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आमतौर पर अस्पताल या क्लिनिक में डॉक्टर की फीस पहले से तय होती है. मरीज की जेब में कितने पैसे हैं, इससे फीस पर कोई फर्क नहीं पड़ता. लेकिन अहमदाबाद के डॉ. नंदलाल मनसेटा ने इस आम सिस्टम को अपने तरीके से बदल दिया है.
81 साल की उम्र में भी वह मरीजों का इलाज कर रहे हैं और उनकी कोशिश है कि पैसों की कमी किसी जरूरतमंद को डॉक्टर तक पहुंचने से न रोके. उनके क्लिनिक में फीस का फैसला बीमारी या इलाज की जटिलता से ज्यादा मरीज की कमाई के आधार पर होता है. इसके लिए बाकायदा उनके क्लिनिक के बाहर रेट का बोर्ड लगा हुआ है.
डॉ. मनसेटा के क्लिनिक में फीस का नियम सुनने में जितना आसान है, उतना ही दिलचस्प भी. अगर कोई मरीज महीने में 1,000 रुपये कमाता है तो उसे इलाज के लिए सिर्फ 10 रुपये देने होते हैं. इसी तरह 10,000 रुपये महीने कमाने वाले मरीज से 100 रुपये फीस ली जाती है. अगर किसी की महीने की कमाई 1 लाख रुपये है तो उसकी फीस 1,000 रुपये होगी. मतलब उनकी फीस का सीधा हिसाब मरीज की कमाई से जुड़ा है. इस सिस्टम में किसी तरह का लंबा हिसाब-किताब या मोलभाव नहीं है. मरीज अपनी कमाई बताता है और उसी के हिसाब से फीस तय हो जाती है.
इसकी सबसे खास बात उन लोगों के लिए है, जिनके पास देने के लिए कुछ भी नहीं है. डॉ. मनसेटा के यहां अगर किसी मरीज की कमाई शून्य है तो उससे कोई फीस नहीं ली जाती. मरीज इलाज कराने के बाद अपनी क्षमता के हिसाब से क्लिनिक में रखे एक छोटे से डोनेशन बॉक्स में पैसे डाल सकता है. लेकिन यह उसकी मजबूरी नहीं है. जिसके पास पैसे नहीं हैं, उसके लिए इलाज का दरवाजा बिना किसी फीस के खुला है.
इस व्यवस्था को और खास बनाता है डॉक्टर का अपने मरीजों पर किया गया भरोसा. आम तौर पर किसी आर्थिक रूप से कमजोर व्यक्ति को मुफ्त या कम फीस में इलाज देने के लिए उसकी इनकम से जुड़े कागजात मांगे जा सकते हैं. लेकिन डॉ. मनसेटा के यहां ऐसा नहीं बताया गया है. वह मरीज की बात पर भरोसा करते हैं. इसके लिए इनकम सर्टिफिकेट या दूसरे कागज दिखाने की जरूरत नहीं होती. यानी डॉक्टर ने इस सिस्टम को कागजों से ज्यादा इंसान की ईमानदारी पर रखा है.
डॉ. मनसेटा के इस फैसले के पीछे सिर्फ गरीब मरीजों की मदद करने की इच्छा नहीं, बल्कि उनकी अपनी सोच भी है. उनका मानना है कि जिंदगी में उन्हें जो कुछ मिला है, उसमें समाज और सरकार का भी योगदान रहा है. इसी वजह से वह मानते हैं कि अब समाज के लिए कुछ करने की बारी उनकी है. उनके लिए मरीज का इलाज सिर्फ एक मेडिकल प्रोफेशन नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी भी है. यही सोच शायद वजह है कि 81 साल की उम्र में भी उन्होंने मरीजों से दूरी नहीं बनाई है.
उम्र बढ़ने के साथ आमतौर पर लोग काम की रफ्तार कम कर देते हैं. आराम को प्राथमिकता मिलने लगती है. लेकिन डॉ. मनसेटा की कहानी कुछ अलग है. ईएनटी सर्जन के तौर पर लंबे समय तक काम करने के बाद भी उनका मरीजों से जुड़ाव बना हुआ है. उनके क्लिनिक का फीस मॉडल बताता है कि वह इलाज को सिर्फ पैसे कमाने का जरिया नहीं मानते. खासकर ऐसे मरीजों के लिए यह व्यवस्था बड़ी राहत हो सकती है, जिनके लिए डॉक्टर की फीस ही इलाज के रास्ते में सबसे बड़ी अड़चन बन जाती है.
डॉ. मनसेटा की कहानी इंटरनेट पर तब चर्चा में आई, जब 'द बेटर इंडिया' ने उनके बारे में जानकारी शेयर की. इसके बाद सोशल मीडिया पर बड़ी संख्या में लोगों ने उनके काम की तारीफ की. किसी ने उन्हें गरीबों का मसीहा बताया तो किसी ने कहा कि सबसे खास बात यह है कि डॉक्टर मरीजों से उनकी आर्थिक स्थिति साबित करने के लिए कागज नहीं मांगते. कई लोगों ने इस भरोसे को ही उनके काम की सबसे बड़ी खूबसूरती बताया. सोशल मीडिया पर आई प्रतिक्रियाओं में डॉक्टर के काम को लेकर सम्मान और भावुकता दोनों नजर आई.
सोशल मीडिया पर शेयर की गई जानकारी में यह भी दावा किया गया है कि डॉ. मनसेटा फाउंडेशन ने अब तक हजारों जरूरतमंद मरीजों की सर्जरी का पूरा खर्च उठाने में मदद की है. अगर कोई मरीज इलाज का खर्च उठाने की स्थिति में नहीं है तो उसके लिए इस तरह की मदद बेहद अहम हो जाती है. हालांकि, ऐसे आंकड़ों की स्वतंत्र पुष्टि अलग से जरूरी है, लेकिन डॉक्टर की फीस का यह मॉडल अपने आप में लोगों का ध्यान खींचने के लिए काफी है.
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