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आंध्र प्रदेश के एक स्कूल में हाल ही में जो हुआ, उसने हर किसी को अंदर तक डरा दिया. एक स्कूल में चेनसॉ से हुआ हमला इतना भयानक था कि किसी की भी रूह कांप जाए. इस घटना के बाद से समाज में यह सवाल बहुत तेजी से उठ रहा है कि आखिर आज की युवा पीढ़ी और छोटे बच्चों के मन में इतनी नफरत और हिंसा कहां से आ रही है. कुछ लोगों ने तुरंत इसके लिए बॉलीवुड की एक्शन फिल्मों को जिम्मेदार ठहराना शुरू कर दिया. लोगों का कहना है कि पर्दे पर दिखाए जाने वाले खूनी खेल युवाओं के दिमाग पर गहरा असर डाल रहे हैं. लेकिन क्या वाकई सिनेमा ही इसके लिए पूरी तरह जिम्मेदार है.
बॉलीवुड से लेकर संगीत जगत तक एक नई बहस छिड़ गई है. जहां एक तरफ लोग 'एनिमल', 'कबीर सिंह' और 'KGF' जैसी फिल्मों को कटघरे में खड़ा कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ संगीतकार अमाल मलिक और निर्देशक संदीप रेड्डी वांगा खुलकर इसके खिलाफ सामने आए हैं.
इस बहस के बीच मशहूर गायक और संगीतकार अमाल मलिक ने बहुत बेबाक अंदाज में अपनी बात रखी है. अमाल का कहना है कि किसी भी अपराध के लिए सिर्फ फिल्मों को बलि का बकरा बनाना पूरी तरह गलत है. उन्होंने 'एनिमल', 'कबीर सिंह', 'धुरंधर' और 'KGF' जैसी फिल्मों का जिक्र करते हुए साफ कहा कि दर्शकों को यह समझ होनी चाहिए कि परदे की कहानी सिर्फ मनोरंजन या फिक्शन होती है, उसे असल जिंदगी में नहीं उतारा जाना चाहिए. अमाल ने यह भी सवाल उठाया कि अगर फिल्मों के कंटेंट पर इतनी उंगलियां उठती हैं, तो रियलिटी शो और पार्टियों में बजने वाले उन गानों पर सवाल क्यों नहीं उठते, जिनके बोल बेहद आपत्तिजनक होते हैं. उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि बच्चों की परवरिश और उन पर नजर रखने की असल जिम्मेदारी माता-पिता की होती है.
इस पूरे विवाद पर 'एनिमल' फिल्म के निर्देशक संदीप रेड्डी वांगा ने भी सोशल मीडिया पर अपनी कड़ी नाराजगी जताई है. उन्होंने कहा कि किसी भी जघन्य अपराध के तुरंत बाद सिनेमा को आसान निशाना बना लेना लोगों की फितरत बन गई है. वांगा ने साफ किया कि ऐसी त्रासदियों के समय पहली प्रतिक्रिया पीड़ितों के प्रति सहानुभूति दिखाने की होनी चाहिए, न कि फिल्मों को कोसने की.
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर अपनी भड़ास निकालते हुए उन्होंने लिखा कि जब कोई भयानक अपराध होता है, तो सबसे पहले पीड़ित परिवार के साथ हमदर्दी जतानी चाहिए और असली समस्या की तह तक जाना चाहिए, न कि सिनेमा में अपनी सुविधानुसार कोई खलनायक ढूंढ लेना चाहिए. उन्होंने आगे लिखा कि यह साफ नजर आ रहा है कि कुछ लोगों को पीड़ितों या उनके परिवारों से कोई मतलब नहीं है, वे इस खौफनाक त्रासदी का इस्तेमाल अपने निजी हिसाब चुकता करने और अपनी घटिया राजनीति चमकाने के लिए कर रहे हैं.
कुछ दिन पहले चाइल्ड एंगर और बिहेवियर पर केरलम के एक अस्पताल की रिपोर्ट आई थी, यह रिपोर्ट एसएटी अस्पताल, तिरुवनंतपुरम (SAT Hospital, Thiruvananthapuram) के बिहेवियरल पीडियाट्रिक्स विभाग द्वारा की गई एक स्टडी पर आधारित है. इस रिपोर्ट में डॉक्टरों और एक्सपर्ट्स का कहना है कि सिर्फ बच्चों पर दोष मढ़ने या त्रासदी के बाद फिल्में/गेम्स को बलि का बकरा बनाने के बजाय अभिभावकों को डिजिटल लिटरेसी, पॉजिटिव पेरेंटिंग और कम्युनिटी लेवल पर 'ऑपरेशन यंगस्टार' जैसे जागरूकता कार्यक्रमों की शुरुआत करनी चाहिए, ताकि बच्चों की ऊर्जा को सही दिशा में मोड़ा जा सके.
सवाल: क्या फिल्मों में दिखाई जाने वाली हिंसा का बच्चों और युवाओं के व्यवहार पर असर पड़ता है? क्या इस संबंध में कोई वैज्ञानिक रिसर्च मौजूद है?
जवाब- फिल्मों और दूसरे डिजिटल माध्यमों में दिखाई जाने वाली हिंसा का बच्चों और युवाओं के व्यवहार पर मनोवैज्ञानिक प्रभाव पड़ता है, लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि हिंसक फिल्म देखने वाला हर बच्चा आक्रामक या हिंसक हो सकता है. एक मनोवैज्ञानिक के रूप में, मैं आपको इसे तीन तरीकों से समझा सकती हूं.
पहला तरीका है, जिसे हम अवलोकन संबंधी अधिगम (Observational Learning) बोलते हैं. अल्बर्ट बंडूरा नामक सामाजिक मनोवैज्ञानिक के अनुसार, बच्चे दूसरों का व्यवहार देखकर सीखते हैं. यदि किसी फिल्म में हीरो हिंसा करके अपनी समस्या हल करता है और उसे सम्मान, पावर और सफलता मिलती है, तो वह बच्चा उससे प्रभावित हो जाता है, उससे प्रेरित हो जाता है और वह उसी व्यवहार को अपने जीवन में अपनाने लगता है.
दूसरा होता है डिसेंसिटाइजेशन यानी संवेदनहीनता. बार-बार हिंसक दृश्य देखने से कुछ बच्चों में हिंसा के प्रति भावनात्मक प्रतिक्रिया कम हो सकती है. उनकी भावनात्मक संवेदनशीलता थोड़ी कम हो जाती है. जो दृश्य पहले उन्हें डरावना या परेशान करने वाला लगता होगा, फिल्म में दिखाया गया कोई भी ऐसा आक्रामक दृश्य, वह धीरे-धीरे उन्हें सामान्य लगने लगता है.
फिर तीसरी बात आती है एग्रेसिव स्क्रिप्ट, जिसे हम यह कह सकते हैं कि लगातार हिंसक सामग्री या आक्रामक सामग्री देखने से कुछ बच्चों के मन में यह धारणा मजबूत हो सकती है कि गुस्सा करना, अपमान करना, बहस करना या बहुत ही आक्रामक तरीके से जवाब देना एक सामान्य बात है.
मैं इस पहले प्रश्न के उत्तर में बस इतना ही बोलना चाहती हूं कि हमें यह समझना होगा कि बच्चे सिर्फ फिल्म की कहानी नहीं देख रहे होते हैं, बल्कि वे उस कहानी के पात्रों के व्यवहार को, उनके बोलने के तरीकों को और उनकी ओवरऑल पर्सनैलिटी को देख और समझ रहे होते हैं. विशेष रूप से जब कोई लोकप्रिय किरदार एक बहुत ही आक्रामक या बहुत ही हिंसक व्यवहार दिखाता है, तो बच्चों को यह लगता है कि हां, यह तो बहुत ही सामान्य व्यवहार है और यह उन्हें सफलता और सराहना की तरफ ले जाएगा. इसलिए, कंटेंट की प्रकृति और बच्चों की मानसिक स्थिति दोनों ही बहुत महत्वपूर्ण होती हैं.
सवाल- क्या 'एनिमल', 'कबीर सिंह', 'KGF' और 'धुरंधर' जैसी फिल्मों में दिखाई गई हिंसा युवाओं के लिए नकल करने का उदाहरण बन सकती है?
जवाब- एक मनोवैज्ञानिक के नजरिए से देखें तो 'एनिमल', 'कबीर सिंह', 'KGF' और 'धुरंधर' जैसी फिल्मों में जो किरदार दिखाए गए हैं, उन्हें हम रोल मॉडल, पहचान या अवलोकन संबंधी अधिगम के जरिए समझ सकते हैं. जब बच्चे किशोरावस्था में कदम रख रहे होते हैं, तो उस उम्र में वे अपनी पहचान बना रहे होते हैं. ऐसे में वे अक्सर ऐसे किरदारों से जुड़ाव महसूस करते हैं, जिन्हें वे बहुत ज्यादा ताकतवर, प्रभावशाली, लोकप्रिय और निडर मानते हैं.
समस्या सिर्फ हिंसा दिखाने की नहीं है, बल्कि यह भी है कि उस हिंसा को परदे पर किस तरीके से पेश किया जा रहा है. उदाहरण के लिए- यदि किसी किरदार को हिंसा करने के बाद बहुत पावरफुल और बेहद सम्मानजनक दिखाया जाए, या फिर कोई गुस्सा कर रहा है और बदला लेने को ही समस्या का समाधान बताया जा रहा है, या फिर लड़ाई-झगड़े और मारपीट को एक बहुत ही स्टाइलिश तरीके, 'स्वैग' या 'हीरोइज्म' से जोड़ा जाता है, तो बच्चे उसे पॉजिटिव नजरिए से देखने लगते हैं.
वे यह पहचान नहीं पाते कि यह असल में नेगेटिव भी हो सकता है. हालांकि, यह भी सच है कि सभी दर्शक एक ही तरह से फिल्म नहीं देखते. एक दर्शक इसे सिर्फ मनोरंजन या फिक्शन के रूप में देखता है और इसे असल जिंदगी नहीं समझता, जबकि दूसरा दर्शक उससे भावनात्मक रूप से जुड़ जाता है और उसे अपनी पहचान का हिस्सा बनाने लगता है.
मैं फिल्मों पर प्रतिबंध लगाने की बात तो नहीं कहूंगी, लेकिन यह जरूर कहूंगी कि फिल्मों में हिंसा का जो चित्रण और तरीका दिखाया जाता है, उसमें थोड़ा बदलाव होना चाहिए. जब हिंसा को ताकत, रुतबे और सफलता का प्रतीक बनाकर दिखाया जाता है, तो इसके मनोवैज्ञानिक प्रभाव बहुत अलग और काफी चिंताजनक हो सकते हैं.
सवाल: क्या फिल्मों को अपराध के लिए जिम्मेदार ठहराना सही है या इसके पीछे परवरिश, पारिवारिक माहौल और सामाजिक परिस्थितियां ज्यादा बड़ी वजह हैं?

मैं यह बात साफ करना चाहूंगी कि किसी भी मेंटल हेल्थ की समस्या का होना कोई अपराध नहीं है. फिल्में और सोशल मीडिया इन सभी कारकों के बीच एक उत्प्रेरक की तरह काम कर सकते हैं, लेकिन उन्हें अपराध का एकमात्र कारण नहीं माना जा सकता. किसी बच्चे के हिंसक व्यवहार के पीछे केवल वह फिल्म नहीं होती जो उसने देखी है, बल्कि वह पूरा माहौल होता है जिसमें वह बड़ा हो रहा है.
हमें बच्चों के व्यवहार को सिर्फ सजा देने के बारे में नहीं सोचना चाहिए, बल्कि हमें उन्हें पहले समझना चाहिए. उनके अंदर के गुस्से, निराशा और असुरक्षा की भावना को समझना जरूरी है. इसकी रोकथाम की शुरुआत हमेशा सबसे पहले परिवार से, फिर स्कूल से और इसके बाद समाज से होती है.
सवाल: फिल्मों में हिंसा पर सवाल उठते हैं, लेकिन 'मुन्नी बदनाम', 'चिकनी चमेली' और 'बीड़ी जलइले' जैसे गानों के बोलों पर वैसी बहस क्यों नहीं होती?
जवाब: यह बहुत ही महत्वपूर्ण सवाल है. इसमें मैं यह कहना चाहूंगी कि हमें किसी भी कंटेंट का मूल्यांकन केवल उसकी दृश्य भाषा के आधार पर नहीं, बल्कि उससे समाज में क्या संदेश जा रहा है और उसका क्या सामाजिक प्रभाव पड़ रहा है, इसके आधार पर करना चाहिए. गाने फिल्मों की तुलना में बहुत अधिक बार सुने जाते हैं. उनकी छोटी-छोटी पंक्तियां आसानी से याद हो जाती हैं. आजकल सोशल मीडिया पर रील्स, डांस वीडियो, स्कूल के कार्यक्रमों और रियलिटी शो के माध्यम से उन्हें बार-बार और लगातार दिखाया जाता है. एक मनोवैज्ञानिक के नजरिए से देखें, तो इसके कुछ गंभीर प्रभाव हो सकते हैं:

बार-बार ऐसी चीजें सुनने से अनुचित अभिव्यक्तियां और गलत भाषाएं हमारी आम सामाजिक बातचीत का हिस्सा बन जाती हैं, जो कि बिल्कुल भी सही नहीं है. हालांकि, हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि सिर्फ कोई गाना सुन लेने से अपने आप में किसी के भीतर महिलाओं के प्रति बहुत ज्यादा नकारात्मक व्यवहार पैदा नहीं हो जाता और इसका कोई पक्का वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है कि सिर्फ गाने ही इसके लिए जिम्मेदार हैं. लेकिन हां, यह बच्चों की सोच और नजरिए को प्रभावित करने का एक बड़ा जरिया जरूर बन सकता है.
मेरे विचार से, कंटेंट की जिम्मेदारी केवल फिल्मों तक सीमित नहीं होनी चाहिए. गाने, म्यूजिक वीडियो और सोशल मीडिया रील्स भी बच्चों की सोच और भाषा को बहुत ज्यादा प्रभावित करते हैं. इसलिए, यदि हम फिल्मों में हिंसा और अपमानजनक व्यवहार पर सवाल उठाते हैं, तो हमें गानों में महिलाओं के वस्तुकरण और अपमानजनक शब्दों पर भी समान रूप से खुलकर चर्चा करनी चाहिए.
सवाल: क्या यूट्यूब और इंस्टाग्राम पर मौजूद रैप म्यूजिक में हत्या, हथियारों, महिलाओं और अपराध को महिमामंडित करने का चलन बढ़ रहा है?
जवाब: डिजिटल मीडिया प्लेटफॉर्म पर ऐसे रैप और म्यूजिक वीडियो आसानी से उपलब्ध हैं, जिनमें हथियारों, गैंग कल्चर, हिंसा, नशे और महिलाओं के प्रति अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल किया जाना दिखाते हैं और बहुत ही नॉर्मलाइज कर देते हैं. हालांकि, यह कहना कि पूरे रैप म्यूजिक में ऐसा चलन बढ़ रहा है, उचित नहीं होगा. रैप संगीत की एक बड़ी पॉजिटिव ट्रेडिशन या सकारात्मक परंपरा भी है, जिसमें सामाजिक असमानता, पहचान, संघर्ष, भेदभाव और व्यक्तिगत अनुभवों को आवाज दी जाती है. एक मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से इस चीज के लिए तीन बातों का ध्यान देना चाहिए.

हमें कलाकार और उनकी कला को एक ही नजरिए से नहीं देखना चाहिए. सामाजिक मुद्दों पर आधारित और अपराध को कम करने वाले कंटेंट में और अग्रेसिव कंटेंट जो दिखाते हैं, उनमें बहुत ही फर्क होता है. आज के युवा केवल गाना नहीं सुनते, वे कलाकारों के व्यक्तित्व, उनकी पर्सनैलिटी और उनकी जीवन शैली से भी बहुत इंप्रेस होते हैं और उसको अपनी लाइफ में लाने लगते हैं. इसलिए हमें यह देखना होगा कि कलाकार किस तरीके के व्यवहार को लोकप्रिय बना रहे हैं. क्रिएटिव इंडिपेंडेंस बहुत महत्वपूर्ण है, लेकिन अपराध को ग्लैमरस करना और उनके वास्तविक परिणामों को नजरअंदाज करना चिंता का विषय हो सकता है.
सवाल: क्या फिल्मों की A सर्टिफिकेट रेटिंग का सही तरीके से पालन होता है? बच्चों को ऐसी फिल्में दिखाने की जिम्मेदारी किसकी है?
जवाब: भारत में फिल्म सर्टिफिकेशन की व्यवस्था मौजूद है, हाल कि केवल सर्टिफिकेट जारी कर देना ही काफी नहीं है, उसका सही तरीके से पालन होना भी बहुत जरूरी है. जिन फिल्मों को केवल वयस्कों के लिए सर्टिफिकेट दिया गया है, सीबीएफसी के अनुसार 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को ऐसी फ़िल्म देखने की अनुमति नहीं होनी चाहिए.

बच्चों को क्या देखना है, इसकी जिम्मेदारी केवल सेंसर बोर्ड की नहीं है; यह एक सामूहिक प्रयास और जिम्मेदारी है, जिसमें माता-पिता से लेकर पूरा समाज शामिल है. माता-पिता को यह समझना होगा कि बच्चे के हाथ में मोबाइल देना और उसे डिजिटल दुनिया में अकेला छोड़ देना दो अलग-अलग बातें हैं. हमें बच्चों पर केवल प्रतिबंध नहीं लगाने हैं, बल्कि उनमें सही और गलत कंटेंट को समझने की क्षमता विकसित करनी है ताकि वे रियलिटी और फिक्शन में अंतर समझ सकें.
सवाल: क्या फिल्म निर्माताओं और संगीतकारों की अपने कंटेंट के सामाजिक असर को लेकर कोई जिम्मेदारी तय होनी चाहिए या रचनात्मक स्वतंत्रता सर्वोपरि रहनी चाहिए?
जवाब: मेरे विचार से क्रिएटिव इंडिपेंडेंस और सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी एक-दूसरे के अपोजिट नहीं हैं; दोनों के बीच में एक बैलेंस मेंटेन करा जा सकता है. किसी भी कलाकार को अपनी कहानी, विचार और इमोशंस दिखाने की पूरी इंडिपेंडेंस होनी चाहिए. फिल्म में हिंसा, अपराध और नेगेटिव किरदार दिखाना अपने आप में गलत नहीं है. कई बार ऐसी कहानियां समाज की रियलिटी और जो प्रॉब्लम्स हैं, उनको भी दिखाती हैं. लेकिन सवाल यह है कि हम उस हिंसा को किस तरह से प्रेजेंट कर रहे हैं.
मेरा मानना है कि जो आर्टिस्ट हैं या जो कंटेंट क्रिएटर्स हैं, वे इस बात को लेकर कितने ज्यादा संवेदनशील हैं कि वे किस तरीके से उस चीज को प्रेजेंट कर रहे हैं. इसका अर्थ यह नहीं है कि वे अपनी क्रिएटिव इंडिपेंडेंस छोड़ दें, बल्कि उन्हें यह समझना चाहिए कि लोकप्रियता के साथ सामाजिक प्रभाव और जिम्मेदारी भी आती है.
मैं क्रिएटिव इंडिपेंडेंस के पक्ष में हूं; क्रिएटिव इंडिपेंडेंस की सराहना की जानी चाहिए. लेकिन इंडिपेंडेंस के साथ रिस्पॉन्सिबिलिटी भी आती है. कलाकारों को यह समझना चाहिए कि उनका कंटेंट लाखों यंगस्टर्स और बच्चों तक पहुंच रहा है. वे केवल मनोरंजन नहीं कर रहे होते, बल्कि कई बार अनजाने में व्यवहार और सामाजिक धारणाओं को प्रभावित भी कर रहे होते हैं. इसलिए हिंसा को दिखाना, उसे सही तरीके से प्रेजेंट करना और क्या सही है व क्या गलत है, के बीच में अंतर रखना बहुत ही ज्यादा इंपॉर्टेंट है.
आखिर में आपका क्या कहना है?
