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रूस के साइबेरिया में एक एंटी-प्लेग रिसर्च इंस्टीट्यूट की महिला की मौत के बाद लोगों में डर बैठ गया है. इस बीच बताया जा रहा है कि महिला की मौत के बाद करीब 200 लोगों पर पैनी नजर रखी जा रही है. दुनिया का ध्यान एक बार फिर उस बीमारी की ओर जाने लगा है, जिसको किसी समय पर ब्लैक डेथ के नाम से जाना जाता था.
रूस के लैब में महिला की मौत के बाद सोशल मीडिया पर प्लेग फैलने और लैब से संक्रमण के बाहर निकलने जैसी चिंताओं पर बात की जाने लगी है. हालांकि, वर्तमान में वैज्ञानिक और आधिकारिक जानकारी इससे कहीं अलग है. अमेरिका की ओर से इस संदिग्ध मौत वाली बैक्टीरिया पर सवाल खड़े किए जाने लगे हैं.
सबसे पहले इस बात ध्यान देना चाहिए कि रूस की ओर अभी तक किसी बड़े प्लेग प्रकोप की पुष्टि नहीं हो सकी है. 28 साल के लैब कर्मचारी की मौत निमोनिया से हुई, हालांकि उसके कारण का अभी पता नहीं चल सका है. ऐसे में रूसी स्वास्थ्य अधिकारियों की मानें, तो जांच में ऐसे कोई सबूत नहीं मिले हैं कि महिला के साथ लैब टेस्टिंग के दौरान प्लेग बैक्टीरिया से संबंधित कोई भी हादसा हुआ. वहीं, महिला जिस इंस्टीट्यूट में काम करती है, वहां संक्रमण से जुड़े किसी नए मामले की जानकारी सामने नहीं आई है.
अगर महिला की मौत के बाद किसी संक्रमण की जानकारी सामने नहीं आई है, तो आखिर 200 लोगों को निगरानी में क्यों रखा गया है. समाचार एजेंसी रॉर्यटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, किसी बीमारी पुष्टि से अधिक जरूरी सावधानी है. इसी बात को ध्यान में रखते हुए 200 लोगों की निगरानी की जा रही है. इस बीच अस्पताल के कुछ हिस्सों को अलग भी किया गया है. अधिकारियों ने कहा कि स्थिति फिलहाल नियंत्रण में है. संपर्क में आए लोगों में कोविड-19 और राइनोवायरस का संक्रमण मिला है. राहत की बात है कि अभी तक प्लेग का कोई संक्रमण सामने नहीं आया है.
विश्व स्वास्थ्य संगठन यानी डब्ल्यूएचओ ने बताया कि प्लेग येरसिनिया पेस्टिस नाम के बैक्टीरिया से होने वाली बीमारी है. आमतौर पर यह बैक्टीरिया छोटे जंगली स्तनधारियों और उनके पिस्सुओं में पाया जाता है. संक्रमित पिस्सिओं के काटने और कुछ परिस्थियों में व्यक्ति से निकलने वाली सांसों के कड़ों के जरिए इंसानों को संक्रमित करता है.
भले ही प्लेग आज के समय में एक गंभीर बीमारी है, लेकिन वह ऐसी बीमारी नहीं है, जिसका उपचार नहीं है. यूरोप में जिस समय प्लेग फैला था, उस वक्त प्रभावी एंटीबायोटिक दवाएं मौजूद नहीं थी. यहां पर समस्या है कि बीमारी का देर से पता चलने पर यह घातक हो सकती है. WHO की मानें, तो फेफड़ों को प्रभावित करने वाला न्यूमोनिक प्लेग बेहद गंभीर रूप है. समय पर इलाज नहीं मिलने के कारण मरीज के बचने की संभावना लगभग खत्म हो जाती है.
रूस के साइबेरिया के संदर्भ में यह महत्वपूर्ण है. यहां पर प्लेग का प्राकृतिक स्रोत पूरी तरीके से खत्म नहीं हुआ है. जंगली जानवरों और पिस्सुओं की आबादी में येरसिनिया पेस्टिंग मौजूद रह सकता है. इसका सीधा मतलब है कि प्लेग दुनिया से गायब नहीं हुआ है. केवल यह कुछ इलाकों में प्रकृति के भीतर मौजूद है. कभी-कभी यह इंसानों तक पहुंच जाता है. हालिया WHO की रिपोर्ट बताती है कि साल 2019 से 2025 के बीच दुनिया के 10 देशों ने प्लेग के संदिग्ध मामले दर्ज किए, इनमें से छह देशों में संक्रमण की पुष्टि हो चुकी है. (इनपुट- आईएएनएस)