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कोरोना वायरस के खौफ से दुनिया अभी पूरी तरह उबर भी नहीं पाई है कि एक नई संक्रामक बीमारी के खतरे ने हड़कंप मचा दिया है. यह बीमारी रूस के साइबेरिया में एक ऐसी जगह से फैली है, जहां पर सीधा-सीधा दखल रूस की सरकार या यूं कहें कि पुतिन का है. यह बीमारी रूस की सबसे सुरक्षित जगह से फैली है, जिसके बाद से डब्ल्यूएचओ से लेकर दुनिया भर की तमाम स्वास्थ्य एजेंसियां सक्रिय हो गई हैं और पूरे मामले पर नजर बनाए हुए हैं.
दरअसल, रूस की एक सीक्रेट लैब में कोविड से भी खतरनाक महामारी फैलाने वाला बैक्टीरिया लीक हो गया है और इसके फैलने से ब्लैक डेथ यानी प्लेग का नया दौर आ सकता है. यह पूरी घटना रूस के साइबेरिया में स्थित इरकुत्स्क एंटी-प्लेग रिसर्च इंस्टीट्यूट की है. यह संस्थान प्राकृतिक रूप से खतरनाक संक्रमणों और प्लेग पर रिसर्च करने के लिए जाना जाता है.
इसी संस्थान में लैब टेक्नीशियन दार्या शिपिलोवा काम करती थीं. स्थानीय मीडिया के मुताबिक 25 सितंबर 2026 को लैब में काम करते समय उनसे प्लेग के बैक्टीरिया वाली एक टेस्ट ट्यूब कथित तौर पर टूट गई थी. ऐसा दावा सबसे पहले स्थानीय मीडिया ने किया. इस घटना के चार दिन बाद यानी 29 सितंबर को उन्हें गंभीर निमोनिया की शिकायत के बाद शेलेखोव अस्पताल में भर्ती करवाया गया.
स्थिति बिगड़ने पर उनको आईसीयू में वेंटिलेटर पर रखा गया, जहां 1 से 2 अक्टूबर की दरमियानी रात उनकी मौत हो गई. जब वैज्ञानिकों ने जांच की तो पाया कि महिला में अब भी प्लेग के जीवित बैक्टीरिया मौजूद हैं. बस यही वह वजह थी जिसने रूस के वैज्ञानिकों की चिंता बढ़ा दी. इस हादसे के बाद से रूस ने आसपास के 5 इलाकों में लॉकडाउन लगा दिया है.
8 करोड़ मौतों का खौफनाक इतिहास और 200 लोग निगरानी में
रूस के साइबेरिया से फैली यह बीमारी इतनी खतरनाक है कि इतिहास में इसकी वजह से दुनिया में 8 करोड़ से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है. करीब 200 से अधिक लोग इस बीमारी के संक्रमण के दायरे में हैं. इसके बाद से लोग दावा कर रहे हैं कि दुनिया में एक और बीमारी तेजी से फैलने वाली है, जो लोगों की परेशानी को बढ़ा सकती है. मौत का कारण बन रही इस बीमारी को लेकर जो सोशल मीडिया पर दावा किया जा रहा था, उस पर रूस ने विराम लगाते हुए साफ कर दिया कि यह कोरोना जैसी बीमारी नहीं है, लेकिन जिस तरह से चीन के वुहान लैब से निकले कोरोना वायरस के बाद पूरी दुनिया हिल गई थी, उसके बाद से लोग इस खबर के सामने आने से दहशत में हैं. उन्हें डर सता रहा है कि कहीं कोरोना जैसी यह बीमारी फिर से दुनिया को कैद में न डाल दे. जब यह खबर दुनिया के सामने आई तो डब्ल्यूएचओ से लेकर दुनिया के तमाम स्वास्थ्य संगठन भी सकते में आ गए और फिर से दुनिया में कोरोना वायरस जैसी चर्चा शुरू हो गई.
अब सवाल उठता है कि आखिर इस आधुनिक युग में रूस के साइबेरिया से यह कौन सी बीमारी फैली है, जिसको लेकर दुनिया डरी हुई है? रूस ने साफ कर दिया है कि यह प्लेग बीमारी है, जिसका दुनिया में इलाज मौजूद है, लेकिन आखिर आज के आधुनिक युग में प्लेग जैसी बीमारी से कैसे एक रिसर्चर की मौत हो सकती है? और सवाल यह भी उठता है कि आखिर रूस ऐसी कौन सी रिसर्च कर रहा था, जिसकी वजह से प्लेग जैसी बीमारी फैली? इस आर्टिकल में हम आपको बताएंगे कि यह बीमारी कितनी खतरनाक है, इतिहास के पन्नों से लेकर आज तक इसका क्या असर रहा है और आने वाले दिनों में यह कितनी खतरनाक हो सकती है?
कहानी में यहां यह मोड़ आता है कि आखिर उस ट्यूब में कितना खतरनाक बैक्टीरिया था, जो चंद दिनों में रिसर्चर को मौत की नींद सुला गया? क्या यह आम प्लेग बीमारी से ज्यादा खतरनाक था या फिर वह रिसर्चर किसी ऐसे प्रोजेक्ट पर काम कर रही थीं, जो प्लेग से भी ज्यादा खतरनाक था? क्या रूस इस बात को छिपाने के लिए इसे सामान्य प्लेग का नाम दे रहा है, क्योंकि हो सकता है कि रूस नहीं चाहता हो कि वह चीन की तरह बदनाम हो?
साइबेरिया में हुए इस हादसे के बाद यह सवाल उठ रहा है कि क्या यह संक्रमण कोरोना वायरस जितना या उससे भी अधिक खतरनाक हो सकता है? वैज्ञानिकों के अनुसार, 'येरसिनिया पेस्टिस' इस बैक्टीरिया का वैज्ञानिक नाम है, जिसे सामान्य भाषा में प्लेग कहा जाता है. इसका नाम स्विस-फ्रांसीसी वैज्ञानिक अलेक्सांद्र यर्सिन के नाम पर रखा गया है.
सामान्य प्लेग जहां पिस्सुओं या चूहों के काटने से फैलता है, वहीं न्यूमोनिक प्लेग फेफड़ों को सीधे प्रभावित करता है. यह कोरोना वायरस की तरह खांसने, छींकने और हवा में मौजूद ड्रॉपलेट्स के जरिए बेहद आसानी से एक इंसान से दूसरे इंसान में फैल सकता है.
अगर इसका सही समय पर इलाज न किया जाए, तो यह फेफड़ों को पूरी तरह डैमेज कर देता है और संक्रमित व्यक्ति की 24 से 48 घंटे के भीतर मौत हो सकती है. इसीलिए इस बीमारी को कोरोना महामारी से जोड़कर देखा जा रहा है, क्योंकि इसके फैलने का तरीका कोरोना से मिलता-जुलता है. इसी वजह से वैज्ञानिक चिंतित हैं कि कहीं दुनिया में फिर से किसी बड़े खतरे की दस्तक न हो जाए.
दोनों का संक्रमण भले ही एक जैसा दिखे लेकिन दोनों में काफी अंतर है. कोरोना की बात की जाए तो जब चीन की लैब से कोरोना वायरस फैला, तब वह एक नया वायरस था जिसके खिलाफ इंसानी शरीर में कोई इम्युनिटी नहीं थी और न ही शुरुआत में कोई दवा मौजूद थी. इसकी वजह से भारी तबाही हुई, लेकिन जब इसकी वैक्सीन बन गई तो इसका खतरा कुछ कम हुआ. हालांकि उसका खतरा अभी पूरी तरह टला नहीं है.
हाल ही में ब्रिटेन में कोविड-19 के नए 'XFG' वेरिएंट की दस्तक हुई है. इसके चलते अस्पतालों में मरीजों के भर्ती होने की संख्या में 48% तक की बढ़ोतरी दर्ज की गई है. यूके हेल्थ सिक्योरिटी एजेंसी के आंकड़ों के अनुसार, देश में कोविड पॉजिटिविटी दर 5.9% से बढ़कर 7% हो गई है, जिसमें सबसे तेज उछाल लंदन और 85 वर्ष से अधिक आयु के बुजुर्गों में देखा जा रहा है. वर्तमान में यह वेरिएंट दुनिया के कई देशों में फैल चुका है और इस पर डब्ल्यूएचओ द्वारा लगातार नजर रखी जा रही है.
वहीं प्लेग की बात करें तो इसका इलाज आधुनिक ब्रॉड-स्पेक्ट्रम एंटीबायोटिक्स से पूरी तरह संभव है. अगर लक्षण दिखने के शुरुआती 24 घंटों के भीतर मरीज या उसके संपर्क में आए लोगों को एंटीबायोटिक दे दी जाए, तो यह जानलेवा नहीं रहता और संक्रमण की चेन टूट जाती है. सबसे बड़ी बात यह है कि प्लेग अब कोई रहस्यमयी अज्ञात बीमारी नहीं है जो हवा में हफ्तों तक चुपचाप फैलती रहे. साइबेरियाई क्षेत्र में स्वास्थ्य एजेंसियों ने तुरंत कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग और आइसोलेशन लागू कर दिया है, जिससे इसे नियंत्रित किया जा सकता है. इसलिए यह कोरोना जितना अनियंत्रित नहीं है.
बीमारी को रूस के वैज्ञानिक ज्यादा खतरनाक नहीं मान रहे हैं, जो कि चिकित्सीय दृष्टि से सही भी हो सकता है. लेकिन सवाल उठता है कि आखिर रूस को ऐसी क्या जरूरत आ पड़ी कि वह प्लेग जैसी बीमारी पर फिर से रिसर्च कर रहा है, जिसकी दवा पहले से मौजूद है? क्या रूस किसी खास बायोवेपन के लिए प्लेग के बैक्टीरिया पर काम कर रहा था या फिर चीन से भी ज्यादा खतरनाक पैथोजन बनाकर तैयार किया जा रहा था? यह वह सवाल है जिसका जवाब सिर्फ रूस के पास है.
बायोवेपन की बात करें तो ये ऐसे हथियार हैं, जिनमें बारूद या विस्फोटक नहीं, बल्कि वायरस, बैक्टीरिया, फंगस और जहरीले तत्वों का इस्तेमाल किया जाता है. जैविक हमले से लोग गंभीर रूप से बीमार होने लगते हैं और उनकी मौत हो जाती है. इसके अलावा शरीर पर इसका बहुत भयानक असर होता है. कई मामलों में लोग अपंगता और मानसिक बीमारियों के शिकार हो जाते हैं. जैविक हथियार कम समय में बहुत बड़े इलाके में तबाही मचा सकते हैं.
चीन का कोरोना वायरस इसका सबसे बड़ा उदाहरण माना जाता है. चीन पर आरोप लगते रहे हैं कि उसने वुहान लैब से कोरोना वायरस को बाहर आने दिया, जिससे दुनिया भर में लाखों लोगों की जान गई और देशों की अर्थव्यवस्थाएं तबाह हुईं.
यूरोपीय इतिहास में भी जैविक हथियारों के इस्तेमाल के प्रमाण मिलते हैं. 1347 ईस्वी में मंगोलियाई सेना ने बीमार शवों को दुश्मन के इलाके के तालाबों और कुओं में फेंक दिया था, जिससे वहां प्लेग फैल गया था. इसे इतिहास में 'ब्लैक डेथ' के नाम से जाना जाता है, जिससे चार साल के भीतर यूरोप में करीब ढाई करोड़ लोगों की मौत हो गई थी.
1900 से 2025 के बीच दुनिया में लैब्स से जुड़ी 1,126 घटनाओं का अध्ययन किया गया है. इनमें लैब में संक्रमण, कर्मचारियों के बीमार होने और खतरनाक रोगजनकों के गलती से बाहर फैलने जैसी घटनाएं शामिल थीं. इस दौरान 81 लोगों की मौत हुई और 148 बड़े आउटब्रेक सामने आए.
जैसे-जैसे दुनिया आधुनिक हो रही है, जंग के तौर-तरीके भी बदल रहे हैं. दुनिया के कई देशों ने ऐसे बायोवेपन तैयार किए हैं जो पारंपरिक हथियारों से भी ज्यादा घातक हैं. इसके एक इस्तेमाल से विरोधी देश दशकों तक उबर नहीं पाता. एक रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया के 149 देशों ने रिसर्च के लिए हाई-टेक लैब्स तैयार की हैं, जिनमें से कई हमेशा संदेह के घेरे में रहती हैं.
माना जाता है कि दुनिया के करीब 17 देश जैविक हथियार बनाने की क्षमता रखते हैं, हालांकि आधिकारिक तौर पर कोई भी देश इसे स्वीकार नहीं करता. आंकड़ों के अनुसार दुनिया के 149 देशों में 3,515 बायो-सेफ्टी लेवल-3 (BSL-3) लैब्स और 34 देशों में 110 बायो-सेफ्टी लेवल-4 (BSL-4) लैब्स मौजूद हैं. यानी कुल 3,625 हाई-कंटेनमेंट लैब्स सक्रिय हैं. BSL-3 लैब में गंभीर बीमारी पैदा करने वाले पैथोजन्स पर काम होता है, जबकि BSL-4 सबसे सुरक्षित और संवेदनशील लैब होती है जहां लाइलाज और सबसे जानलेवा वायरसों पर रिसर्च होती है.
लैब्स के बढ़ने का क्रम देखें तो
1990 में करीब 10-12 BSL-4 लैब्स थीं
2000 में यह संख्या 18-20 हुई
2010 में बढ़कर 40-42 हो गई
2012 में आंकड़ा 50-55 तक पहुंचा
और हाल के वर्षों में दुनिया भर में हाई-लेवल कंटेनमेंट लैब्स का नेटवर्क तेजी से फैला है.
BSL-3 लैब में उन पैथोजन्स पर काम होता है, जो सांस के जरिए फैलने का जोखिम रखते हैं. वहीं BSL-4 लैब जैव-सुरक्षा का सर्वोच्च स्तर है, जहां हवा और पानी तक को पूरी तरह फिल्टर करके बाहर निकाला जाता है. इनका घोषित मकसद बीमारियों को समझना, जांच के तरीके खोजना और वैक्सीन तैयार करना होता है.
कोरोना महामारी के बाद इन लैब्स की संख्या में भारी उछाल आया, क्योंकि दुनिया ने समझा कि वायरस के फैलने पर सिर्फ अस्पताल काफी नहीं होते, बल्कि उसका जीनोम समझना और पहले से तैयारी रखना जरूरी है. लेकिन इसके साथ ही बड़ा खतरा भी जुड़ा है. जितनी ज्यादा लैब्स होंगी और जितने खतरनाक वायरस होंगे, इंसानी चूक या लीकेज का जोखिम उतना ही बढ़ जाता है. खासकर आधुनिक बायोटेक्नोलॉजी और एआई के मेल के बाद सुरक्षा नियमों का पालन और सख्त होना अनिवार्य हो गया है.
कोविड-19 का पहला मामला साल 2019 के अंत में चीन के वुहान शहर में सामने आया था. शुरुआती दौर में स्थानीय प्रशासन ने संक्रमण की जानकारी को दबाने की कोशिश की. बाद में वुहान में सख्त लॉकडाउन लगाकर घरेलू आवाजाही तो रोक दी गई, लेकिन अंतरराष्ट्रीय उड़ानों को कुछ हफ्तों तक चालू रहने दिया गया, जिससे यह संक्रमण पूरी दुनिया में फैल गया. इसी वजह से दुनिया भर में चीन की मंशा और लैब सुरक्षा पर आज भी गंभीर सवाल खड़े किए जाते हैं. साइबेरिया की घटना ने एक बार फिर दुनिया को उसी बायो-सिक्योरिटी के डर की याद दिला दी है.