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Lucknow Cantt Assembly History/ मयूर शुक्ला: जब भी उत्तर प्रदेश की राजनीति की सबसे हॉट और वीआईपी सीटों की चर्चा होती है, तो 'लखनऊ कैंट' (Lucknow Cantt) का नाम सबसे ऊपर आता है. इस सीट का मिजाज ऐसा है कि यहां की जनता ने कभी एक ही पार्टी का हमेशा के लिए पट्टा नहीं बनने दिया. आजादी के बाद जहां दशकों तक यहां कांग्रेस की तूती बोलती थी, वहीं 90 के दशक के बाद यह बीजेपी का 'अभेद्य किला' बन गई.
हालांकि, बीच में एक ऐसा मोड़ भी आया, जिसने हर सियासी पंडित के समीकरण बिगाड़ दिए. आइए समझते हैं लखनऊ कैंट का पूरा चुनावी लेखा-जोखा...
90 के दशक में 'राम लहर'
1950 से लेकर 1980 के दशक तक लखनऊ कैंट पर कांग्रेस का एकतरफा कब्जा था, लेकिन 1991 में राम मंदिर आंदोलन और 'राम लहर' के दौर में सियासी हवा बदली और यह सीट भाजपा के खाते में चली गई. इसके बाद लगातार दो दशकों तक भाजपा ने यहां अपनी पकड़ इतनी मजबूत कर ली कि इसे 'कमल का पक्का गढ़' माना जाने लगा.
2012 का वो 'सियासी मोड़', जिसने सबको चौंकाया
1991 के बाद से कैंट सीट पर लगातार कमल खिल रहा था, लेकिन 2012 के विधानसभा चुनाव में बड़ा उलटफेर हुआ. कांग्रेस की दिग्गज नेता डॉ. रीता बहुगुणा जोशी ने भाजपा के अजेय माने जाने वाले नेता सुरेश चंद्र तिवारी को 21,753 वोटों के बड़े अंतर से पटखनी दे दी. 2012 में रीता बहुगुणा जोशी को 63,052 वोट मिले थे, जबकि सुरेश चंद्र तिवारी 41,299 वोटों पर सिमट गए थे. इस जीत ने कैंट में कांग्रेस का वनवास खत्म कर दिया था.
रीता बहुगुणा बनाम अपर्णा यादव
कैंट सीट का सबसे बड़ा ट्विस्ट 2017 के चुनावों में देखने को मिला, जब रीता बहुगुणा जोशी खुद कांग्रेस छोड़कर भाजपा के पाले में आ गईं. भाजपा ने उन्हें कैंट सीट से मैदान में उतारा. इस बार उनका मुकाबला मुलायम सिंह यादव की छोटी बहू और सपा प्रत्याशी अपर्णा यादव से था. रीता बहुगुणा जोशी ने 95,402 वोट हासिल कर अपर्णा यादव को 33,796 वोटों के अंतर से करारी शिकस्त दी और कैंट सीट दोबारा भाजपा की झोली में डाल दी.
2019 का उपचुनाव और 2022 का नया रिकॉर्ड
2019 में रीता बहुगुणा जोशी के सांसद बनने के बाद कैंट सीट खाली हुई, जिस पर हुए उपचुनाव में भाजपा के सुरेश चंद्र तिवारी ने 56,684 वोट पाकर सपा के मेजर आशीष चतुर्वेदी (21,256 वोट) को 35,428 वोटों से हराया. इसके बाद 2022 के आम चुनाव में भाजपा ने यहां से डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक को मैदान में उतारा. ब्रजेश पाठक ने कैंट सीट पर अब तक का सबसे शानदार प्रदर्शन करते हुए रिकॉर्ड 1,08,147 वोट हासिल किए. उन्होंने 39,512 वोटों के अंतर से जीत दर्ज कर इस सीट को भाजपा का 'अभेद्य किला' साबित कर दिया.
क्यों खास है कैंट की राजनीति?
लखनऊ कैंट को केवल 'भाजपा का गढ़' कह देना इसके इतिहास के साथ नाइंसाफी होगी. यह सीट दर्शाती है कि यहां का मतदाता किसी पार्टी का अंधभक्त नहीं, बल्कि चेहरे, विजन और माहौल को देखकर वोट देता है. कांग्रेस का गढ़ बनना, फिर भाजपा का कब्जा होना, फिर रीता बहुगुणा का कांग्रेस की वापसी कराना और फिर भाजपा का रिकॉर्ड मतों से जीतना लखनऊ कैंट का यह सियासी सफर इसे यूपी की सबसे दिलचस्प सीटों में से एक बनाता है.