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बिहार में 16 नवंबर, 2026 को 8 विधान पार्षदों का कार्यकाल खत्म हो रहा है. इसलिए इन 8 सीटों पर जल्द ही चुनावी बिगुल बज सकता है. इनमें 4 शिक्षक और 4 स्नातक निर्वाचन क्षेत्र शामिल हैं. माना जा रहा है कि आने वाले कुछ हफ्तों में चुनाव कार्यक्रम जारी हो सकते हैं. इन सीटों पर मतदाता सूची पूरी करने की प्रक्रिया 2025 में पूरी हो चुकी है. जिस सीटों पर चुनाव होने वाले हैं, उनमें पटना, दरभंगा, सारण और तिरहुत शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र और पटना, दरभंगा, कोसी और तिरहुत स्नातक निर्वाचन क्षेत्र शामिल हैं. विधान परिषद राज्य विधानपालिका की उच्च सदन होती है और इसके सदस्यों को विधान पार्षद या एमएलसी कहा जाता है. आम विधानसभा चुनावों में जिस तरह आम जनता भागीदारी करती है, उस तरह इसमें भागीदारी नहीं होती है. इसके सदस्यों के चुनाव के लिए एक विशेष फॉर्मूला होता है, जिसका उल्लेख संविधान के अनुच्छेद 171 में किया गया है. विधान परिषद के कुल सदस्यों की संख्या विधानसभा के कुल सदस्यों की संख्या के एक तिहाई से अधिक नहीं हो सकती. हालांकि, इसके लिए न्यूनतम सदस्यों की संख्या 40 तय किया गया है. इसके सीटों का बंटवारा 5 श्रेणियों में किया गया है:
स्थानीय निकाय के प्रतिनिधि: विधान परिषद की कुल सीटों का एक तिहाई इनसे भरा जाता है. इसमें स्थानीय निकाय जैसे नगर निगम और नगर पालिकाओं के निर्वाचित सदस्य, जिला पार्षद, पंचायत समिति सदस्य और वार्ड सदस्य मतदाता होते हैं.
विधायकों का कोटा: कुल सीटों का एक तिहाई विधायकों के प्रतिनिधियों के लिए तय किया गया है. इसके लिए जब चुनाव होते हैं तो संबंधित राज्यों के मौजूदा विधायक एकल संक्रमणीय मत पद्धति से अपने प्रतिनिधि चुनते हैं.
स्नातक निर्वाचन क्षेत्र: ऐसे प्रतिनिधियों के लिए विधान परिषद में 1/12 यानी 8.3 प्रतिशत सीटें तय की गई हैं. इस चुनाव में राज्य के वे नागरिक, जो किसी मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालय से ग्रेजुएट करने के बाद 3 साल का समय व्यतीत कर चुके हों.
शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र: इनके लिए 1/12 यानी 8.3% सीटें फिक्स की गई हैं. इनमें मतदाता के रूप में वे शिक्षक भाग लेते हैं, जो किसी माध्यमिक स्कूल या उससे उच्च शिक्षण संस्थानों में कम से कम 3 साल से अध्यापन का काम कर रहे हों.
मनोनीत सदस्य: विधान परिषद में 1/6 सदस्य राज्यपाल की ओर से मनोनीत किए जाते हैं. मनोनीत किए जाने वाले सदस्य साहित्य, विज्ञान, कला, सहकारिता और समाजसेवा के क्षेत्र में विशेषज्ञ हो सकते हैं. राज्यपाल की ओर से यह मनोनयन कैबिनेट की सिफारिश पर किया जाता है.
प्रबुद्ध वर्ग की सीधी भागीदारी
संविधान सभा में जब अनुच्छेद 171 पर बहस हो रही थी, तब यह सवाल उठा था कि क्या विधायिक केवल आम वोटरों और राजनीतिक दलों के हाथ में होनी चाहिए या उसमें समाज के प्रबुद्ध वर्ग की भी भागीदारी होनी चाहिए. तब संविधान निर्माताओं ने 1935 के भारत सरकार अधिनियम का हवाला दिया, जिसमें यूनिवर्सिटीज और शिक्षित वर्ग के लिए अलग सीटें होती थीं. आजादी के समय देश में साक्षरता 18 प्रतिशत से भी कम थी. इसलिए संविधान निर्माताओं का कहना था कि कानून बनाने में उच्च शिक्षित वर्ग की आवाज दबनी नहीं चाहिए.
इसके अलावा, समाज के निर्माण में शिक्षकों को सबसे तटस्थ, मूल्य आधारित और बौद्धिक मार्गदर्शक समझा गया. यह तर्क दिया गया कि शिक्षक सीधे चुनावी रैलियों में भाग नहीं ले सकते या राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता नहीं बन सकते थे, इसलिए उन्हें एक संस्थागत मंच प्रदान किया गया.
स्नानकों को प्रतिनिधित्व देने के पीछे यह तर्क दिया गया कि उच्च शिक्षा प्राप्त व्यक्ति राज्य के विकास, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और आर्थिक नीतियों को गहराई से समझता है. ऐसे लोग केवल जाति और धर्म के आधार पर नहीं, बल्कि नीतिगत मुद्दों पर मतदान करेंगे. उस समय यह उम्मीद जताई गई थी.
स्नातक होते ही कोई स्नातक निर्वाचन क्षेत्र का चुनाव नहीं लड़ सकता और न ही उस क्षेत्र का मतदाता हो सकता है. इसके लिए स्नातक करने के बाद 3 साल तक की अवधि व्यतीत करने का प्रावधान किया गया है, ताकि डिग्री लेने के बाद युवा व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त कर सके और समाज का वास्तविक अनुभव ले चुका हो. उसके बाद वह स्नातक निर्वाचन क्षेत्र का चुनाव लड़ सकता है और वोटर भी बन सकता है.
कैसे तय होते हैं स्नातक और शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र?
भारत निर्वाचन आयोग और परिसीमन आयोग राज्य के प्रशासनिक प्रमंडलों या 3 से 6 जिलों को मिलाकर एक निर्वाचन क्षेत्र बनाता है. जैसे: पटना स्नातक निर्वाचन क्षेत्र, तिरहुत शिक्षक क्षेत्र, कोसी शिक्षक क्षेत्र.
सीटों का कैसे हुआ आनुपातिक बंटवारा?
संविधान निर्माताओं की ओर से यह कोशिश की गई कि न तो राजनीतिज्ञों की तानाशाही चले और न ही विधान परिषद आम जनता से एकदम से कट जाए. संविधान निर्माताओं का मानना था कि यदि स्नातक या शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र की संख्या कुल सदस्यों की संख्या का एक तिहाई कर दिया गया तो यह सदन अभिजात्य वर्ग का एक अड्डा बन जाएगा. इससे बचने के लिए इन दोनों श्रेणियों में अलग-अलग 1/12 सदस्यों का ही प्रावधान किया गया था.
इसलिए इनकी संख्या अलग-अलग 1/12 ही तय की गई, ताकि ये आवाज उठाने और टोकने लायक रह सकें और सदन में बहस का स्तर ऊंचा कर सकें.
मनोनीत सदस्यों की संख्या 1/6 तय की गई, जिसका मकसद ऐसे कलाकारों, वैज्ञानिकों, साहित्यकारों और समाजसेवियों को राजनीति में लाना था, जो चुनावी राजनीति में नहीं उतर सकते थे और न ही किसी राजनीतिक दल के वोटर या कार्यकर्ता के रूप में फिट बैठते थे.
जमीन पर कैसे बंटती हैं सीटें?
जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950: किस राज्य में कितनी सीटें होंगी, यह संसद ने 1950 के जनप्रतिनिधित्व कानून की तीसरी अनुसूची में तय किया. जैसे बिहार में 75 सीटें रखी गईं. 75 का 1/12 होता है 6.25. तो 6 सीटें शिक्षकों के लिए तय की गई थीं और इतनी ही सीटें स्नातकों के लिए.
इन 6 सीटों को चुनाव आयोग पूरे राज्य में समान रूप से बांटने के लिए 4 से 6 जिलों का एक समूह बनाता है. जैसे बिहार में प्रमंडलों के आधार पर पटना स्नातक, तिरहुत स्नातक, सारण स्नातक, दरभंगा स्नातक, कोसी स्नातक और गया स्नातक क्षे. इन 5 या 6 जिलों के सभी रजिस्टर्ड ग्रेजुएट मिलकर स्नातक निर्वाचन क्षेत्र से एमएलसी निर्वाचित करते हैं. इसी तरह शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र तय किए जाते हैं.
वोटर लिस्ट में नाम जुड़वाने के नियम
आम चुनाव की तरह इसमें ऐसा नहीं है कि 18 साल होने पर नाम जुड़वाया जा सकता है. हर चुनाव से पहले चुनाव आयोग अलग से फॉर्म 18 स्नातक निर्वाचन क्षेत्र के लिए और फॉर्म 19 शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र के लिए भरवाया जाता है. स्नानत निर्वाचन क्षेत्र से मतदाता बनने के लिए डिग्री सर्टिफिकेट और 3 साल पूरा होने का प्रमाण दिखाना होता है. अगर शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र की बात करें तो संबंधित स्कूल और कॉलेज के प्रिंसिपल या डीईओ यानी जिला शिक्षा अधिकारी से 3 साल के अध्यापन अनुभव का सत्यापित प्रमाणपत्र देना अनिवार्य होता है. इसमें यह स्पष्ट करना जरूरी है कि प्राइमरी स्कूल के शिक्षक इसमें वोटर नहीं होते.
अभी देश के किन राज्यों में हैं विधान परिषद?
अभी देश के केवल 6 राज्यों में ही द्विसदनीय व्यवस्था है, जिनमें उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, बिहार, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना. उत्तर प्रदेश में विधान परिषद की 100, बिहार में 75, कर्नाटक में 75, आंध्र प्रदेश में 58 और तेलंगाना में 40 सीटें हैं. पहले जम्मू कश्मीर में भी विधान परिषद था, लेकिन 2019 में राज्य का दर्जा वापस लेने के साथ ही वहां विधान परिषद की व्यवस्था समाप्त हो गई है. तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल और पंजाब इस व्यवस्था को पहले ही खत्म कर चुके हैं.
राज्यों में विधान परिषद की आवश्यकता क्यों?
संविधान सभा में डॉ. भीमराव आंबेडकर और अन्य संविधान निर्माताओं ने राज्यों के लिए उच्च सदन को जरूरी नहीं माना, बल्कि वैकल्पिक माना था. संविधान के अनुच्छेद 169 के तहत राज्य विधानसभा दो तिहाई बहुमत से प्रस्ताव पारित कर संसद की मंजूरी से विधान परिषद बना या खत्म कर सकती है.
विधान पार्षद जरूरी होने के पक्ष में तर्क
एक मजबूत तर्क है कि विधानसभा की ओर से राजनीतिक दबाव या जल्दबाजी में पास किए गए विधेयकों पर पुनर्विचार का काम विधान परिषद करता है. जल्दबाजी में पास किए गए विधेयकों पर यह एक अंकुश लगाने का काम करता है.
शिक्षाविद, डॉक्टर, वैज्ञानिक और कलाकार जो आम चुनावी राजनीति के जोड़तोड़ और रैलियों में खुलकर नहीं उतर सकते, उन्हें कानून बनाने की प्रक्रिया में शामिल होने का मौका मिलता है.
उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र जैसे बड़े राज्यों में बड़ी जनसंख्या और विभिन्न वर्गों को प्रतिनिधित्व देने के लिहाज से यह जरूरी माना गया.
विधान पार्षद गैर जरूरी होने के पक्ष में तर्क
आलोचकों का कहना है कि यह बेवजह और बेफिजुल है और इससे सरकारी खजाने पर आर्थिक बोझ बढ़ता है. सदस्यों के वेतन, भत्ते, पेंशन और चुनाव कराने में करोड़ों रुपये खर्च होते हैं.
अकसर जो वरिष्ठ नेता या करीबी आम चुनाव में हार जाते हैं, राजनीतिक दल उनको संतुष्ट करने के लिए या मंत्री बनाए रखने के लिए विधान परिषद के रास्ते का इस्तेमाल करते हैं.
विधान परिषदों के पास राज्यसभा की तरह वास्तवित शक्तियां भी नहीं है. यह किसी सामान्य बिल को अधिकतम 4 महीने यानी पहली बार 3 महीने और दूसरी बार केवल एक महीने तक ही रोककर रख सकती है. उसके बाद बिल खुद ब खुद पास माना जाता है.