वैशाली में श्राद्ध का भोज खाकर लौट रहे 13 बच्चे गंगा नदी में डूब गए. इलाके में त्राहिमाम मचा हुआ है और वीवीआईपी राजनेताओं का आना जाना लगा हुआ है. जिलाधिकारी वर्षा सिंह सफाई पर सफाई दे रही हैं और सरकारी इंतजामात के ठीक होने का दावा कर रही हैं, लेकिन यह जवाब नहीं दे पा रही हैं कि रात में नाव के संचालन को मंजूरी किसने दी. खैर, बच्चों का अंतिम संस्कार कबीरपंथी परंपरा के हिसाब से कर दिया गया है. इस परंपरा में उन्हें अग्नि देने के बदले भू-समाधि दी जाती है. इलाके में कबीर पंथ को मानने वाले लोगों को तादाद ठीक-ठाक है. आइए, जानते हैं क्या है कबीरपंथी परंपरा, जिसमें शव का दाह नहीं किया जाता, बल्कि भू-समाधि दी जाती है.
दरअसल, कबीर की उलटबांसियों में मानव शरीर को माटी का बर्तन कहा जाता है. यह माना जाता है कि मानव शरीर 5 तत्वों से मिलकर बना है. इसलिए मृत शरीर का दाह संस्कार करने के बदले भू-समाधि देने की परंपरा चली आ रही है.
शव को जलाने में ज्यादा लकड़ी, एनर्जी और अग्नि का उपयोग किया जाता है. कबीर पंथ इसी को नकारते हुए धरती की गोद में शांत भाव से शरीर को सौंपने को अधिक प्राकृतिक और अहिंसक माना जाता है.
अंतिम संस्कार करने की विधि की बात करें तो पार्थिव शरीर को जल से स्नान कराने के बाद सफेद कपड़े में लपेटा जाता है. आम तौर पर साधु संतों को पद्मासन या सिद्धासन में समाधि दी जाती है, तो दूसरी ओर गृहस्थ लोगों या बच्चों को धरती की गोद में सुला दिया जाता है.
समाधि के भीतर पहले नमक डाला जाता है और फिर मिट्टी भरकर उस जगह को समतल कर दिया जाता है. माना जाता है कि इससे मानव शरीर के अवयव जल्द से जल्द अपघटित हो जाते हैं. समाधि पर कोई भव्य निर्माण के बदले केवल मिट्टी या फूल अर्पित किए जाते हैं.
वैसे तो सामान्यत: हिंदू परंपरा में भी छोटे और अविवाहित बच्चों के शव को जलाने के बदले समाधि देने का रिवाज रहा है, लेकिन कबीरपंथ में यह प्रथा आयु देखकर नहीं, बल्कि सभी के लिए मुख्य विधान के रूप में अपनाया गया है.
अंतिम संस्कार के समय पारंपरिक मंत्रोच्चार के बदले कबीरदास जी के भजन, साखी, पद या बीजक के दोहों का सामूहिक गायन होता है. कबीरपंथ किसी भी तरह के मृत्यु भोज को नहीं मानता, इस पंथ में पिंडदान, मृत्यु भोज या मुंडन आदि के अलावा 13 दिनों के कर्मकांडों को मान्यता नहीं है.