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त्योहार का नाम आते ही हमारे दिमाग में रोशनी, पकवान और रौनक घूमने लगती है. लेकिन हर पर्व सिर्फ जश्न मनाने के लिए नहीं होता, कुछ दिन ऐसे भी होते हैं, जो खुद के भीतर झांकने के लिए बने हैं. यहूदी धर्म में साल का सबसे बड़ा दिन 'योम किप्पुर' कुछ ऐसा ही है. इसे 'प्रायश्चित का दिन' कहा जाता है, जहां कोई पार्टी या दावत नहीं होती, बल्कि लोग अपनी पुरानी गलतियों से तौबा करते हैं और खुदा व अपनों से सच्चे दिल से माफी मांगते हैं.
मान्यता है कि इसी दिन ऊपर वाला तय करता है कि आने वाला साल आपके लिए कैसा रहेगा. हिब्रू कैलेंडर के सातवें महीने में आने वाले इस पर्व का आज दूसरा दिन है. यानी यह 20 सितंबर को शुरू हुआ और 21 सितंबर यानी आज सूर्यास्त तक चलेगा. आखिर क्या है इस सख्त उपवास के पीछे की कहानी और इसके नियम? आइए जान लेते हैं...
क्या है 'योम किप्पुर' का मतलब?
हिब्रू भाषा में 'योम' का मतलब है दिन, जबकि 'किप्पुर' का मतलब होता है प्रायश्चित या पापों की माफी, इसलिए इसे 'प्रायश्चित का दिन' कहा जाता है. यहूदी कैलेंडर में नया साल 'रोश हशनाह' से शुरू होता है. इसके ठीक 10 दिन बाद योम किप्पुर आता है. इन 10 दिनों को 'तौबा के 10 दिन' माना जाता है. मान्यता है कि नए साल पर ईश्वर सभी इंसानों के कर्मों का हिसाब देखना शुरू करते हैं. फिर योम किप्पुर के दिन आने वाले साल के भाग्य पर आखिरी मुहर लगाते हैं.
इस दिन का सबसे बड़ा नियम बहुत खास है. यहां सिर्फ भगवान के आगे हाथ जोड़कर माफी नहीं मिलती, अगर आपने किसी इंसान का दिल दुखाया है, तो पहले उसी के पास जाना होगा. उससे मिलकर माफी मांगनी होगी और रिश्ता सुधारना होगा. जब वह इंसान आपको माफ करेगा, तभी ईश्वर के दरबार में भी आपकी तौबा कबूल होगी.
25 घंटे का सख्त उपवास
योम किप्पुर की सबसे बड़ी पहचान इसका बेहद कड़ा उपवास है. यह व्रत पूरे 25 घंटे तक चलता है. यह शाम को सूरज ढलने से ठीक पहले शुरू होता है और अगली रात तारे दिखने तक जारी रहता है. इस दिन सारा ध्यान सांसारिक सुखों से हटाकर सिर्फ ऊपर वाले से जुड़ने पर होता है. इसके लिए 5 सख्त नियम माने जाते हैं:
(नोट: जो लोग बीमार हैं, बहुत बुजुर्ग हैं या गर्भवती महिलाएं हैं, उन्हें अपनी सेहत से खिलवाड़ करने की जरूरत नहीं होती. वे नियमों में छूट लेकर व्रत छोड़ सकते हैं.)
योम किप्पुर का इतिहास
धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक, योम किप्पुर की जड़ें पैगंबर मूसा (Moses) के दौर से जुड़ी हैं. जब यहूदी मिस्र से निकले, तो रास्ते में लोगों ने सोने के बछड़े की मूरत बनाकर पूजना शुरू कर दिया. इसे एक भारी गुनाह माना गया. तब मूसा पहाड़ पर गए और ईश्वर से अपने लोगों के लिए दया मांगी. योम किप्पुर ही वह दिन था जब ऊपर वाले ने उनकी गलतियों को माफ किया और मूसा को पत्थर की तख्तियों पर दोबारा 'दस आज्ञाएं' (Ten Commandments) सौंपीं.
पुराने जमाने में यरुशलम के मुख्य मंदिर में महापुरोहित पूरे समाज के लिए पूजा-पाठ और आहुतियां देते थे. लेकिन सन् 70 में जब वह मंदिर ढह गया, तो यह रस्म बदल गई. इसके बाद से ही मंदिर की बलि प्रथा बंद हुई और लोग आराधनालयों (सिनेगॉग) में जमा होकर उपवास और दुआओं के जरिए माफी मांगने लगे.
कैसे बीतता है यह पूरा दिन?
योम किप्पुर का ज्यादातर समय आराधनालयों (सिनेगॉग) में बैठकर प्रार्थना करने में ही निकलता है. इस दौरान 4 मुख्य पड़ाव होते हैं:
1. कोल निद्रे (Kol Nidrei): यह त्योहार की पहली शाम की सबसे खास प्रार्थना है. इसमें लोग जाने-अनजाने में किए गए झूठे वादों और मन्नतों से माफी मांगते हैं.
2. दिनभर की सामूहिक प्रार्थनाएं: अगले पूरे दिन लोग एक साथ बैठकर इबादत करते हैं और अपने गुनाहों को खुलकर कबूल करते हैं.
3. नीलाह (Neilah): शाम ढलने पर होने वाली यह आखिरी प्रार्थना सबसे भावुक पल होता है. माना जाता है कि अब स्वर्ग के दरवाजे बंद होने का वक्त आ गया है और माफी मांगने का यह आखिरी मौका है.
4. शोफार की गूंज: जैसे ही उपवास खत्म होता है, 'शोफार' (भेड़ के सींग से बना एक खास बाजा) को तेज आवाज में फूंका जाता है. इसकी गूंज इस बात का ऐलान होती है कि प्रायश्चित पूरा हो चुका है.
व्रत खुलने के बाद क्या होता है?
शोफार की गूंज के साथ 25 घंटे का लंबा और कड़ा उपवास खत्म होता है. इसके बाद परिवार और रिश्तेदार एक साथ बैठकर खाना खाते हैं. सबके चेहरों पर एक अलग ही सुकून दिखता है, जैसे पुरानी गलतियों का भारी बोझ सिर से उतर गया हो और जिंदगी नए सिरे से शुरू हो रही हो.
इस मौके पर लोग एक-दूसरे को गले लगकर "ग्मार चतिमाह तोवाह" कहते हैं. इसका मतलब होता है 'ऊपर वाला करे कि आने वाले साल के लिए आपकी किस्मत में सिर्फ खुशियां लिखी जाएं.' वहीं व्रत शुरू होने से पहले लोग "हैव एन ईजी फास्ट" कहकर हौसला बढ़ाते हैं.