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विधान परिषद चुनाव का रिजल्ट तय करेगा भविष्य की चाल, 2029-30 में किसका सितारा चमकेगा और किसका हाल होगा बेहाल?

राजनीति अब अपना पारंपरिक चोला उतार रही है, इसलिए इसे बदलाव का दौर कहा जा सकता है. पिछले 20 साल से बिहार की राजनीति दो ध्रुवीय रही है, लेकिन अब यह बहु-ध्रुवीय होने के रास्ते पर है. असदुद्दीन ओवैसी पहले ही इसे त्रि-पक्षीय बना चुके हैं तो प्रशांत किशोर इसे चतुष्कोणीय बना रहे हैं.

Edited By Sunil Mishra
Published: Oct 03, 2026, 04:48 PM IST | Updated: Oct 03, 2026, 05:57 PM IST
Image Credit: बिहार विधान भवन (File Photo)
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बिहार विधान परिषद की 8 सीटों पर 23 अक्टूबर को चुनाव होने वाला है. इस चुनाव में चार स्नातक और चार शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र के लिए चुनाव होने हैं, जिसका रिजल्ट 27 अक्टूबर, 2026 को आएगा. आम तौर पर विधान परिषद चुनाव में पार्टी के उन नेताओं को खुश करने की कोशिश की जाती है, जो या तो विधानसभा चुनाव हार गए हों और पार्टी को उनकी दरकार हो या फिर किसी बड़े कद के नेता को राजनीतिक दल कानून बनाने की प्रक्रिया में शामिल करना चाहते हैं, लेकिन यह विधान परिषद चुनाव कुछ खास हैं. इस बार के बिहार विधान परिषद चुनाव 2029 के लोकसभा चुनाव और 2030 के विधानसभा चुनाव का एक तरह से खाका खींच सकते हैं.

बिहार विधान परिषद चुनाव में इससे पहले एनडीए और महागठबंधन के बीच सीधा मुकाबला होता रहा है, लेकिन इस बार ऐसा नहीं है. बांकीपुर विधानसभा सीट जीतने के बाद उत्साह से लबरेज जन सुराज पार्टी भी सभी 8 सीटों पर चुनावी मैदान में है. प्रशांत किशोर खुद अपनी पार्टी के प्रत्याशियों के नामांकन में जा रहे हैं और दोनों गठबंधनों को चुनौती देते दिख रहे हैं.

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एनडीए की ओर से भाजपा और जेडीयू ने 4-4 सीटों पर उम्मीदवार उतारे हैं. राष्ट्रीय जनता दल की ओर से 6 प्रत्याशी उतारे गए हैं तो कांग्रेस ने 5 सीटों पर प्रत्याशियों का ऐलान कर दिया है. एनडीए में जेडीयू विधायक अनंत सिंह बगावत कर जन सुराज पार्टी के प्रत्याशी को समर्थन देने का ऐलान कर चुके हैं और इससे पार्टी की बहुत किरकिरी हो रही है. जेडीयू के कार्यकारी अध्यक्ष संजय कुमार झा ने अनंत सिंह का मामला ललन सिंह के गले पहना दी है.

दूसरी ओर, महागठबंधन में विधानसभा चुनाव से शुरू हुआ फ्रेंडली फाइट का दौर विधान परिषद चुनाव में भी जारी है. तेजस्वी यादव ने एकतरफा फैसला लेते हुए राजद के 6 प्रत्याशी उतार दिए तो कांग्रेस ने भी ऐसा ही करते हुए 5 सीटों पर चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया है. इससे 4 सीटों पर राजद और कांग्रेस का आपस में ही मुकाबला सुनिश्चित हो गया है, जो महागठबंधन को भारी पड़ सकता है.

वहीं, अगर जन सुराज पार्टी को देखें तो वह सभी 8 सीटों पर चुनाव लड़ रही है. विधान परिषद चुनाव में अगर जन सुराज पार्टी दूसरे या तीसरे नंबर पर भी आ जाती है तो यह महागठबंधन और खास तौर से तेजस्वी यादव के लिए बड़ा झटका साबित हो सकता है. बांकीपुर विधानसभा चुनाव के बाद विधान परिषद चुनाव में भी अगर जन सुराज पार्टी ने झंडे गाड़ दिए तो नेता प्रतिपक्ष के रूप में तेजस्वी यादव के मनोबल पर इसका भारी असर पड़ सकता है और मुस्लिम वोट बैंक भी प्रशांत किशोर की तरफ जाते दिख सकते हैं. इससे राजद का बना-बनाया आधार वोट बैंक टूट सकता है.

अगर ऐसा हुआ तो फिर महागठबंधन का अस्तित्व ही खतरे में पड़ सकता है, क्योंकि कांग्रेस फिर लाभ के हिसाब से गठबंधन का आकलन कर सकती है और वह प्रशांत किशोर के साथ भी जा सकती है. तमिलनाडु में कांग्रेस ऐसा प्रयोग कर चुकी है और वह द्रमुक का साथ छोड़कर टीवीके के साथ सरकार में भागीदार हो चुकी है. इस स्थिति में 2029 का लोकसभा चुनाव और 2030 का विधानसभा चुनाव काफी मायने रखने वाले हो सकते हैं.

इस लिहाज से 27 अक्टूबर का दिन बिहार की राजनीति में काफी महत्वपूर्ण हो सकता है. उसी दिन बिहार विधान परिषद के चुनावी नतीजे आने वाले हैं, जो तय करेंगे कि अगले लोकसभा चुनाव और विधानसभा चुनाव तक बिहार की राजनीति किस करवट घूमेगी. राजनीति अभी बदलाव के दौर में है और बिहार इससे अछूता कैसे रह सकता है.

मुरली मनोहर श्रीवास्तव पिछले तीन दशक से पत्रकारिता और लेखक के रूप में सक्रिय हैं. ज़ी मीडिया के लिए गेस्ट राइटर के तौर पर अपने विचारों को साझा करते हैं. वह डॉक्यूमेंट्री, नाटक आदि लेखन सहित कई पुस्तकों की रचना कर चुके हैं. शोधपरक लेखन के साथ-साथ राजनीति, कला-संस्कृति और साहित्य में गहरी रुचि रखते हैं.

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इंडस्ट्री में 2 दशकों का अनुभव है तो खबरों की बाजीगरी आती है. डिजिटल मीडिया में आधे दशक हो चुके हैं. लंबे समय तक प्रिंट मीडिया में काम करना डिजिटल की दुनिया में मददगार साबित हुआ. दैनिक जागरण से शुरू हुआ सफर, अमर उजाला, हिन्दुस्तान, News Nation, ABP और India Ahead होते हुए Z Bihar Jharkhand तक पहुंचा है. बिहार और झारखंड की स्थानीय और राजनीतिक खबरों की विशेष समझ.
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