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Analysis: तब मायावती ने राजनीति के लिए घर छोड़ा था... अब पार्टी के लिए परिवार छोड़ रही हैं

मायावती के हालिया फैसलों से कम से कम इतना संकेत जरूर मिलता है कि वह पार्टी को परिवार की निजी राजनीतिक विरासत के रूप में पेश करने से बचना चाहती हैं.

Analysis:  तब मायावती ने राजनीति के लिए घर छोड़ा था... अब पार्टी के लिए परिवार छोड़ रही हैं
Image Credit: Zee Media Archive

मायावती की राजनीति को समझने के लिए दो तस्वीरों को एक साथ देखना जरूरी है. पहली तस्वीर करीब पांच दशक पुरानी है. 1977 में दिल्ली के कॉन्स्टीट्यूशन क्लब में एक राजनीतिक मंच, 21 साल की एक युवा दलित महिला और सामने बैठे दिग्गज नेता राज नारायण.

कार्यक्रम में राज नारायण बार-बार दलितों को हरिजन कह कर संबोधित कर रहे थे. जब मायावती की बारी आई तो यह युवा महिला माइक अपने हाथ में लेती है और उन्हें सार्वजनिक रूप से चुनौती देती है.

मायावती की बहुचर्चित आत्मकथा 'मेरा संघर्षमय जीवन एवं बहुजन मूवमेंट का सफरनामा' के अनुसार, जब उनका भाषण खत्म हुआ तो लोग उनके समर्थन में नारे लगाने लगे. वह राज नारायण मुर्दाबाद, जनता पार्टी मुर्दाबाद और डा. आंबेडकर जिंदाबाद कह रहे थे. यही वह क्षण था जब कांशीराम की नजर मायावती पर पड़ी और मायावती को घर छोड़ना पड़ा.

दूसरी तस्वीर आज की है. वही मायावती जो कभी अपने राजनीतिक मिशन के लिए पिता का घर छोड़कर निकली थीं, अब अपने ही परिवार के राजनीतिक भविष्य पर फैसला सुना रही हैं.

भतीजे आकाश आनंद को पार्टी से बाहर करने के बाद मायावती ने साफ कर दिया कि उनके लिए परिवार से ऊपर पार्टी और बहुजन मूवमेंट है. उन्होंने साफ किया है कि उनके भाई आनंद कुमार के बेटों को बसपा में राजनीतिक जिम्मेदारी नहीं दी जाएगी. उनका कहना है कि बसपा को परिवारवाद मुक्त रखना बहुत जरूरी है.

यानी करीब पांच दशक की इस राजनीतिक यात्रा में एक चीज जो नहीं बदली वो ये कि मायावती के लिए राजनीति निजी रिश्तों से बड़ी रही है.

घर छोड़ने वाली लड़की से BSP की सबसे बड़ी ताकत तक

मायावती का राजनीति में आना किसी राजनीतिक परिवार की स्वाभाविक विरासत का परिणाम नहीं था. वह दिल्ली में रहने वाली एक युवा स्कूल शिक्षिका थीं जिनके सामने अपने करियर के लिए सिविल सेवा का रास्ता था. लेकिन जातिगत भेदभाव के अनुभवों ने उनके भीतर अलग तरह की बेचैनी पैदा की.

उन्होंने अपनी आत्मकथा में बचपन के उन अनुभवों का जिक्र किया है जब बस में जाति पूछे जाने के बाद लोग सीट बदल लेते थे. घर के भीतर भी बेटों और बेटियों के बीच भेदभाव का अनुभव उन्होंने किया. बाद में डॉ. भीमराव आंबेडकर के साहित्य ने उनके राजनीतिक सोच को दिशा दी.

उनका सपना था कि वह प्रशासनिक सेवा में जाकर व्यवस्था के भीतर से जातिगत अन्याय के खिलाफ लड़ेंगी. फिर कांशीराम मिले.

कांशीराम ने उन्हें समझाया कि जिस ताकत की तलाश वह सिविल सेवक बनकर करना चाहती हैं वह ताकत राजनीति में है. राजनीतिक सत्ता के बिना सामाजिक बदलाव अधूरा रहेगा. कांशीराम अक्सर आंबेडकर के उस विचार को दोहराते थे कि राजनीतिक सत्ता वह 'मास्टर चाबी' है जो तमाम ताले खोल सकती है.

उन्होंने मायावती को इस बात के लिए मनाया कि यदि वह उनके मिशन से जुड़ जाती हैं तो उत्पीड़न के खिलाफ लड़ने का उनका सपना पूरा हो सकता है.

अपनी बेटी की राजनीतिक संलग्नता और कांशीराम के साथ बढ़ती नजदीकियों से चिंतित, पिता ने मायावती को यह कह कर चेतावनी दी कि उन्हें पार्टी या घर में से किसी एक को चुनना होगा.

उनके पिता का कहना था कि वह एक अविवाहित महिला हैं इसलिए उनके पास पिता की बात मानने के अलावा दूसरा विकल्प नहीं है.

बेखौफ मायावती ने स्कूल टीचर की नौकरी से बचाए पैसों के साथ पिता का घर छोड़ दिया और दिल्ली के करोलबाग में बामसेफ के दफ्तर के बगल में कांशीराम के एक कमरे वाले घर में रहने लगीं.

और फिर उन्होंने सिर्फ करियर नहीं बदला, पूरी जिंदगी बदल दी. आज की मायावती को देखकर इस शुरुआती दौर की कल्पना करना मुश्किल है.

उस दफ्तर में वह रोजाना जिला स्तर के कार्यकर्ताओं से मिलतीं और उत्तर प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों में संगठन की जड़ें जमाती चली गईं.

कांशीराम का मिशन, मायावती की मशीनरी

कांशीराम का लक्ष्य दलितों और बहुजनों को राजनीतिक सत्ता तक पहुंचाना था लेकिन मायावती ने इस विचार को उत्तर प्रदेश की सामाजिक वास्तविकता के मुताबिक ढाल दिया.

1984 में कैराना से चुनाव लड़ा. हार मिली. 1985 में बिजनौर उपचुनाव लड़ा. फिर जीत नहीं मिली. 1987 में हरिद्वार से चुनाव लड़ा. वहां भी जीत नहीं मिली. लेकिन वोट लगातार बढ़ता गया.

कैराना में करीब 44 हजार वोट से शुरू हुई यात्रा हरिद्वार में करीब 1.25 लाख वोट तक पहुंची. फिर 1989 में बिजनौर से मायावती ने पहली बार लोकसभा चुनाव जीता.

यानी जिस उत्तर प्रदेश को शुरुआत में बीएसपी के लिए कमजोर जमीन माना जाता था, उसी उत्तर प्रदेश को मायावती ने पार्टी का सबसे मजबूत किला बना दिया. इसके बाद जो हुआ वह इतिहास बनाने वाला था.

वह उत्तर प्रदेश की पहली दलित महिला मुख्यमंत्री बनीं. उन्होंने कुल चार बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद की कमान संभाली. वह लोकसभा और राज्यसभा दोनों सदनों की सदस्य रह चुकी हैं.

हमेशा से राजनीति में परिवार से दूरी

मायावती की राजनीति की एक और खासियत रही है. उन्होंने परिवार को सत्ता के केंद्र से हमेशा दूर रखा. यह बात उनके समर्थकों के लिए उनकी राजनीतिक ईमानदारी का हिस्सा रही तो आलोचकों ने उनकी अत्यधिक केंद्रीकृत राजनीति का प्रमाण माना.

लेकिन 2026 का घटनाक्रम इस पुराने सिद्धांत को एक नए स्तर पर ले गया है. आकाश आनंद को कभी मायावती का राजनीतिक उत्तराधिकारी माना गया. उन्हें संगठन में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां मिलीं. लेकिन उनका राजनीतिक सफर उतार-चढ़ाव से भरा रहा.

2026 में एक बार फिर उन्हें राष्ट्रीय समन्वयक की जिम्मेदारियों से हटाया गया और फिर 10 सितंबर को मायावती ने उन्हें पार्टी से पूरी तरह मुक्त करने की घोषणा कर दी.

दिलचस्प बात यह है कि इस फैसले की पृष्ठभूमि सिर्फ आकाश की राजनीतिक कार्यशैली नहीं थी. उनके ससुर और बीएसपी के पूर्व नेता अशोक सिद्धार्थ के राजनीति से संन्यास लेने का मुद्दा भी इससे जुड़ा था.

मायावती ने साफ संकेत दिया कि अगर परिवार और पार्टी के बीच प्राथमिकता तय करनी है तो पार्टी और आंदोलन सबसे ऊपर होंगे.

आकाश द्वारा उनके एक सोशल मीडिया पोस्ट को दोबारा साझा न किए जाने को भी उन्होंने पारिवारिक निष्ठा को संगठन से ऊपर रखने के संकेत के तौर पर देखा.

यह फैसला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि आकाश सिर्फ कोई सामान्य पार्टी कार्यकर्ता नहीं थे. वह मायावती के भतीजे थे. और कभी उनके राजनीतिक उत्तराधिकारी के तौर पर देखे जा चुके थे.

यानी मायावती का संदेश सिर्फ आकाश के लिए नहीं है.  यह पूरी बीएसपी के लिए है. नारा- वंशवाद नहीं, संगठन. परिवार नहीं, मिशन.

अविवाहित रहने के कारण मजबूरी में..

मायावती जिस बीएसपी को परिवारवाद से दूर रखना चाहती हैं, उसी पार्टी में उनके भाई आनंद कुमार संगठन की महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे हैं.

अब उन्होंने खुद कहा है कि उनके अविवाहित होने के कारण उन्हें अपने भाई को अपने साथ रखना पड़ा और वह उनकी देखभाल के साथ पार्टी की जिम्मेदारियां भी संभाल रहे हैं.

लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि भाई के परिवार को पार्टी और आंदोलन का लाभ नहीं मिलना चाहिए.

इसलिए उन्होंने अपने भाई के बेटों को बीएसपी में राजनीतिक पद न देने का फैसला किया है. इसके साथ ही उन्होंने अपनी भतीजी दीपिका आनंद के लिए भविष्य में भूमिका की संभावना खुली रखी है लेकिन उनकी ईमानदारी, निष्ठा और कार्यक्षमता के आधार पर.

यहीं सवाल उठता है कि क्या मायावती परिवार को पूरी तरह राजनीति से बाहर कर रही हैं या परिवार के भीतर भी अपनी कसौटी खुद तय कर रही हैं?

यह फर्क महत्वपूर्ण है. मायावती की राजनीति में रिश्तेदारी अपने आप में योग्यता नहीं है. उनके लिए संगठन के प्रति निष्ठा, अनुशासन और मिशन के प्रति प्रतिबद्धता ज्यादा महत्वपूर्ण दिखाई देती है.

तब पिता से टकराईं, अब परिवार से

मायावती की राजनीति में एक अजीब निरंतरता है. 1970 के दशक में जब पिता ने कहा कि घर या राजनीति चुनो. तब मायावती ने राजनीति चुनी.

1980 के दशक में बीएसपी के भीतर भी उन्हें अपनी जगह खुद बनानी पड़ी. उन्होंने उत्तर प्रदेश के गांवों में जाकर संगठन खड़ा किया.

और अब करीब 50 साल बाद परिवार या मिशन का सवाल उनके सामने है. मायावती का जवाब एक बार फिर मिशन है.

फर्क सिर्फ इतना है कि तब उन्हें अपना घर छोड़ना पड़ा था, आज उन्हें परिवार के राजनीतिक हिस्से को छोड़ने का फैसला करना पड़ रहा है.

BSP के लिए यह फैसला क्यों महत्वपूर्ण है?

उत्तर प्रदेश की राजनीति में बीएसपी इस समय अपने सबसे कठिन दौर से गुजर रही है. आने वाले विधानसभा चुनाव उसके लिए अस्तित्व की लड़ाई से कम नहीं हैं. ऐसे समय में पार्टी के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि मायावती के बाद कौन बागडोर संभालेगा?

लेकिन मायावती के लिए असली सवाल उत्तराधिकारी का नाम नहीं, उत्तराधिकार का मॉडल है. मायावती की सबसे बड़ी राजनीतिक विरासत सिर्फ उनके बनाए स्मारक या जीते हुए चुनाव नहीं हैं. उनकी सबसे बड़ी विरासत शायद यह है कि उन्होंने दलित राजनीति को सिर्फ सामाजिक आंदोलन से निकालकर सत्ता के केंद्र तक पहुंचाया.

और यही वजह है कि परिवार को लेकर उनका ताजा फैसला सामान्य पारिवारिक विवाद की तरह नहीं देखा जा सकता. मायावती की पूरी राजनीतिक यात्रा का सबसे बड़ा संदेश यही है कि उनके लिए रिश्ते निजी हो सकते हैं, लेकिन मिशन सार्वजनिक है.

और जब निजी रिश्ता और राजनीतिक मिशन आमने-सामने खड़े होते हैं तो अब तक का इतिहास बताता है कि मायावती ने हर बार मिशन को चुना है.

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About the Author

Amit Singh

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अमित सिंह देश के वरिष्ठ पत्रकारों और डिजिटल मीडिया संपादकों में शामिल हैं. राजनीति, अर्थव्यवस्था, सार्वजनिक नीति और सामाजिक मुद्दों पर लेखन का उन्हें 18 वर्षों से अधिक का अनुभव है. अपने लंबे पत्रकारिता करियर में उन्होंने अनेक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय विषयों की रिपोर्टिंग, विश्लेषण और संपादकीय नेतृत्व किया है. उनकी पहचान तथ्यों पर आधारित, संतुलित और गहन विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. वर्तमान में अमित सिंह Zee News की हिंदी वेबसाइट के संपादक हैं. इस भूमिका में वे संपादकीय दिशा तय करने, विशेष कवरेज की रणनीति बनाने और डिजिटल न्यूज़रूम के संचालन का नेतृत्व करते हैं.पत्रकारिता में उत्कृष्ट योगदान के लिए अमित को देश के सबसे प्रतिष्ठित सम्मानों में से एक Ramnath Goenka Excellence in Journalism Awards से सम्मानित किया जा चुका है. यह सम्मान उनकी पेशेवर विश्वसनीयता, खोजी दृष्टि और जनसरोकारों से जुड़े मुद्दों पर प्रभावशाली पत्रकारिता का प्रमाण है.अमित ने अपने करियर के दौरान भारत के अग्रणी मीडिया संस्थानों The Wire, Tehelka, Dainik Jagran, Hindustan और Aaj Tak में महत्वपूर्ण भूमिकाओं में कार्य किया है. उन्हें प्रिंट, टेलीविजन और डिजिटल तीनों माध्यमों में काम करने का अनुभव है. आप अमित सिंह से सीधे amit.singh@india.com पर ईमेल के जरिए संपर्क कर सकते हैं.
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