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दिमाग़ और तंत्रिका तंत्र से जुड़ी गंभीर बीमारियों की पहचान और उपचार में अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) महत्वपूर्ण भूमिका निभाने जा रहा है. मिर्गी, पार्किंसन, डिमेंशिया और लकवे जैसी बीमारियों में एआई की मदद से मस्तिष्क के प्रभावित हिस्से की अधिक सटीक पहचान करने के साथ ही उसका आकार और नुकसान का स्तर भी मापा जा सकेगा. इससे बीमारी का समय पर निदान, उपचार की सही दिशा तय करने और जटिल मामलों में सर्जरी की योजना बनाने में मदद मिलेगी. हालांकि चिकित्सा क्षेत्र में एआई के बढ़ते इस्तेमाल के बीच मरीजों की निजी जानकारी और चिकित्सकीय आंकड़ों की सुरक्षा भी बड़ी चुनौती बनकर सामने आई है. इन सभी पहलुओं पर जयपुर के सीतापुरा स्थित जयपुर एग्जीबिशन एंड कन्वेंशन सेंटर (JECC) में आयोजित इंडियन एकेडमी ऑफ न्यूरोलॉजी (आईएएन) के 33वें राष्ट्रीय वार्षिक सम्मेलन आईएएनकॉन-2026 में देश-विदेश के विशेषज्ञों ने विस्तार से मंथन किया.
आयोजन अध्यक्ष डॉ. दिनेश शर्मा ने बताया जयपुर में 21 साल बाद आयोजित इस राष्ट्रीय सम्मेलन में 3000 से अधिक चिकित्सकों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों ने भाग लिया, जबकि 400 से अधिक विशेषज्ञ वक्ताओं ने अपने व्याख्यान दिए. सम्मेलन में अमेरिका सहित विभिन्न देशों के न्यूरोलॉजिस्ट भी शामिल हुए. आयोजन सचिव डॉ. भावना शर्मा ने बताया कि राजस्थान के लिए यह गौरव का विषय है कि 21 साल बाद राष्ट्रीय न्यूरोलॉजी संस्था ने इस सम्मेलन की मेजबानी का अवसर प्रदेश को दिया है. इसमें वरिष्ठ चिकित्सकों से लेकर चिकित्सा विद्यार्थियों तक ने अपनी शोध और अनुभव साझा किए. वरिष्ठ विशेषज्ञों के 30-40 वर्षों के चिकित्सकीय अनुभव का लाभ युवा डॉक्टरों को मिला. वहीं राजस्थान के चिकित्सकों ने भी यहां की न्यूरोलॉजिकल बीमारियों और उनके उपचार से जुड़े अनुभव देशभर के विशेषज्ञों के सामने रखे.
मिर्गी में एआई से सर्जरी की योजना होगी ज्यादा सटीक
आयोजन कोषाध्यक्ष डॉ. दीपक जैन ने बताया कि सम्मेलन में एआई के चिकित्सा उपयोग पर विशेष सत्र आयोजित किए गए. मिर्गी के मरीजों की एमआरआई जांच में एआई की मदद से मस्तिष्क के उस हिस्से की पहचान की जा सकती है, जहां बीमारी से संबंधित असामान्यता मौजूद है. प्रभावित हिस्से का आकार और आयतन भी अधिक सटीकता से मापा जा सकता है. इससे उन मरीजों में मिर्गी की सर्जरी की योजना बनाने में मदद मिलेगी, जिनमें दवाओं से दौरे नियंत्रित नहीं हो पाते. इसी तरह पार्किंसन और डिमेंशिया के मरीजों में भी बीमारी से जुड़े बदलावों की पहचान और आकलन में एआई का उपयोग बढ़ रहा है. लकवे के मामलों में भी प्रभावित मस्तिष्क क्षेत्र का पता लगाने और आगे के उपचार की दिशा तय करने में यह तकनीक उपयोगी साबित हो सकती है. हालांकि विशेषज्ञों ने साफ किया कि एआई चिकित्सकों का विकल्प नहीं, बल्कि उनकी जांच और निर्णय प्रक्रिया को अधिक प्रभावी बनाने वाला साधन है.
दौरा पांच मिनट से ज्यादा चले तो जानलेवा हो सकता है
जयपुर के अनुभवी न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. आरके सुरेखा और प्रवक्ता डॉ. त्रिलोचन श्रीवास्तव ने मिर्गी के विभिन्न प्रकारों और समय पर उपचार की आवश्यकता पर जानकारी दी. उन्होंने बताया कि मिर्गी का दौरा पड़ने पर मरीज के मुंह से झाग निकलना, हाथ-पैरों में अकड़न, झटके आना, जीभ कटना और बेहोशी जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं. कुछ मरीजों में दौरे के दौरान अजीब गंध महसूस होना, असामान्य आवाज सुनाई देना या कुछ समय के लिए काम करते-करते अचानक रुक जाना भी इसके लक्षण हो सकते हैं. कई बार लोग इन लक्षणों को ऊपरी प्रभाव या अंधविश्वास से जोड़ देते हैं, जबकि यह मस्तिष्क से संबंधित बीमारी हो सकती है. ऐसे लक्षण दिखाई देने पर न्यूरोलॉजिस्ट से परामर्श जरूरी है.
विशेषज्ञ डॉ. सुरेश गुप्ता के अनुसार मिर्गी के करीब 70 प्रतिशत मामलों में दवाओं से दौरे पूरी तरह नियंत्रित किए जा सकते हैं. लेकिन यदि दौरा पांच मिनट से अधिक समय तक जारी रहे तो यह मेडिकल इमरजेंसी है. लंबे समय तक दौरा चलने से शरीर में ऑक्सीजन की कमी, सांस संबंधी परेशानी, मस्तिष्क को नुकसान और गंभीर स्थिति में हृदय संबंधी जटिलताओं का खतरा बढ़ सकता है. आयोजन कोषाध्यक्ष डॉ. पुष्कर गुप्ता ने बताया कि बेहोशी या कुछ समय के लिए असामान्य व्यवहार को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. न्यूरोलॉजिस्ट जांच के जरिए मिर्गी के दौरे, निम्न रक्तचाप, हृदय संबंधी समस्या और माइग्रेन के बीच अंतर साफ कर सकते हैं. पांच मिनट से अधिक दौरा चलने पर मरीज को तत्काल अस्पताल पहुंचाना चाहिए.
मरीजों का डेटा सुरक्षित रखना भी बड़ी चुनौती
सम्मेलन में एआई के सकारात्मक उपयोग के साथ उसके संभावित दुष्प्रभावों पर भी चर्चा हुई. विशेषज्ञों ने कहा कि मरीजों की एमआरआई, जांच रिपोर्ट और चिकित्सकीय जानकारी का डिजिटल विश्लेषण करते समय उनकी पहचान और निजी आंकड़ों की गोपनीयता बनाए रखना बेहद जरूरी है. एआई के उपयोग में डेटा सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम होने चाहिए, ताकि मरीज की व्यक्तिगत जानकारी अनधिकृत लोगों तक नहीं पहुंचे.
2035 से 2047 तक न्यूरोलॉजी में होंगे नए नवाचार
सम्मेलन में स्ट्रोक, मिर्गी, डिमेंशिया, ऑटोइम्यून बीमारियों, मांसपेशियों और नसों से जुड़ी बीमारियों, पार्किंसन तथा नई दवाओं पर विशेषज्ञों ने विचार साझा किए. न्यूरो रिहैबिलिटेशन और स्ट्रोक के आधुनिक उपचार पर भी सत्र हुए. दूसरे दिन मांसपेशियों और नसों से संबंधित विषयों पर सतत चिकित्सा शिक्षा कार्यक्रम आयोजित किया गया. अमेरिका से करीब 10 न्यूरोलॉजिस्ट सहित एम्स दिल्ली, पीजीआई चंडीगढ़, निमहंस बेंगलुरु और श्री चित्रा मेडिकल इंस्टीट्यूट के विशेषज्ञों ने भाग लिया. सम्मेलन में वर्ष 2035 से 2047 तक न्यूरोलॉजी के क्षेत्र में संभावित बदलावों और नई उपचार पद्धतियों पर भी चर्चा की गई.
आयोजन सचिव डॉ. भावना शर्मा ने बताया कि कॉन्फ्रेंस में राज्यपाल हरिभाऊ बागडे ने भी स्वस्थ जीवनशैली, खानपान तथा बीमारियों की रोकथाम को लेकर महत्वपूर्ण मार्गदर्शन दिया. आयोजन अध्यक्ष डॉ. दिनेश शर्मा, डॉ. पुष्कर गुप्ता, डॉ. नीतू रामरखियानी, डॉ. त्रिलोचन श्रीवास्तव, डॉ. सुरेश गुप्ता, डॉ. आरके सुरेखा, डॉ. सुनीत शाह, डॉ. शाकिर हुसैन और डॉ. दीपक जैन सहित आयोजन समिति के सदस्यों ने प्रेस वार्ता में सम्मेलन की उपलब्धियों और चिकित्सा जगत में इसके महत्व की जानकारी दी.