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जयपुर में मस्तिष्क और तंत्रिका तंत्र से जुड़ी बीमारियों के आधुनिक उपचार, समय पर पहचान और नई चिकित्सा तकनीकों पर चर्चा के लिए इंडियन एकेडमी ऑफ न्यूरोलॉजी का 33वां वार्षिक सम्मेलन आयोजित किया जा रहा है. 21 साल बाद जयपुर में हो रहे इस पांच दिवसीय सम्मेलन में देशभर से 1500 से अधिक न्यूरोलॉजिस्ट और चिकित्सा विशेषज्ञ शामिल हुए हैं. राज्यपाल हरिभाऊ बागड़े ने सम्मेलन का शुभारंभ किया.
इस आयोजन में न्यूरोलॉजी के क्षेत्र में हो रहे नए शोध, इलाज की आधुनिक पद्धतियों और जटिल बीमारियों से जुड़े अनुभव साझा किए जा रहे हैं. सम्मेलन के दौरान स्ट्रोक, पार्किंसंस, अल्जाइमर, नसों और मांसपेशियों से संबंधित रोगों समेत कई महत्वपूर्ण विषयों पर विशेषज्ञ चर्चा कर रहे हैं.
स्ट्रोक के लक्षण दिखने पर तुरंत अस्पताल पहुंचना जरूरी
विश्व स्ट्रोक दिवस के मौके पर विशेषज्ञों ने लोगों को स्ट्रोक के शुरुआती लक्षणों के प्रति जागरूक किया. चिकित्सकों ने बताया कि अचानक चेहरा टेढ़ा होना, हाथ-पैर में कमजोरी आना, शरीर के किसी हिस्से में सुन्नपन महसूस होना या संतुलन बिगड़ना स्ट्रोक के संकेत हो सकते हैं. ऐसे लक्षणों को सामान्य परेशानी समझकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए.
विशेषज्ञों के मुताबिक, स्ट्रोक के मरीज को जल्द से जल्द अस्पताल पहुंचाना जरूरी है. समय पर उपचार मिलने से मरीज की स्थिति में सुधार की संभावना रहती है. चुनिंदा मरीजों में खून का थक्का घोलने वाली दवा और मैकेनिकल थ्रोम्बेक्टॉमी तकनीक के जरिए भी इलाज किया जा सकता है.
सम्मेलन में होंगे करीब 100 व्याख्यान और वैज्ञानिक सत्र
पांच दिवसीय सम्मेलन में करीब 100 व्याख्यान और अलग-अलग वैज्ञानिक सत्र आयोजित किए जा रहे हैं. इनमें विशेषज्ञ नई दवाओं, आधुनिक तकनीकों और जटिल न्यूरोलॉजिकल बीमारियों के उपचार से जुड़े अपने अनुभव साझा कर रहे हैं.
आयोजन सचिव भावना शर्मा ने बताया कि सम्मेलन के पहले दिन चिकित्सा शिक्षा के सतत कार्यक्रम (सीएमई) में न्यूरोमस्कुलर डिसऑर्डर को मुख्य विषय बनाया गया. इसमें नसों और मांसपेशियों से जुड़ी बीमारियों पर विस्तार से चर्चा हुई. देश के प्रमुख चिकित्सा संस्थानों के विशेषज्ञों ने इन रोगों की पहचान, निदान और उपचार से जुड़े व्याख्यान दिए.
ड्यूशेन मस्कुलर डिस्ट्रॉफी: बच्चों की मांसपेशियों को कमजोर करने वाली बीमारी
ड्यूशेन मस्कुलर डिस्ट्रॉफी (DMD) एक आनुवंशिक बीमारी है. इसमें शरीर में डिस्ट्रॉफिन नामक प्रोटीन की कमी के कारण मांसपेशियां धीरे-धीरे कमजोर होने लगती हैं. समय के साथ उनकी कार्यक्षमता घटती जाती है. यह बीमारी मुख्य रूप से 3 से 6 साल की उम्र के छोटे लड़कों में शुरू होती है. किशोरावस्था तक पहुंचते-पहुंचते कई मरीज चलने-फिरने में असमर्थ हो जाते हैं.
स्पाइनल मस्कुलर एट्रोफी: नवजात और छोटे बच्चों पर असर
स्पाइनल मस्कुलर एट्रोफी (SMA) रीढ़ की हड्डी में मौजूद मोटर न्यूरॉन्स को प्रभावित करने वाली बीमारी है. इसके कारण मस्तिष्क से मांसपेशियों तक संदेश पहुंचने में परेशानी होती है और मांसपेशियां धीरे-धीरे सिकुड़कर पतली होने लगती हैं. यह बीमारी मुख्य रूप से नवजात शिशुओं और दो साल तक के बच्चों को प्रभावित करती है. इसके टाइप-1 के लक्षण जन्म के छह महीने के भीतर दिखाई देने लगते हैं.
लिम्ब गर्डल मस्कुलर डिस्ट्रॉफी में कंधे और कूल्हे प्रभावित
लिम्ब गर्डल मस्कुलर डिस्ट्रॉफी (LGMD) में शरीर के कंधों और कूल्हों के आसपास की मांसपेशियां धीरे-धीरे कमजोर होने लगती हैं. यह बीमारी देर से बचपन में, लगभग 10 से 12 साल की उम्र में शुरू हो सकती है. इसके अलावा 15 से 30 साल के युवाओं में भी इसके मामले देखने को मिलते हैं. जयपुर में आयोजित यह सम्मेलन न्यूरोलॉजी के क्षेत्र में नए शोध, बीमारियों की समय पर पहचान और आधुनिक उपचार से जुड़े अनुभव शेयर करने का मंच बना है.