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तेरहवीं पर ब्राह्मण को चटाई-लोटा और अनाज ही क्यों देते हैं? पितरों से क्‍या है इसका संबंध

हिंदू धर्म में मृत्‍यु के बाद होने वाले तेरहवीं संस्‍कार पर ब्राह्मणों को चटाई, लोटा और अनाज देने की परंपरा क्यों है? जानें इसके पीछे का धार्मिक महत्‍व और इनके पितरों से संबंध की मान्यता.

तेरहवीं पर ब्राह्मण को चटाई-लोटा और अनाज ही क्यों देते हैं? पितरों से क्‍या है इसका संबंध
Image Credit: तेरहवीें के बाद आसन/चटाई, लोटे और अनाज के दान के खास महत्‍व का उल्‍लेख गरुड़ पुराण में भी है. (Photo: AI)

गर्भ से लेकर मृत्‍यु तक के 16 संस्‍कारों में अन्‍तेयष्‍टी आखिरी संस्‍कार है, तेरहवीं इसी से जुड़ी अहम प्रक्रिया है. जिसमें कई अन्‍य सामाजिक परंपराओं को निभाने के साथ-साथ ब्राह्मणों को भोजन कराने के बाद उन्‍हें चटाई, लोटा और अनाज दान दिया जाता है. क्‍या आप जानते हैं कि तेरहवीं में इन तीनों चीजों का ही प्रमुखता से क्‍यों दान किया जाता है, साथ ही इनका पितरों से क्‍या संबंध है? धर्म-शास्‍त्रों में इन्‍हें किन प्रतीकों से जोड़ा गया है?

पितरों के निमित्‍त दान

हिंदू धर्म में मृतक की आत्‍मा की शांति के लिए तेरहवीं पर पिंडदान, श्राद्ध और ब्राह्मण भोज आदि कराया जाता है. इस समय ब्राह्मणों को कई चीजें जैसे- अनाज, कपड़े, चांदी, चटाई, लोटा आदि दान की जाती हैं, जिसमें चटाई, लोटा और अनाज का दान प्रमुख है. कई जगहों पर ऐसी मान्‍यता है कि यदि व्‍यक्ति सक्षम न हो तो केवल इन चीजों का दान करके भी मृतक की आत्‍मा को शांति पहुंचा सकता है. क्‍योंकि मान्‍यता है कि इन तीजों का पितरों से गहरा कनेक्‍शन होता है. गरुड़ पुराण में भी इसका उल्‍लेख मिलता है.

आसन या चटाई के दान के पीछे वजह

प्राकृतिक घास, प्लास्टिक, खजूर के पत्तों, नारियल के रेशों और तांत आदि से बनने वाले आसन/चटाई का उपयोग बैठने और विश्राम करने के लिए किया जाता है. पहले के समय में जब इतनी भौतिक सुख-सुविधाएं नहीं थीं, तब आसन और चटाई बहुत उपयोगी चीज हुआ करती थी.

पितरों से कनेक्‍शन: धार्मिक मान्‍यता है कि आसन या चटाई का दान करने से मृत्‍यु के बाद आत्‍मा को परलोक तक जाने के रास्‍ते में विश्राम करने का स्‍थान मिलता है.

लोटे के दान की वजह

इसी तरह लोटा भी पुराने समय में बहुत उपयोगी मानी गई वस्‍तुओं की श्रेणी में आता था. पानी पीने के लिए प्रमुखता से लोटे का ही उपयोग किया जाता था.

पितरों से कनेक्‍शन : हिंदू धर्म-शास्‍त्रों के अनुसार आत्‍मा के यमलोक पहुंचने तक का मार्ग बेहद कठिन होता है. ऐसे में आत्‍मा को रास्‍ते में प्‍यास लगती है. यदि ब्राह्मण को लोटे या जल पात्र का दान किया जाए तो उससे मिले पुण्‍य से आत्‍मा की प्‍यास शांत हो जाती है.

अनाज के दान की वजह

भोजन के बिना तो किसी भी युग में जीवन की कल्‍पना नहीं की जा सकती है.

पितरों से कनेक्‍शन : गरुड़ पुराण में ऐसा उल्‍लेख मिलता है कि आत्‍मा के यमलोक जाने के रास्‍ते में उसे क्षुधा यानी कि भूख लगती है. उसकी भूख शांत हो सके इसलिए ब्राह्मण को अनाज दान किया जाता है. ताकि आत्‍मा को ऊर्जा मिलती रहे और वह यमलोक तक पहुंच सके.

दान के व्‍यवहारिक और सामाजिक कारण

चूंकि कर्मकांड करने वाले ब्राह्मणों का जीवनयापन दान-दक्षिणा से मिले पैसे और चीजों से ही होता है. ऐसे में प्राचीनकाल से यह व्‍यवस्‍था रखी गई थी कि ब्राह्मणों को जीवनयापन में समस्‍या न हो इसलिए उन्‍हें पर्याप्‍त दान दिया जाए. इसलिए तेरहवीं समेत सभी खास मौकों पर ब्राह्मणों को दान-दक्षिणा देने की परंपरा है.

यदि तेरहवीं पर योग्‍य ब्राह्मण को चटाई, लोटा और अनाज जैसी उपयोगी वस्‍तुएं दी जाएं और वो उसका उपयोग करे तो उससे अर्जित पुण्‍य का लाभ मृतक की आत्‍मा को मिलता है. इसलिए तेरहवीं पर ब्राह्मणों को रोजमर्रा के उपयोग की कई चीजें छाता, बिस्‍तर (शैया दान), अनाज, बर्तन, पैसे आदि दान किए जाते हैं.

गरीबों को भी करें अन्‍नदान

हिंदू धर्म समेत अन्‍य कई धर्मों में भी गरीब-जरूरतमंदों को भोजन कराने को सबसे पुण्‍यदायी काम माना गया है. इसलिए अन्‍नदान को महादान की श्रेणी में रखा गया है. लिहाजा मृतक की आत्‍मा की शांति के लिए तेरहवीं और पितृ पक्ष में गरीबों को अनाज, भोजन का दान जरूर करना चाहिए.

(Disclaimer- इस लेख में दी गई जानकारी धार्मिक मान्यताओं, परंपराओं और प्रचलित मान्यताओं पर आधारित है. अलग-अलग क्षेत्रों, समुदायों और परिवारों में तेरहवीं एवं श्राद्ध से जुड़े रीति-रिवाज अलग हो सकते हैं. इसे किसी धार्मिक विधान का अनिवार्य नियम न माना जाए.) 

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About the Author

Shraddha Jain

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पत्रकारिता में 15 वर्षों का व्यापक अनुभव रखने वाली श्रद्धा जैन वर्तमान में Zee News की नेशनल डिजिटल टीम में बतौर असिस्‍टेंट न्‍यूज एडिटर सक्रिय हैं. जहाँ वे धर्म, ज्योतिष, ग्रह गोचर, अंक शास्‍त्र और वास्तु शास्त्र जैसे विषयों पर अपनी विशेषज्ञता के लिए जानी जाती हैं। उन्होंने मास कम्युनिकेशन में पोस्ट ग्रेजुएशन और सिम्बॉयसिस इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी से क्रिएटिव राइटिंग की पढ़ाई की है. बतौर फोटो जर्नलिस्ट करियर शुरू करने वाली श्रद्धा ने दूरदर्शन, दैनिक भास्कर और चौथी दुनिया जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में अपनी सेवाएं दी हैं.12 वर्षों की फील्ड रिपोर्टिंग के दौरान राजनीति और सामाजिक मुद्दों पर गहरी पकड़ बनाने के बाद, उन्होंने डिजिटल मीडिया की ओर रुख किया और देश 24*7 जैसे पोर्टल्स में नेतृत्व की भूमिका निभाई. वर्तमान में धर्म, ज्योतिष, वास्तु और हस्तरेखा जैसे विषयों पर गहन अध्ययन और लेखन करते हुए जटिल विषयों को सरल और रोचक भाषा में पाठकों के सामने पेश कर रही हैं.
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