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मंगलवार (20 अक्टूबर) को मनाए गए दशहरा के त्योहार बुराई पर अच्छाई की जीत की गूंज आज श्रीनगर के इतिहासिक लाल चौक में सुनाई दी. महादशमी के दिन, जिस शहर में दशकों तक सन्नाटा पसरा रहा था, वहां आज झेलम नदी में माता दुर्गा की प्रतिमा का विसर्जन हुआ. इस दौरान संगीत, नृत्य और लोगों की साझा खुशी देखने को मिली, जो इस बात का सबूत है कि कश्मीर अपनी सबसे पुरानी परंपरा यहां के लोगों के बीच मौजूद उस शांत और अटूट भाईचारे को फिर से अपना रहा है.
यह शोभायात्रा चहल-पहल से भरे 'महाराजा बाजार' से शुरू हुई. यहां से माता दुर्गा की प्रतिमा, साथ ही मां काली, मां लक्ष्मी और गणेश जी की प्रतिमाओं के साथ, लाल चौक और घंटा घर से होते हुए अमीरा कदल पहुंची. घाटी में रहरहे काम करने वाले हजारों बंगाली और बिहारी लोगों के साथ कश्मीरी पंडित समुदाय के लोग भी शामिल हुए. पूरे रास्ते लोग नाचते-गाते रहे. सड़कों पर पुरुषों, महिलाओं और बच्चों की भारी भीड़ उमड़ पड़ी. इसमें शामिल लोगों ने बताया कि वे पिछले तीन सालों से श्रीनगर में यह त्योहार मना रहे हैं, लेकिन यह पहली बार था जब इतने बड़े पैमाने पर, बिना किसी डर के और पूरी आजादी के साथ सार्वजनिक रूप से इसका जश्न मनाया गया.
एक श्रद्धालु, प्रोसेन मंडल ने कहा, 'हर कोई हमारा समर्थन करता है. यहां कोई भेदभाव नहीं है. हम बंगालियों के लिए दुर्गा पूजा सबसे बड़ा त्योहार है. यहां हर कोई हमारा साथ देता है चाहे वे स्थानीय मुसलमान हों, या पुलिस). हम पहले बंगाल में इसे मनाते थे, और अब पिछले तीन सालों से यहां मना रहे हैं. हम यहां बाहर से आकर बसे हैं, लेकिन यहां के लोगों चाहे वह JK पुलिस हो, सेना हो, या स्थानीय कश्मीरी सभी का हमें पूरा समर्थन मिलता है. कश्मीर बदल नहीं रहा है, बल्कि यह काफी बदल चुका है! इस बार यहां पहले से कहीं ज्यादा भीड़ है.'
यह कोई आम विसर्जन नहीं था. तीन दशकों से ज्यादा समय तक अनुपस्थिति और शहर के मुख्य हिस्से से गुजरने वाली सार्वजनिक शोभायात्रा के बिना बीते चालीस से ज्यादा सालों के बाद, दुर्गा पूजा की लाल चौक पर वापसी हुई है. अनुच्छेद 370 हटने के बाद बहाल हुई शांति और सामान्य स्थिति की बदौलत, शहर का यह व्यावसायिक और भावनात्मक केंद्र एकता के एक मंच में तब्दील हो गया. भक्तों एक साथ मिलकर 'जय मां दुर्गा' के जयकारे लगाए.
चारों ओर रंगों की छटा, ढोल की थाप और खुशी से झूमते लोग दिखाई दिए. इस उत्सव का समापन महादशमी पर 'सिंदूर खेला' के साथ हुआ एक ऐसी साझा आस्था का दृश्य, जो कुछ साल पहले तक श्रीनगर में असंभव था. इसमें शामिल होने वाले कश्मीरी पंडितों ने इस दिन को एक सकारात्मक बदलाव और इस उम्मीद के संकेत के रूप में देखा कि शायद एक दिन उनके घर वापसी का रास्ता फिर से खुल जाए. वह खुशी से इस समारोह में शामिल हुए.
कश्मीरी पंडित समुदाय की विदिता ने बताया, 'मेरा जन्म 2010 में हुआ था, और तब से मैंने कश्मीर में ऐसा विसर्जन कभी नहीं देखा यह यहां पहली बार हुआ है. मुझे बहुत खुशी है कि मुझे पहली बार बंगाली संस्कृति को करीब से जानने और उनके विसर्जन के तरीके को देखने का मौका मिला. पिछले कुछ दिनों में मां दुर्गा की नवरात्रि थी और कल दशहरा था. कल के उत्सव के बाद, आज मां दुर्गा का विसर्जन हुआ. मुझे बहुत खुशी है कि कश्मीर में बदलाव आ रहा है. यहां अब आपसी सद्भाव और खुशहाली है, जो मेरे लिए बहुत खुशी की बात है.'
एक कश्मीरी पंडित होने के नाते, मैंने यहां पहले कभी ऐसा अनुभव नहीं किया था इतनी बड़ी शोभायात्रा और इतना भव्य उत्सव! हम लाल चौक और घंटा घर भी गए, अमीराकदल से होकर आए और इस पूरे आयोजन का भरपूर आनंद लिया; हमने प्रसाद भी ग्रहण किया.' स्थानीय कश्मीरी मुसलमान भी बड़ी संख्या में रास्ते के दोनों ओर खड़े दिखे, जो इस जश्न को देख रहे थे, मुस्कुरा रहे थे और इस को सहयोग दे रहे थे. प्रशासन और सुरक्षा बलों ने पूरा सहयोग दिया. बंगाली और बिहारी आयोजकों ने बताया कि स्थानीय मुस्लिम समुदाय ने बहुत ही सकारात्मक और स्वागतपूर्ण भूमिका निभाई. उन्होंने कहा, 'कश्मीर अब बदल गया है. अब यहां किसी तरह का कोई डर या शंका नहीं है.'
आखिर में मां की प्रतिमाओं का विसर्जन किया गया, और इसके साथ ही एक लंबी खामोशी भी टूट गई. बंगाली समुदाय के एक त्योहार के रूप में शुरू हुई यह परंपरा अब इस बात का सार्वजनिक प्रमाण बन गई है कि घाटी की सबसे पुरानी भावना यानी अलग-अलग धर्मों और समुदायों के बीच भाईचारा एक बार फिर जाग रही है. कल दशहरा था, और आज दुर्गा प्रतिमाओं का विसर्जन इस बात का संकेत है कि कश्मीर भूला नहीं हैं कि एक साथ मिलकर त्योहार कैसे मनाए जाते हैं.