)
पाकिस्तान के सिंध प्रांत में कभी जागीर और राजनीतिक रसूख रखने वाले सोढा परिवार की कहानी अब राजस्थान के सीमावर्ती इलाके में एक नए मुकाम पर पहुंची है. 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान भारतीय सेना की मदद करने के आरोपों के बाद पाकिस्तान सरकार की कार्रवाई का सामना करने वाले दो भाइयों, लक्ष्मण सिंह सोढा और पदम् सिंह सोढा , का नाम एक बार फिर चर्चा में है. जानकारी के अनुसार, दोनों भाइयों पर पाकिस्तान में जासूसी के आरोप लगाए गए थे और उनके सिर पर दो-दो लाख रुपये का इनाम घोषित किया गया था. अब छोटे भाई पदम् सिंह सोढा भारत में छाछरो (बावड़ी कल्ला) ग्राम पंचायत के पहले सरपंच निर्वाचित हुए हैं.
पाकिस्तान के छाछरो से भारत के छाछरो तक का सफर
सोढा परिवार की पहचान पाकिस्तान के सिंध प्रांत के छाछरो क्षेत्र से जुड़ी रही है. यह परिवार वहां सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक रूप से प्रभावशाली था. परिवार के बड़े सदस्य लक्ष्मण सिंह सोढा पाकिस्तान की राजनीति में सक्रिय रहे और पूर्व में रेल मंत्रालय की जिम्मेदारी भी संभाल चुके थे.

1971 के युद्ध के दौरान थार के रेगिस्तानी इलाके में भारतीय सेना के अभियानों में स्थानीय भूगोल और रास्तों की जानकारी अहम थी. इसी, सोढा परिवार ने भारतीय सेना की मदद की थी. ब्रिगेडियर भवानी सिंह के नेतृत्व में भारतीय सेना की 10 पैरा कमांडो यूनिट ने पाकिस्तान के छाछरो क्षेत्र में अभियान चलाया था.
इसी घटनाक्रम के बाद पाकिस्तानी अधिकारियों ने दोनों भाइयों पर भारत की मदद करने और जासूसी से जुड़े आरोप लगाए. उनके सिर पर दो-दो लाख रुपये के इनाम की बात भी प्रकाशित रिपोर्टों में दर्ज है
पुश्तैनी जमीन छूटी, बदल गई जिंदगी
पाकिस्तान में राजनीतिक और सुरक्षा परिस्थितियों के बीच सोढा परिवार को अपना पुराना घर और जमीन छोड़कर भारत आना पड़ा. जिस परिवार की पहचान कभी जागीर और पुश्तैनी हवेली से होती थी, उसे नए देश में जीवन की शुरुआत करनी पड़ी.
लक्ष्मण सिंह सोढा और पदम् सिंह सोढा की कहानी इसी बदलाव को सामने लाती है. सीमापार छूट गई संपत्ति और पुरानी पहचान के बावजूद परिवार ने भारत में अपनी नई जिंदगी बसाई. लक्ष्मण सिंह सोढा का नाम 1971 के युद्ध से जुड़े घटनाक्रम और बाद के सार्वजनिक जीवन के कारण भी चर्चा में रहा.
अब भारत में छाछरो की कमान
इस कहानी का सबसे उल्लेखनीय पहलू यह है कि पाकिस्तान में छूटे पुश्तैनी गांव के नाम से भारत में राजस्व गांव छाछरो बसाया गया. पाक विस्थापित परिवारों की लंबे समय से जुड़ी पहचान को इस नाम के जरिए नया आधार मिला.
अब इसी छाछरो ग्राम पंचायत के पहले सरपंच के रूप में पदम् सिंह सोढा चुने गए हैं. उन्होंने पंचायत चुनाव में जीत दर्ज कर गांव की जिम्मेदारी संभाली है. इस जीत के साथ सोढा परिवार की कहानी एक बार फिर सीमावर्ती बाड़मेर में चर्चा का विषय बन गई है.
सरहद के इस पार नई पहचान
यह कहानी सिर्फ एक चुनावी जीत की नहीं है. यह उस परिवार की यात्रा है जिसने एक दौर में अपनी पुश्तैनी जमीन छोड़ी, नए सिरे से जीवन बसाया और अब उसी नाम से जुड़े गांव के नेतृत्व तक पहुंचा.
कभी पाकिस्तान के छाछरो से जुड़ी रही पहचान आज भारत के छाछरो में नई भूमिका निभा रही है. गांव में जीत के जश्न के बीच इस परिवार की विरासत और विस्थापन की स्मृतियां फिर ताजा हो गई हैं. सरहद ने गांव को दो हिस्सों में बांट दिया, लेकिन छाछरो नाम से जुड़ी पहचान पीढ़ियों के साथ चलती रही. आज उसी पहचान के साथ पदम् सिंह सोढा का सरपंच बनना इस ऐतिहासिक सफर का नया अध्याय है.