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कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे जी के हालिया बयान को लेकर जिस तरह से भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) हंगामा मचा रही है, वह मुख्य मुद्दों से ध्यान भटकाने की एक राजनीतिक कोशिश नजर आती है. खड़गे जी देश के सबसे अनुभवी नेताओं में से एक हैं और वे प्रधानमंत्री पद की गरिमा और मर्यादा को भली-भांति समझते हैं. उनका उद्देश्य कभी किसी का व्यक्तिगत अपमान करना नहीं रहा है.
भारतीय समाज और राजनीति में 'दादी याद दिलाना' या 'बाप की जागीर समझना' जैसे मुहावरे सदियों से आम बातचीत का हिस्सा रहे हैं. इनका इस्तेमाल किसी पर व्यक्तिगत हमला करने के लिए नहीं, बल्कि एक खास भाव और लहजे को व्यक्त करने के लिए किया जाता है. ठीक इसी तरह, 2025 में संसद में भाषण देते हुए गृह मंत्री अमित शाह जी ने भी "साला" शब्द का प्रयोग किया था, जो बोलचाल के अंदाज का हिस्सा था. मल्लिकार्जुन खड़गे जी का कल का बयान भी इसी आम बोलचाल की शैली में था. इसलिए, भाजपा का इस बात पर इतना बवाल खड़ा करना समझ से परे है.
श्री @kharge का उद्देश्य किसी के व्यक्तिगत अपमान का नहीं रहा है। वे भारत के सबसे अनुभवी राजनेताओं में से एक हैं और प्रधानमंत्री पद की गरिमा को समझते हैं। उनकी मंशा इस गरिमा के खिलाफ कभी हो ही नहीं सकती। "नानी याद दिला देना", "बाप की जागीर समझना" जैसे रिश्तों से जुड़े मुहावरे और लोकोक्तियां भारत की आम बोलचाल का हिस्सा हैं जो सदियों से चली आ रही हैं। जैसे 2025 में संसद में बोलते हुए गृहमंत्री श्री अमित शाह ने "साला" शब्द बोल दिया था। इनका अर्थ व्यक्तिगत न होकर भावनात्मक और अलंकारिक होता है। कल श्री खरगे ने जो कहा, वह भी इसी तरह की आम बोलचाल की शैली है इसलिए इस विषय पर भाजपा को हंगामा करने का अधिकार नहीं है। भाजपा को आज मर्यादा और अमर्यादित भाषा की बातें याद आ रही हैं, लेकिन जब वर्ष 2019 में प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने पूर्व प्रधानमंत्री एवं भारतीय उपमहाद्वीप में शांति स्थापित करने के प्रयासों के लिए शहीद होने वाले श्री राजीव गांधी के लिए अमर्यादित टिप्पणी की थी, तब भाजपा नेताओं की मर्यादा कहां चली गई थी? भाजपा को हर मुद्दे पर राजनीति करने और जनता का ध्यान भटकाने के बजाय लोकतंत्र से जुड़े गंभीर सवालों का जवाब देना चाहिए। कांग्रेस अध्यक्ष श्री मल्लिकार्जुन खरगे के बयान को लेकर भाजपा जिस तरह हंगामा कर रही है, उससे साफ है कि उसके पास जनता के असल मुद्दों पर जवाब देने के लिए कुछ नहीं है। जब उत्तराखंड के हल्द्वानी में श्री खरगे की जनसभा के बाद आरएसएस-भाजपा से जुड़े लोगों ने मंच का शुद्धिकरण किया था, तब यह गंभीर सवाल उठा था कि आखिर भाजपा और आरएसएस की विचारधारा में दलितों के प्रति इतनी घृणा क्यों है? कांग्रेस ने यह मुद्दा संसद में भी उठाया था। उस समय भाजपा के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री जे.पी. नड्डा ने मामले की जांच कराने की बात कही थी। आज सवाल है कि उस जांच का क्या हुआ? जांच के नतीजे जनता के सामने क्यों नहीं रखे गए? इससे भाजपा की कथनी और करनी का अंतर उजागर होता है। आज देश के सामने सबसे बड़ा सवाल वोट चोरी के आरोपों और चुनाव आयोग की निष्पक्षता का है। कांग्रेस, युवा पीढ़ी और पूरा विपक्ष लंबे समय से मुख्य चुनाव आयुक्त श्री ज्ञानेश कुमार की भूमिका को लेकर सवाल उठा रहा है। लेकिन इन सवालों पर केंद्रीय गृह मंत्री श्री अमित शाह ने कभी ऐसी गंभीरता नहीं दिखाई। जब विपक्ष और युवा अपने लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा के लिए आवाज़ उठाते हैं, तब भाजपा जवाब देने के बजाय उन्हें विदेशी ताकतों से जोड़ने और उनकी देशभक्ति पर सवाल उठाने लगती है।
— Ashok Gehlot (@ashokgehlot51) October 26, 2026
आज बीजेपी शिष्टाचार और भाषा की मर्यादा की बात कर रही है, लेकिन जब 2019 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने पूर्व प्रधानमंत्री और देश के लिए अपने प्राण न्योछावर करने वाले शहीद राजीव गांधी जी पर अभद्र टिप्पणी की थी, तब बीजेपी नेताओं की मर्यादा कहां चली गई थी? जब सवाल अपनी पार्टी की भाषा पर आता है तो चुप्पी साध ली जाती है और जब विपक्ष बोले तो हंगामा खड़ा कर दिया जाता है. यह दोहरा रवैया बीजेपी की राजनीति को साफ उजागर करता है.
बीजेपी हर मुद्दे का राजनीतिकरण करके जनता से जुड़े असल सवालों से भाग रही है. उत्तराखंड के हल्द्वानी में खड़गे जी की जनसभा के बाद जिस तरह आरएसएस-भाजपा से जुड़े लोगों ने मंच का 'पवित्रिकरण' या शुद्धि अनुष्ठान किया, उसने एक गंभीर सवाल खड़ा किया है: आखिर बीजेपी और आरएसएस की विचारधारा में दलित समाज के प्रति इतनी नफरत क्यों है?
जब कांग्रेस ने इस संवेदनशील मुद्दे को संसद में उठाया था, तब बीजेपी के तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष जे.पी. नड्डा जी ने आश्वासन दिया था कि इस मामले की जांच कराई जाएगी. लेकिन आज देश यह जानना चाहता है कि उस जांच का क्या हुआ? जांच के नतीजे जनता के सामने क्यों नहीं लाए गए? इससे साफ जाहिर होता है कि बीजेपी के कथनी और करनी में कितना बड़ा अंतर है.
आज देश के सामने सबसे बड़ा सवाल लोकतंत्र की रक्षा, वोट चोरी के आरोप और निर्वाचन आयोग की निष्पक्षता का है. देश का युवा, कांग्रेस और पूरा विपक्ष मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार की भूमिका को लेकर काफी समय से सवाल उठा रहा है. लेकिन इन गंभीर विषयों पर गृह मंत्री अमित शाह जी ने कभी वैसी गंभीरता नहीं दिखाई जैसी वे जुबानी विवादों पर दिखाते हैं.
जब भी विपक्ष और देश के युवा अपने लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा के लिए आवाज उठाते हैं, तो बीजेपी उनका जवाब देने के बजाय उन पर विदेशी ताकतों से जुड़े होने का आरोप लगा देती है और उनकी देशभक्ति पर सवाल उठाने लगती है. BJP को बयानबाजी पर राजनीति करने के बजाय देश के सामने खड़े इन गंभीर और असली सवालों का जवाब देना चाहिए.