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कौशांबी के दारानगर में 247 वर्षों से चली आ रही ऐतिहासिक रामलीला में परंपरा और रोमांच का अनूठा संगम देखने को मिल रहा है. यहां रामदल और रावण दल के सेनानियों के बीच कुप्पी युद्ध का आयोजन हुआ, जिसे देखने के लिए दूर-दराज के जनपदों और बड़े शहरों से दर्शक पहुंच रहे हैं. युद्ध के रोमांचक दृश्यों के बीच मेले में भारी भीड़ उमड़ रही है. वहीं, सुरक्षा व्यवस्था को लेकर पुलिस और प्रशासन भी मुस्तैद है.
कौशांबी के दारानगर की ऐतिहासिक रामलीला, जहां 247 वर्षों से चली आ रही परंपरा आज भी लोगों के आकर्षण का केंद्र बनी हुई है. रामलीला के दौरान आयोजित कुप्पी युद्ध में रामदल और रावण दल के सेनानी आमने-सामने नजर आए. दोनों ओर के 25 से 30 सेनानियों ने युद्धक्षेत्र में अपने युद्ध कौशल का प्रदर्शन किया.
कुप्पी युद्ध के रोमांचक दृश्य देखने के लिए आसपास के जनपदों के साथ बड़े महानगरों से भी दर्शक पहुंचे. मेले में लोगों की भारी भीड़ जुटी. आज का कुप्पी युद्ध चार चरणों में संपन्न हुआ, जबकि अगले दिन तीन चरणों में युद्ध का आयोजन किया जाएगा.
ऐतिहासिक आयोजन के दौरान शांति और सुरक्षा बनाए रखने के लिए प्रशासन सतर्क है. एसडीएम सिराथू प्रमेश श्रीवास्तव और सीओ सत्येंद्र तिवारी मौके पर मौजूद रहे. मेले में भारी पुलिस बल तैनात किया गया है, ताकि श्रद्धालु और दर्शक शांतिपूर्ण माहौल में इस ऐतिहासिक परंपरा का आनंद ले सकें.
कुल मिलाकर, दारानगर की 247 साल पुरानी रामलीला आज भी आस्था, परंपरा और सांस्कृतिक विरासत को जीवंत बनाए हुए है. कुप्पी युद्ध का रोमांच हो या रामायण के प्रसंगों का सजीव मंचन, हर दृश्य लोगों को अपनी ओर आकर्षित कर रहा है.
वहीं, कौशांबी के शहजादपुर में रामलीला की परंपरा कुछ अलग है. यहां कागज का रावण नहीं जलाया जाता, बल्कि पत्थर के विशालकाय रावण का प्रतीकात्मक वध होता है. पत्थर से बना रावण अपने पूरे परिवार के साथ आज भी यहां की ऐतिहासिक परंपरा की गवाही दे रहा है.
यहां रावण के साथ मेघनाद, मंदोदरी और परिवार के दूसरे सदस्यों की पत्थर की मूर्तियां भी स्थापित हैं. रामलीला का स्वरूप देश की दूसरी रामलीलाओं से अलग है. यहां दशहरे पर कागज के रावण का पुतला जलाने के बजाय, राम और रावण के युद्ध के दौरान विशालकाय पत्थर की मूर्ति का प्रतीकात्मक वध किया जाता है. शहजादपुर की यह अनूठी परंपरा रामलीला की ऐतिहासिक विरासत और स्थानीय संस्कृति की एक खास पहचान है.