बांग्लादेश में खसरे का कहर, 1147 मौतों से मचा हड़कंप! क्या भारत पर भी मंडरा रहा सीमा पार संक्रमण का खतरा?
बांग्लादेश की जनता इस समय 'खसरा' के खतरनाक रूप का सामना कर रही है. बताया जा रहा है कि सरकार की लापरवाही और अगस्त में हुए प्रदर्शनों के चलते स्थिति बेकाबू हो गई है.
पड़ोसी मुल्क बांग्लादेश में राजनीतिक उथल-पुथल के परिणाम मासूम बच्चों को भी भुगतना पड़ रहा है. हालात यह हैं कि अब उसे दुनिया के सबसे खतरनाक खसरे (मीजल्स) को रोकने की लड़ाई लड़नी पड़ रही है. हैरानी की बात यह है कि इसमें सबसे बड़ी लापरवाही सरकार और प्रशासन की है. रॉयटर्स ने एक्सपर्ट्स के हवाले से बताया कि यह हालात अन्य देशों के लिए भी एक चेतावनी है.
रॉयटर्स ने बताया कि यह संकट कमजोर डेटा, लोगों तक अपर्याप्त पहुंच और टीकाकरण में कमियों की वजहों के चलते और खतरनाक हो गया. विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के मुताबिक, बांग्लादेश में जहां 2025 में टीकाकरण कार्यक्रम लड़खड़ा गया था. मार्च के मध्य से 9 अक्टूबर तक खसरे के 202000 संदिग्ध मामले सामने आए हैं. इनमें से 22000 मामलों की पुष्टि प्रयोगशाला जांच में हुई है. इस साल किसी भी अन्य देश की तुलना में यहां सबसे ज्यादा मामले दर्ज किए गए हैं.
94 प्रतिशत मौतें पांच साल से कम उम्र के बच्चों की
WHO के मुताबिक, प्रकोप को रोकने के लिए 95% कवरेज होना जरूरी है. हाल के वर्षों में बांग्लादेश लगभग इस स्तर तक पहुंच गया था, लेकिन 2025 में कवरेज में गिरावट आ गई. रॉयटर्स के जरिए WHO के दस्तावेजों की जांच, एक दर्जन से ज्यादा वैज्ञानिकों, स्वास्थ्य कर्मियों और अधिकारियों के साथ बातचीत से पता चलता है कि बांग्लादेश की आपातकालीन प्रतिक्रिया में कई बाधाएं आईं. इनमें लाखों बच्चों का डेटा में शामिल न होना, तैयारियों में कमियां और जरूरत के मुताबिक तादाद में माता-पिता तक न पहुंच पाना शामिल है. WHO के मुताबिक इस बीमारी से अब तक 1147 लोगों की मौत हो चुकी है, जिनमें से 94% मौतें पांच साल से कम उम्र के बच्चों की हैं.
'बाकी देशों के लिए वॉर्निंग'
न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी के स्कूल ऑफ ग्लोबल पब्लिक हेल्थ में प्रोफेसर और WHO के वैक्सीन सलाहकार मार्क जित ने कहा,'यह हर देश के लिए एक वॉर्निंग है.' उन्होंने कहा,'इमरजेंसी हालात से निपटने की तुलना में टीकाकरण के जरिए प्रकोप को रोकना कहीं ज्यादा आसान, सस्ता और सुरक्षित है.' उन्होंने कहा,'मुश्किल हालात में प्रकोप रुक तो जाएगा, लेकिन इस बीच कई लोग खसरे की चपेट में आ चुके होंगे और कुछ की जान भी जा चुकी होगी.'
'वे तब आए जब मैं अपने बेटे को दफना चुका था'
17.8 करोड़ की आबादी वाले बांग्लादेश में सबसे बुरी तरह प्रभावित इलाकों में से एक, पूर्वोत्तर के सिलहट क्षेत्र में, दो साल के अरमान हुसैन की जुलाई में मौत हो गई. उसे कोई टीका नहीं लगा था. परिवार ने अपना तीन पहियों वाला ऑटो-रिक्शा बेचकर उसके इलाज के लिए पैसे जुटाए थे, लेकिन अस्पताल में भर्ती होने के 24 घंटे बाद ही उसकी मौत हो गई. उसकी चार साल की बहन को भी कोई टीका नहीं लगा था. हालांकि वो बच गई. उसके पिता, 26 वर्षीय अमीन मिया ने बताया कि सिलहट के उनके दूर-दराज के गांव में समय पर टीका लगाने के लिए कोई स्वास्थ्यकर्मी नहीं आया. उन्होंने कहा,'वे तब आए जब मैं अपने बेटे को दफना चुका था.'
एक्सपर्ट्स का कहना है कि बांग्लादेश में टीकाकरण तक पहुंच और जागरूकता सबसे बड़ी बाधाएं हैं. हाल तक, बांग्लादेश टीकाकरण के मामले में एक सफल उदाहरण रहा था. WHO और संयुक्त राष्ट्र की बाल एजेंसी UNICEF के अंदाजे के मुताबिक, 2024 में वहां पहली खुराक के लिए 96% और दूसरी खुराक के लिए 93% कवरेज हासिल किया गया था. दूसरी खुराक उन बच्चों के लिए होती है, जिनमें पहली खुराक के बाद भी इम्युनिटी पैदा नहीं हो पाती.
सत्ता विरोधी प्रदर्शनों के चलते आया संकट
लेकिन उसी साल, ऐसे विरोध प्रदर्शन हुए जिन्होंने प्रधानमंत्री शेख हसीना के 15 साल के शासन को खत्म कर दिया. इसके बाद मची राजनीतिक उथल-पुथल के बीच, स्वास्थ्य कर्मियों ने हड़ताल कर दी, टीकों के ऑर्डर में देरी हुई और नियमित कार्यक्रमों के तहत होने वाला फॉलो-अप टीकाकरण भी बाधित हो गया.
टीकाकरण की कवरेज में आई गिरावट
इस साल जुलाई में पब्लिश हुई एक रिपोर्ट में, WHO और UNICEF ने अनुमान लगाया कि 2025 में पहली खुराक का कवरेज गिरकर 90% रह गया, जबकि दूसरी खुराक का कवरेज 86% था. इस रिपोर्ट में 2023 से 2025 के बीच खसरे और अन्य बीमारियों के टीकाकरण से जुड़े आधिकारिक डेटा की गुणवत्ता पर भी सवाल उठाए गए हैं. रिपोर्ट में कहा गया है कि शुरुआती आंकड़ों में कई बार टीका लगवाने वालों की संख्या, लक्ष्य (टारगेट) से भी 100% से ज्यादा दिखाई गई, जिससे पता चलता है कि खुराक की गिनती या लक्ष्य तय करने में कोई गलती हुई है.
सरकार ने गलत दावे किए
फिर भी, जब खसरे का प्रकोप फैला, तो बांग्लादेश ने तुरंत कदम उठाए और शुरुआत में ऐसा लगा कि वे इस लड़ाई में जीत रहे हैं. अप्रैल और मई में लगभग 2 करोड़ (20 मिलियन) बच्चों को टीका लगाए जाने के बाद, एक आपातकालीन कार्यक्रम के चलते नए मामलों में शुरुआती कमी आई. सरकार ने दावा किया कि उसने 6 महीने से 5 साल की उम्र के सभी बच्चों को कवर कर लिया है, लेकिन असल में, यह कार्यक्रम पूरी तरह सफल नहीं रहा. यह बात तब सामने आई जब जून में एक और नियमित स्वास्थ्य अभियान चलाया गया, जिसमें उसी उम्र के बच्चों की लिस्ट में खसरे वाले अभियान की तुलना में 40 लाख (4 मिलियन) बच्चे ज्यादा थे.
प्रधानमंत्री के सलाहकार ने क्या बताया?
14 सितंबर को, जब खसरे के मामले फिर से बढ़ने लगे, तो प्रधानमंत्री के सलाहकार हैदर ने रॉयटर्स को बताया कि इसमें एक अंतर (गैप) रह गया है. उन्होंने इसके लिए माता-पिता की वैक्सीन लगवाने को लेकर हिचकिचाहट या बच्चों के बीमार होने को जिम्मेदार ठहराया, जिसकी वजह से बच्चे टीकाकरण से दूर रह गए.