)
मध्य प्रदेश के राजगढ़ जिले के ब्यावरा में रहने वाले बीएससी छात्र सुरेंद्र सिंह चौधरी, जिन्हें सोशल मीडिया पर 'बिट्टू तबाही' के नाम से जाना जाता है, इन दिनों चर्चा में हैं. वजह है उनकी ऐसी मुहिम, जिसकी जिम्मेदारी आमतौर पर किसी नगर निकाय या प्रशासन की होती है. बिट्टू लंबे समय से गंदगी से भरी अजनार नदी में उतरकर प्लास्टिक, बोतलें, खरपतवार और दूसरी गंदगी निकाल रहे हैं.
बिट्टू के नदी सफाई वाले वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुए तो लोगों ने उनकी मेहनत की तारीफ शुरू कर दी. किसी ने उन्हें मिसाल बताया तो किसी ने पूछा कि आखिर जिस काम के लिए सरकारी सिस्टम है, वह एक छात्र अपने हाथों से क्यों कर रहा है. लेकिन बिट्टू की कहानी सामने आते ही भारत के उन लोगों की याद भी ताजा हो गई, जिन्होंने अपने सामने खड़ी किसी बड़ी समस्या को देखकर यही सोचा था कि शुरुआत कोई तो करे.
भारत में ऐसे उदाहरणों की कमी नहीं है. फर्क सिर्फ इतना है कि किसी ने पानी की समस्या देखकर तालाब खोदना शुरू किया, किसी ने जंगल बनाने के लिए पौधे लगाए और किसी ने सड़क पर पड़े गड्ढों को भरना शुरू कर दिया. इन लोगों के पास न बड़ी टीम थी, न कोई खास मशीनरी. उनके पास बस एक समस्या थी, उसे बदलने की जिद थी और काम शुरू करने का हौसला था.
जम्मू-कश्मीर के बिलाल अहमद डार की कहानी भी कुछ ऐसी ही है. जब वह नौजवान थे, तभी उन्होंने कश्मीर की वुलर झील से प्लास्टिक और दूसरी गंदगी निकालना शुरू कर दिया था. वह झील से निकले कचरे को बेचकर अपने परिवार की मदद भी करते थे. उनका काम धीरे-धीरे लोगों की नजर में आया और साल 2017 में श्रीनगर नगर निगम ने उन्हें स्वच्छता का ब्रांड एंबेसडर भी बनाया.
बिलाल के लिए यह काम सिर्फ पर्यावरण बचाने की कोशिश नहीं था. झील से निकलने वाला कचरा उनके लिए कमाई का एक जरिया भी था. लेकिन इसी काम के दौरान उन्होंने झील की हालत को करीब से देखा. वह लगातार कचरा निकालते रहे और उनकी मेहनत ने यह दिखाया कि किसी जगह को साफ रखने की शुरुआत सिर्फ सरकारी सफाई टीम से नहीं, बल्कि एक आम इंसान से भी हो सकती है.
कर्नाटक के चरवाहे कलमने कामेगौड़ा ने पानी की कमी को अपनी जिंदगी का मिशन बना लिया था. मंड्या जिले के दासनदोड्डी गांव के आसपास उन्होंने अपने दम पर एक के बाद एक तालाब खोदने शुरू किए. बताया जाता है कि उन्होंने 16 से ज्यादा तालाब तैयार किए. इनका फायदा सिर्फ इंसानों को नहीं, बल्कि जानवरों और पक्षियों को भी मिला.
कामेगौड़ा ने यह काम किसी बड़े प्रोजेक्ट की तरह नहीं शुरू किया था. वह धीरे-धीरे तालाब खोदते गए और पानी जमा करने की जगह बनाते गए. उनकी मेहनत की चर्चा गांव से बाहर पहुंची तो देशभर में लोग उनके बारे में जानने लगे. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी उनके काम की तारीफ की थी. साल 2022 में उनके निधन के बाद भी उनकी बनाई मिसाल कायम है.
असम के जादव पायेंग को दुनिया 'फॉरेस्ट मैन ऑफ इंडिया' के नाम से जानती है. ब्रह्मपुत्र नदी के एक बंजर रेतीले इलाके पर उन्होंने दशकों पहले पेड़ लगाना शुरू किया था. एक-दो पौधे लगाने से शुरू हुई यह कोशिश सालों तक चलती रही. धीरे-धीरे वही जगह बड़े जंगल में बदल गई, जिसे आज 'मोलाई फॉरेस्ट' के नाम से जाना जाता है.
जादव पायेंग की मेहनत का नतीजा आज एक हजार एकड़ से ज्यादा में फैले जंगल के रूप में दिखाई देता है. इस इलाके में पेड़ों के साथ कई तरह के जंगली जानवर भी रहते हैं. जिस जमीन को कभी बंजर माना जाता था, वहां आज हरियाली दिखाई देती है. पर्यावरण के लिए उनके काम को देखते हुए उन्हें साल 2015 में पद्म श्री से सम्मानित किया गया.
मुंबई के दादाराव बिल्होरे की कहानी थोड़ी अलग और बेहद दर्दनाक है. साल 2015 में उनके 16 साल के बेटे प्रकाश की सड़क पर गड्ढे से जुड़े हादसे में मौत हो गई. इस घटना ने दादाराव की जिंदगी बदल दी. उन्होंने तय किया कि जो उनके परिवार के साथ हुआ, वह किसी दूसरे परिवार के साथ न हो. इसके बाद उन्होंने मुंबई की सड़कों के गड्ढे भरने शुरू कर दिए.
दादाराव निर्माण स्थलों से मिलने वाली रेत और गिट्टी जमा करते और उनका इस्तेमाल सड़क के गड्ढे भरने में करते. उनके पास कोई सरकारी टीम नहीं थी. वह अपने स्तर पर यह काम करते रहे. करीब तीन साल में उन्होंने लगभग 600 गड्ढे भर दिए. उनकी कोशिश के पीछे कोई अवॉर्ड या शोहरत नहीं थी, बल्कि अपने बेटे को खोने का दर्द था.
और फिर आती है बिहार के दशरथ मांझी की कहानी, जो शायद भारत में 'एक इंसान की ताकत' का सबसे बड़ा उदाहरण है. गया के गेहलौर के रहने वाले मांझी ने मजदूरी करते हुए एक पहाड़ी के बीच से रास्ता बनाने का फैसला किया. उनके पास बड़ी मशीनें नहीं थीं. हाथ में छेनी और हथौड़ा था. इसी से उन्होंने करीब 22 साल तक पहाड़ को काटना जारी रखा.
मांझी की मेहनत से करीब 110 मीटर लंबा रास्ता तैयार हुआ. इससे अत्री और वजीरगंज इलाके के बीच की दूरी लगभग 55 किलोमीटर से घटकर करीब 15 किलोमीटर रह गई. लोग उन्हें प्यार से 'माउंटेन मैन' कहने लगे. साल 2007 में उनका निधन हो गया, लेकिन पहाड़ को काटकर रास्ता बनाने की उनकी कहानी आज भी लोगों को यह बताती है कि लगातार कोशिश के सामने बड़ी से बड़ी मुश्किल छोटी पड़ सकती है.
बिट्टू तबाही की अजनार नदी सफाई मुहिम को इसी नजर से देखा जा सकता है. वह न तो पहले ऐसे भारतीय हैं और न ही शायद आखिरी, जिन्होंने किसी बड़ी समस्या को देखकर खुद काम शुरू किया. उनके हाथ में इस बार छेनी या फावड़ा नहीं, बल्कि नदी से कचरा निकालने का जज्बा है. फर्क सिर्फ इतना है कि आज उनके काम को सोशल मीडिया कैमरे के जरिए लाखों लोग देख रहे हैं.
इन सभी लोगों की कहानियां अलग हैं, लेकिन एक बात समान है. इन्होंने यह नहीं सोचा कि समस्या इतनी बड़ी है कि अकेला इंसान क्या कर सकता है. उन्होंने उल्टा सवाल किया कि अगर कोई शुरुआत ही न करे तो बदलाव आएगा कैसे? यही सोच किसी को पहाड़ काटने तक ले गई, किसी को जंगल उगाने तक और किसी को नदी में उतरकर गंदगी निकालने तक.
बिट्टू तबाही की कहानी भी अभी जारी है. उनकी मेहनत पर सवाल उठाने वाले लोग हैं, सोशल मीडिया पर तारीफ करने वाले लोग भी हैं. लेकिन इन पुराने उदाहरणों से एक बात साफ होती है कि बदलाव हमेशा बड़ी घोषणा से शुरू नहीं होता. कई बार एक आम इंसान चुपचाप पहला कदम उठाता है और बाकी लोग बाद में उस रास्ते पर चलना शुरू करते हैं. शायद यही वजह है कि दशरथ मांझी, जादव पायेंग, बिलाल डार, दादाराव बिल्होरे और कलमने कामेगौड़ा जैसे नाम आज भी याद किए जाते हैं.