्कर में दोनों भाई पीछे भागे. उसके पीछे भागते-भागते बागेश्वर की ऊंची पहाड़ियों पर स्थित बदियाकोट तक पहुंच गए.

कन्या रूप में माता के दर्शन

जब वहां दोनों पहुंचे तो मृग गायब हो चुका था और वहां माता भगवती एक छोटी कन्या के रूप में खड़ी थी.

उन्होंने बताया कि वो कौन हैं, और समझाया कि जहां वो खड़े हैं उस जगह का क्या महत्व है. जिसके बाद से उन्होंने शिकार छोड़ दिया.

माता के आदेश के बाद दोनों ने एक पवित्र मंदिर बनवाया. माता ने उन्हें अपना पहला पुजारी बनाया.

कौन हैं बार बदकोटी और क्या है इनका इतिहास?

देवी के मंदिर का दोनों भाई बहुत ख्याल रखते थे. कुछ समय बाद माता के आशीर्वाद से दोनों को छह-छह बेटे हुए.

दोनों भाईयों के बाद उनके बच्चों ने माता के मंदिर की सुरक्षा में समर्पित हो गए. उनकी भक्ती को देखकर वहां के लोग भी उनका सम्मान करने लगे.

आगे चलकर इन 12 भाइयों के समूह को बार बदकोटी कहा जाने लगा. आज भी स्थानीय परंपरा में इन 12 भाइयों के वंशजों को बहुत श्रद्धा के साथ याद किया जाता है.

सदियों पुरानी परंपरा

बागेश्वर के इस शक्तिपीठ में आज भी वही सदियों पुरानी परंपरा देखने को मिलती है. नवरात्र हो या कोई दुसरा त्योहार, यहां के स्थानीय रीति-रिवाज इस प्राचीन कथा से जुड़े हुए हैं.

स्थानीय लोगों का मानना है कि देवी ने खुद इन शिकारियों के वंश को अपनी सेवा का अधिकार दिया था.

यही कारण है कि पीढ़ी-दर-पीढ़ी चला आ रहा यह सेवा-भाव आज भी इस धाम की सबसे बड़ा खास माना जाता है.

Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारी स्थानीय लोककथाओं, पौराणिक मान्यताओं और मंदिर के प्रामाणिक इतिहास पर आधारित है.

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Harsh Singh

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हर्ष सिंह जी न्यूज डिजिटल में एक अनुभवी और धारदार शैली के पत्रकार हैं. उन्होंने मार्च 2024 में जी न्यूज जॉइन किया था. वर्तमान में हर्ष धर्म और ज्योतिष से जुड़ी खबरों की खास कवरेज कर रहे हैं. वे देश-दुनिया के धार्मिक आयोजनों, अध्यात्म और ज्योतिषीय गणनाओं से जुड़े जरूरी अपडेट्स दर्शकों तक पूरी सटीकता के साथ पहुंचाते हैं. हर्ष को उनकी फैक्ट-आधारित और भरोसेमंद लेखन शैली के लिए जाना जाता है.बनारस के महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ से मास कम्युनिकेशन में पोस्ट-ग्रेजुएशन करने वाले हर्ष अपनी पूरी ऊर्जा और समझ के साथ धर्म-कर्म और ऐस्ट्रो की दुनिया के खबरों को सरल भाषा में पाठकों तक पहुंचा रहे हैं.अगर आप हर्ष सिंह से संपर्क करना चाहते हैं या उनसे जुड़ा कोई सुझाव साझा करना चाहते हैं, तो उन्हें इस ईमेल आईडी पर लिख सकते हैं: Harsh.singh@India.com
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