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अमेरिका में जब भी कोई राजनीतिक हलचल होती है तो उसका असर वाशिंगटन तक ही सीमित नहीं रहता. इसका असर दूसरे देशों और उनके बाजार पर भी देखने को मिलता है. अमेरिका में होने वाले मिडटर्म इलेक्शन ये भले ही तय न करें कि व्हाइट हाउस में कौन बैठेगा? लेकिन इसका सीधा कनेक्शन दलाल स्ट्रीट से जरूर जुड़ा है. साल 2026 निवेशकों के लिए काफी उठा-पटक वाला रहा. डोनाल्ड ट्रंप की टैरिफ पॉलिसी, यूएस बॉन्ड यील्ड में इजाफा, क्रूड ऑयल के अनिश्चित दाम और विदेशी निवेशकों (FII) की तरफ से की जा रही बिकवाली ने घरेलू शेयर बाजार का मूड बिगाड़ रखा है. सेंसेक्स और निफ्टी पहले ही 12% तक टूट गए हैं. इस माहौल के बीच हर निवेशक की नजर अमेरिकी संसद से आने वाले नतीजों पर टिकी है.
ब्रोकरेज हाउस एम्के रिसर्च (Emkay Research) की तरफ से तीन सिनेरियो तैयार किये गए हैं, जिनसे यह आइडिया लगेगा कि अमेरिका का यह चुनाव दलाल स्ट्रीट की चाल कैसे तय कर सकता है? आइए आसान और आम बोलचाल की भाषा में तीन अलग-अलग सिनेरियो से समझते हैं कि इस चुनाव का भारतीय बाजार पर क्या असर होने वाला है?
एम्के रिसर्च की तरफ से कहा गया कि 60% संभावना यह है कि डेमोक्रेटिक पार्टी अमेरिकी संसद के दोनों सदनों (House और Senate) पर कब्जा कर लें. मार्केट की भाषा में इसे 'डेमोक्रेटिक स्वीप' (Democrats Sweep) कहा जाता है. यदि ऐसा हुआ तो राष्ट्रपति ट्रंप के फैसलों और टैरिफ पर संसद की नजर रहेगी. हालांकि, डेमोक्रेट्स के आने से टैरिफ कम होने की उम्म्मीद रखने वाले निवेशकों को निराशा मिल सकती है. टैरिफ स्ट्रक्चर पहले की ही तरह बने रहने की उम्मीद है. लेकिन इमिग्रेशन और वीजा पॉलिसी पर ट्रंप प्रशासन को चुनौती मिलेगी. इससे भारतीय आईटी प्रोफेशनल्स को राहत मिल सकती है. इस हालत में सबसे बड़ा रिस्क फॉरेन पॉलिसी को लेकर है. संसद में घिरने के बाद ट्रंप अपने वीटो और एग्जीक्यूटिव पावर्स का इस्तेमाल फॉरेन पॉलिसी में अपनी ताकत दिखाने के लिए कर सकते हैं और ईरान के साथ तनाव फिर से बढ़ सकता है. ईरान और अमेरिका के बीच का संघर्ष बढ़ने से क्रूड ऑयल में फिर तेजी आ सकती है और भारतीय शेयर बाजार में गिरावट देखी जा सकती है.
दूसरे हालात में यह उम्मीद है कि डेमोक्रेट्स हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव (निचले सदन) पर कब्जा कर लें, जबकि रिपब्लिकन सीनेट में बहुमत बनाए रखे. एम्के रिसर्च को इसकी 30% संभावना है. बंटी हुई संसद का सीधा सा मतलब हुआ कि ट्रंप के लिए नई पॉलिसी को पास कराना मुश्किल हो जाएगा. डेमोक्रेट्स इस पर जांच करा सकते हैं. लेकिन टैरिफ पॉलिसी में किसी तरह का बदलाव देखने को नहीं मिलेगा. भारतीय निवेशकों के लिए इस हालात में अनिश्चितता का माहौल बना रहेगा. ICICI ग्लोबल मार्केट्स की तरफ से कहा गया कि जब संसद बंटी होती है तो अमेरिकी सरकार के बजट को लेकर सहमति बनना मुश्किल हो जाता है. इस कारण अमेरिका में 'गवर्नमेंट शटडाउन' का खतरा भी बढ़ जाता है. यदि अमेरिकी सरकार का लंबे समय तक शटडाउन रहता है तो वहां की इकोनॉमिक ग्रोथ धीमी पड़ेगी. इससे भारतीय IT कंपनियों के ऑर्डर और ग्लोबल लिक्विडिटी पर निगेटिव असर पड़ सकता है.
तीसरा और सबसे कम संभावना वाला सिनेरियो यह है कि डोनाल्ड ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी का दोनों सदन पर कंट्रोल बना रहे. हालांकि, एम्के रिसर्च ने इसकी उम्मीद 10% ही जताई है. यदि ऐसा होता है तो ट्रंप के पास अपने एजेंडे को लागू करने की छूट होगी. ट्रंप ऐसे में इमिग्रेशन, टैक्स कटौती और टैरिफ पॉलिसी आदि को तेजी से आगे बढ़ाएंगे. यह हालात दलाल स्ट्रीट के लिए ज्यादा रिस्की माना जा रहा है. पूरा कंट्रोल मिलने पर ट्रंप ईरान और मिडिल ईस्ट के मामलों में और आक्रामक रूख अपना सकते हैं, जिससे सैन्य संघर्ष का खतरा बढ़ जाएगा. कच्चे तेल की कीमत रिकॉर्ड लेवल पर बनी रह सकती हैं. भारत जैसे तेल आयातक देश के लिए यह बड़ा झटका होगा.
अमेरिका के मिडटर्म इलेक्शन में संसद के निचले सदन हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव की सभी 435 सीट और ऊपरी सदन की एक-तिहाई सीटों पर वोटिंग होती है. इसका सीधा सा मतलब है कि राष्ट्रपति ट्रंप अपनी पॉलिसी, टैक्स कट और दूसरे फैसलों को कितनी आसानी से लागू कर पाएंगे, यह इस बात पर निर्भर करता है कि संसद में किसका बहुमत है. घरेलू शेयर बाजार के लिए यह इलेक्शन इसलिए मायने रखता है क्योंकि इससे अमेरिकी ट्रेड पॉलिसी (Trade Policy), ग्लोबल कैपिटल फ्लो (Global Capital Flows) और जियो-पॉलिटिकल टेंशन तनाव तय होगा. खतरा केवल टैरिफ को लेकर नहीं है, बल्कि ईरान के साथ फिर से बढ़ता संघर्ष और क्रूड ऑयल की बढ़ती कीमत है. यदि कच्चा तेल फिर से महंगा होता है तो देश की इकोनॉमी और सर्राफा से लेकर शेयर बाजार तक सब पर भारी दबाव पड़ेगा.