चुनाव आयुक्त और SIR को लेकर उठ रहे सवालों के बीच 5 अक्तूबर को सुप्रीम कोर्ट में भी इस मामले की सुनवाई हुई. सुनवाई के दौरान सर्वोच्च अदालत के जरिए की गई टिप्पणियां गौर करने लायक हैं. कोर्ट साफ कहा है कि वो चुनाव आयोग के सभी फैसलों की जांच करेगा और जो फैसले सही नहीं पाए जाएंगे, उन्हें रद्द कर दिया जाएगा. अदालत ने इसको लेकर केंद्र सरकार और चुनाव आयोग को नोटिस भी जारी कर दिया है.
यह मामला चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जॉयमाल्य बागची और वी मोहना की बेंच के सामने सुना जा रहा था. सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि चुनाव आयोग का कोई भी फैसला कानूनन गलत पाया जाता है, तो हम उसे रद्द कर देंगे, आप कोर्ट की ताकत से परिचित हैं. ऐसे में कई सवाल लोगों जेहन में आ रहे होंगे कि क्या अदालत चुनाव या फिर चुनाव आयोग के मामलों में दखल दे सकता है? तो आज हम आपको कुछ ऐसे ही फैसलों के बारे में बताएं, जिनमें अदालतों ने चुनाव रद्द भी किए हैं और फिर उम्मीदवारों पर कार्रवाई भी की है.
सबसे पहले इंदिरा गांधी और उनके राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी राज नारायण की मिसाल देख लेते हैं. साल 1971 में रायबरेली सीट से इंदिरा गांधी की जीत को अदालत में चुनौती दी गई थी. इंदिरा गांधी पर आरोप लगा था कि उन्होंने चुनाव के दौरान सरकारी तंत्र और अफसरों का अपने फायदे के लिए इस्तेमाल किया है. आखिर में अदालत ने इंदिरा गांधी के चुनाव को रद्द कर दिया, साथ ही 6 साल तक उनपर चुनाव लड़ने की पाबंदी भी लगा दी थी. यह फैसला इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 2 जून 1975 को सुनाया था. अदालत के इस फैसले देश में इमरजेंसी का ऐलान कर दिया गया था.

इसके बाद साल 1977 में भी केरल हाई कोर्ट ने केएम मणि और सीएच मोहम्मद कोया का चुनाव भी रद्द कर दिया था. हालांकि बाद सुप्रीम कोर्ट ने 12 सितंबर 1978 को यह फैसला पलटते हुए उनके पक्ष में फैसला सुनाया. दोनों पर केरल विधानसभा चुनावों के दौरान सांप्रदायिक प्रचार के आरोप लगे थे. इसके अलावा करप्ट प्रैक्टिस करने का भी इल्जाम था. ये दोनों एके एंटनी की पहली सरकार में मंत्री थे. इस दौरान सर्वोच्च अदालत यह भी कहा था कि ‘corrupt practice’ जैसे गंभीर आरोपों को महज़ संभावनाओं के आधार पर नहीं, बल्कि ठोस सबूतों से साबित करना होगा.
1982 के केरल विधानसभा चुनाव में सीपीआई के एन सिवन पिल्लई ने महज 123 वोटों से जीत हासिल की थी. ये वो चुनाव थे, जब उत्तरी परवूर निर्वाचन क्षेत्र के 50 वोटिंग सेंटर्स पर पहली बार ईवीएम का इस्तेमाल किया गया था. पिल्लई के खिलाफ चुनाव लड़ने वाले एसी. जोस ने अदालत में दलील दी कि ईवीएम के इस्तेमाल के लिए कोई कानूनी प्रावधान नहीं है. 1984 में, सुप्रीम कोर्ट ने जोस के पक्ष में फैसला सुनाया, पिल्लई के चुनाव को रद्द कर दिया और उन 50 मतदान केंद्रों पर मतपत्रों के जरिए फिर से वोटिंग कराने का आदेश दिया; जोस विजयी हुए.

साल 2006 के केरल विधानसभा चुनावों में, पीरावोम सीट से LDF उम्मीदवार एमजे जैकब चुनाव लड़े थे. हालांकि केरल हाई कोर्ट करप्शन के आरोपों के चलते जैकब की चुनावी जीत को खारिज कर दिया था. खास तौर पर से उनके राजनीतिक विरोधी UDF नेता टीएम जैकब के खिलाफ चुनाव प्रचार के दौरान चरित्र हनन के मकसद से पर्चे बांटने के आरोप. हालांकि, बाद में सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के इस फैसले पर रोक लगा दी.
इसके अलावा 2018 में फिर से केरल हाई कोर्ट अजीकोड इलाके से IUML (UDF) विधायक केएम शाजी को 2016 के केरल विधानसभा में मिली जीत को रद्द कर दिया था. कोर्ट ने यह फैसला उनके प्रतिद्वंद्वी एमवी निकेश कुमार (LDF) की याचिका पर सुनाया था. कोर्ट केएम शाजी पर 6 वर्षों के लिए चुनाव ना लड़ने की भी पाबंदी लगा दी थी. शाजी पर आरोप था कि उन्होंने चुनाव प्रचार के दौरान वोटरों से सिर्फ मुस्लिम उम्मीदवार का समर्थन करने की अपील करने वाले पर्चे बांटे थे. हालांकि शाजी ने हाई कोर्ट के इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट चैलेंज किया, जहां उनकी अयोग्यता पर अंतरिम रोक लगा दी और उन्हें विधानसभा में विधायक के रूप में बने रहने की इजाजत भी दी लेकिन उन्हें वोट करने का हक या दैनिक भत्ता नहीं दिया गया था.
जुलाई 2019 में तमिलनाडु के थेनी क्षेत्र से AIADMK के सांसद और पूर्व मुख्यमंत्री ओ पन्नीरसेल्वम के बेटे ओपी रवींद्रनाथ कुमार की 2019 के लोकसभा चुनाव की जीत को अमान्य घोषित कर दिया. यह फैसला मद्रास हाई कोर्ट ने सुनाया था. उनके खिलाफ यह याचिका एक एक वोटर के जरिए दाखिल की गई थी और आरोप लगाया था कि उन्होंने अपने नामांकन पत्रों में अपनी संपत्ति और आय से संबंधित जानकारी छिपाई थी और चुनाव प्रचार के दौरान वोटर्स को रिश्वत देने या प्रभावित करने की कोशिश भी की थी.