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क्या प्लास्टिक को खाकर भूख मिटाई जा सकती है? आप कहेंगे कि यह तो नामुमकिन है और प्लास्टिक खाना जानलेवा हो सकता है. लेकिन वैज्ञानिकों ने इस नामुमकिन को मुमकिन कर दिखाया है. मंगल ग्रह पर जाने वाले अंतरिक्ष यात्रियों के लिए वैज्ञानिकों ने एक ऐसा तरीका खोज निकाला है जिससे प्लास्टिक कचरे को प्रोसेस करके एक स्वादिष्ट और न्यूट्रिशियस कुकी में बदला जा सकता है. यह खोज सिर्फ अंतरिक्ष ही नहीं बल्कि धरती पर भी खाने की किल्लत को दूर कर सकती है.
मंगल ग्रह पर खाने का संकट
जब इंसान पहली बार मंगल ग्रह पर कदम रखेगा तो उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती रिसर्च की नहीं बल्कि जिंदा रहने की होगी. हर इंसान को जिंदा रहने के लिए खाना चाहिए होता है. लेकिन रेड प्लैनेट यानी मंगल पर खेती करना या खाना उगाना लगभग नामुमकिन है. अंतरिक्ष यात्री अपने साथ पूरी यात्रा के लिए राशन भी नहीं ले जा सकते क्योंकि ज्यादा वजन के साथ रॉकेट को उड़ाना बहुत मुश्किल और खर्चीला होता है. इसी वजह से वैज्ञानिकों को एक ऐसे तरीके की तलाश थी जिससे एस्ट्रोनॉट्स अंतरिक्ष में ही अपना खाना खुद बना सकें. इस प्रॉब्लम को सॉल्व करने के लिए सदर्न इलिनोइस यूनिवर्सिटी कार्बॉन्डल के रिसर्चर्स ने एक जादुई तरीका खोज निकाला है.

प्लास्टिक कचरा कैसे बन गया स्वादिष्ट खाना
रिसर्चर्स की टीम ने यह साबित कर दिखाया है कि हमारे घर में इस्तेमाल होने वाली प्लास्टिक की बोतलों और कचरे को प्रोसेस करके इंसानों के खाने लायक न्यूट्रिशियस फूड बनाया जा सकता है. इस पूरी प्रोसेस के लिए वैज्ञानिकों ने बायोरिएक्टर, जेनेटिकली इंजीनियर्ड यीस्ट और प्लास्टिक वेस्ट का इस्तेमाल किया है. इस खोज का मुख्य मकसद यह है कि जो प्लास्टिक हम कचरे में फेंक देते हैं, उसे छोटे-छोटे टुकड़ों में तोड़कर यीस्ट को खिलाया जाता है और फिर उससे प्रोटीन से भरपूर खाना तैयार होता है. इस नई खोज का नाम वैज्ञानिकों ने माइक्रोबाइट (µBite) रखा है.
क्या प्लास्टिक खाने से कोई खतरा नहीं होगा?
बहुत से लोग यह सोचकर हैरान हैं कि प्लास्टिक से बना खाना शरीर को नुकसान क्यों नहीं पहुंचाएगा. इस बात को रिसर्च टीम के हेड डॉ लाहिरू जयाकोडी ने एक बहुत ही सिंपल एग्जांपल से समझाया है. उन्होंने कहा कि जब हम गाय का दूध पीते हैं तो इसका मतलब यह नहीं होता कि हम घास खा रहे हैं, भले ही गाय ने घास ही क्यों न खाई हो. घास एक रॉ मटीरियल है जो गाय को दूध बनाने की ताकत देता है. ठीक उसी तरह जब यीस्ट प्लास्टिक के टुकड़ों को खाता है तो प्लास्टिक का केमिकल खत्म हो जाता है और सिर्फ न्यूट्रिशन बचता है. इसलिए यह कुकी पूरी तरह से सेफ और खाने लायक होती है.

PET प्लास्टिक का इस्तेमाल ही क्यों किया गया?
वैज्ञानिकों ने इस प्रयोग के लिए सबसे पहले पॉलीइथाइलीन टेरेफ्थेलेट प्लास्टिक (PET) का चुनाव किया. यह वही प्लास्टिक है जिससे पानी की बोतलें और खाने की पैकेजिंग बनती है. PET प्लास्टिक को चुनने की सबसे बड़ी वजह यह है कि इसमें हैवी मेटल्स या हानिकारक केमिकल्स नहीं होते हैं. अगर हम कचरे के ढेर से कोई भी रैंडम प्लास्टिक उठा लेंगे तो उसमें जहरीले तत्व हो सकते हैं. इसलिए फिलहाल सिर्फ सेफ और क्लीन प्लास्टिक का ही इस्तेमाल किया जा रहा है ताकि इंसानी शरीर को कोई नुकसान न पहुंचे.
लैब में कैसे बनती है प्लास्टिक से कुकी
प्लास्टिक से खाना बनाने की यह प्रोसेस वाकई किसी साइंस फिक्शन फिल्म जैसी लगती है.
स्टेप 1 (हीट और प्रेशर): सबसे पहले PET प्लास्टिक को पानी और ऑक्सीजन के साथ लगभग 250 से 280 डिग्री सेल्सियस तापमान पर गर्म किया जाता है. इसके साथ ही इस पर समुद्र की गहराई जैसा बहुत तेज प्रेशर डाला जाता है. इससे प्लास्टिक पिघलकर छोटे-छोटे ऑर्गेनिक कंपाउंड्स में टूट जाता है.
स्टेप 2 (यीस्ट का खाना): इसके बाद इस लिक्विड में खास तरह की यीस्ट मिलाई जाती है. यह यीस्ट प्लास्टिक के टुकड़ों को खाकर उसे सिंपल मॉलिक्यूल्स जैसे फैट्स, प्रोटीन्स और विटामिन्स में बदल देती है.
स्टेप 3 (स्वाद और 3D प्रिंटिंग): यीस्ट से जो मिक्सचर तैयार होता है, वह देखने में बहुत अच्छा नहीं लगता. इसलिए वैज्ञानिक उसमें वैनिला फ्लेवर, फाइबर, स्टार्च और कलर मिलाते हैं. इसके बाद 3D प्रिंटर की मदद से इसे एक गोल बिस्किट की शेप में प्रिंट कर लिया जाता है.

स्पेस मिशन में कैसे काम आएगी यह मशीन
नासा अपने डीप स्पेस फूड चैलेंज के तहत इस प्रोजेक्ट पर काम कर रहा है. नासा का प्लान साल 2030 तक इंसानों को चांद पर और उसके बाद मंगल ग्रह पर भेजने का है. अंतरिक्ष यान में एक छोटा बायोरिएक्टर और 3D प्रिंटर आसानी से फिट हो सकता है. यह छोटा सा सेटअप तीन एस्ट्रोनॉट्स की रोज की प्रोटीन की जरूरत को आराम से पूरा कर सकता है. अंतरिक्ष यात्रियों को बस अपने साथ प्लास्टिक कचरा और बायोरिएक्टर ले जाना होगा और उन्हें ताजा खाना मिलता रहेगा.
धरती पर भी खत्म होगी भुखमरी की समस्या
यह टेक्नोलॉजी सिर्फ अंतरिक्ष तक ही सीमित नहीं रहने वाली है. धरती पर जब भी कोई प्राकृतिक आपदा आती है जैसे बाढ़ या भूकंप, तो वहाँ तक खाना पहुंचाना बहुत मुश्किल हो जाता है. ऐसे समय में यह बायोरिएक्टर मशीन वरदान साबित हो सकती है. इसके अलावा रेगिस्तान, बर्फीले इलाकों या सबमरीन में तैनात जवानों के लिए भी यह मशीन बहुत काम आएगी. अगर इस मशीन का साइज बड़ा कर दिया जाए तो एक बार में 100 किलोग्राम से भी ज्यादा प्रोटीन फूड तैयार किया जा सकता है.
पर्यावरण को बचाने में मिलेगी बड़ी मदद
हर साल पूरी दुनिया में 400 मिलियन टन से भी ज्यादा प्लास्टिक कचरा पैदा होता है. इसमें से ज्यादातर कचरा नदियों और समुद्रों में जाकर प्रदूषण फैलाता है. अगर हम प्लास्टिक कचरे का इस्तेमाल खाना बनाने या दवाइयां बनाने में करने लगेंगे तो इससे पर्यावरण को भी बहुत फायदा होगा. एडिनबर्ग यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने तो जेनेटिकली मॉडिफाइड बैक्टीरिया का इस्तेमाल करके प्लास्टिक से पार्किंसंस बीमारी की दवा तक बना ली है.