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आज के दौर में इंटरनेट हमारी जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुका है. किसी के पास कुछ जरूरी जानकारी भेजनी हो या फिर ऑनलाइन शॉपिंग लगभग हर काम के लिए इंटरनेट का इस्तेमाल किया जाता है. लेकिन क्या आपने कभी सोचा कि डिजिटल दुनिया की शुरुआत कैसे हुई? पहला मैसेज किसने, कैसे और कब भेजा? आपको जानकर हैरानी होगी कि डिजिटल दुनिया की शुरुआती इतिहास में पहला मैसेज भेजने के प्रयास में ही सिस्टम क्रैश हो गया था. तो आइए आज जानते हैं डिजिटल दुनिया के पहले मैसेज की दिलचस्प कहानी.
29 अक्टूबर 1969 को रात के करीब 10:30 बजे, अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया, लॉस एंजिल्स और स्टैनफोर्ड रिसर्च इंस्टीट्यूट के बीच आज से 57 साल पहले पहला नेटवर्क कनेक्शन स्थापित किया गया. 29 अक्तूबर को अमेरिका में ARPANET नाम के शुरुआती कंप्यूटर नेटवर्क के जरिए दो अलग-अलग जगहों पर मौजूद कंप्यूटरों के बीच पहली बार मैसेज भेजने का सफल प्रयास किया गया था. इस घटना को आधुनिक इंटरनेट के इतिहास में एक महत्वपूर्ण घटना माना जाता है.
दुनिया के शुरुआती कंप्यूटर नेटवर्क ARPANET पर यह प्रयोग अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया, लॉस एंजिल्स (UCLA) और स्टैनफोर्ड रिसर्च इंस्टीट्यूट (SRI) के बीच हुआ था. दोनों संस्थानों के कंप्यूटर एक नेटवर्क से कनेक्ट थे, जिसके जरिए उनके बीच डेटा भेजने की कोशिश की गई. UCLA में मौजूद ग्रेजुएट स्टूडेंट और प्रोग्रामर चार्ली क्लाइन ने यह मैसेज भेजा था, वहीं रिसीवर के रूप में दूसरी तरफ कंप्यूटर स्क्रीन के सामने थे स्टैनफोर्ड रिसर्च इंस्टीट्यूट में बिल डुवॉल. दोनों के बीच फोन पर भी संपर्क था, जिससे मैसेज पहुंचने की पुष्टि की जा सके.
चार्ली क्लेन का इरादा स्टैनफोर्ड वाले कंप्यूटर पर LOGIN शब्द टाइप करने का था. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. क्लाइन ने सबसे पहले L टाइप किया और दूसरी तरफ से इसकी पुष्टि मिल गई. इसके बाद उन्होंने O टाइप किया, इसे भी दूसरी तरफ रिसीव कर लिया गया. लेकिन जैसे ही उन्होंने तीसरा अक्षर G भेजने की कोशिश की, सिस्टम क्रैश हो गया और कनेक्शन टूट गया.
इस तरह उस प्रयोग के दौरान दूसरे कंप्यूटर तक पहुंचने वाला पहला मैसेज सिर्फ LO बन गया. यह मैसेज कोई जानबूझकर नहीं सेलेक्ट किया गया था, बल्कि LOGIN टाइप करने के दौरान सिस्टम क्रैश होने के कारण तकनीकी गड़बड़ी का नतीजा था. बाद में समस्या ठीक की गई और पूरी कमांड भेजने में सफलता मिली.
इस मैसेज को भेजने वाला कंप्यूटर नेटवर्क का नाम ARPANET यानी Advanced Research Projects Agency Network था. इसे अमेरिका की एडवांस्ड रिसर्च प्रोजेक्ट्स एजेंसी यानी ARPA की सहायता से तैयार किया गया था. उस समय कंप्यूटर बड़े, महंगे और खास जगहों जैसे यूनिवर्सिटी या फिर रिसर्च सेंटर पर हुआ करते थे. अलग-अलग जगहों पर मौजूद कंप्यूटरों के बीच जानकारी शेयर करना आसान काम नहीं हुआ करता था. ARPANET का उद्देश्य ऐसे कंप्यूटरों को नेटवर्क के जरिए कनेक्ट करना था, जिससे वे एक-दूसरे के साथ डेटा को आसानी से शेयर कर सकें. इस नेटवर्क में डेटा भेजने के लिए पैकेट स्विचिंग जैसी तकनीकों का इस्तेमाल किया गया, जिसने कंप्यूटर नेटवर्किंग के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.
UCLA की टीम का नेतृत्व कर रहे लियोनार्ड क्लेनरॉक ने कहा कि 'जब हमने वह पहला मैसेज भेजा, तो उस बड़ी घटना को रिकॉर्ड करने के लिए कोई रिपोर्टर, कैमरा, टेप रिकॉर्डर या लिखने वाला नहीं था. हम जानते थे कि हम एक जरूरी नई टेक्नोलॉजी बना रहे हैं जो हमें उम्मीद थी कि आबादी के एक हिस्से के काम आएगी, लेकिन हमें नहीं पता था कि यह कितनी बड़ी घटना थी.'
1969 में शुरू हुआ ARPANET आगे चलकर कंप्यूटर नेटवर्किंग के विकास की नींव का एक अहम हिस्सा बना. समय के साथ इसमें नए संस्थान जुड़े और नेटवर्किंग टेक्नोलॉजी में बड़ा सुधार हुआ. 1983 में ARPANET ने TCP/IP प्रोटोकॉल अपनाया, जो अलग-अलग नेटवर्कों को आपस में कनेक्ट करने की दिशा में बड़ा कदम था.
ध्यान देने वाली बात यह है कि आज के समय में सुपरफास्ट इंटरनेट का विकास कई दशकों के रिसर्च और अलग-अलग तकनीकी उपलब्धियों का परिणाम है. इसे सिर्फ ARPANET की एक घटना से जोड़कर नहीं देखा जा सकता.