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नवरात्रि का समय चल रहा है. जिसमें लोग माता का आशीर्वाद पाने के लिए तरह-तरह की चीजें करते हैं. कुछ लोग माता को प्रसन्न करने के लिए मखाने की खूबसूरत माला पहनाते हैं
जिसको बनाने के लिए सुई और धागे का इस्तेमाल होता है. लेकिन मान्यताओं की मानें तो सुई और धागे से पिरोकर बने मखाने की माला को नहीं चढ़ानी चाहिए.
उनको तो बिल्कुल ही नहीं करनी चाहिए जो माता के लिए व्रत हों. लेकिन अब लोगों के मन में ये सवाल आता है कि आखिर ऐसा क्यों नहीं करना चाहिए. आज हम इस खबर में इसके बारे में डिटेल से बताएंगे.
इसके पीछे भी एक कारण है. नवरात्र के छटवें दिन बिल्वाभिमंत्रण किया जाता है. ये अनुष्ठान है जो शारदीय नवरात्रि के दौरान ही होता है.
इसमें माता की आंखों को जागृत करने के लिए बेल के पेड़ की शाखाओं को चुना जाता है. जिसमें जोड़े में दो बेल हों.
ये वाली पूजा होने के बाद सप्तमी तिथि को बाजे-गाजे के साथ डोली में रखकर इन्हें लाया जाता है और इसी से माता के नेत्र खोले जाते हैं.
माना जाता है कि जब तक मां दुर्गा की आंखें न खुल जाएं, तक तक घर में सुई-धागे का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए.
ऐसा कहा जाता है कि अगर आपने सुई का इस्तेमाल माता से जुड़े किसी कार्य में सुई धागे का इस्तेमाल किसी चीज में किया तो वो माता की आंखों में चुभ सकती है.
इसी वजह से सबको नवरात्रि में सुई-धागे के इस्तेमाल करने के लिए रोका जाता है. लेकिन सप्तमी के बाद इसका इस्तेमाल किया जा सकता है.
ऐसा इसलिए क्योंकि माता की आंखे तक खुल चुकी होती हैं. सप्तमी के बाद अगर आप मखाने की माला चढ़ा सकते हैं.
ऐसा करना बहुत शुभ होता है. इस नियम का फॉलो करने से पूजा का पूरा फल मिलता है. मांदुर्गा का पूरा आशीर्वाद आपके परिवार पर बनी रहती है.
इतना ही नहीं नवरात्र के समय पर सुई को लेकर को टोटके भी किए जाते हैं. कहा जाता है कि नवरात्रि के दौरान देवी की योगिनी शक्तियां भी घूमती रहती हैं.
ये योगनी शक्तियां तंत्र-मंत्र और सिद्धियां देने का काम करती हैं. इसलिए सारे तांत्रिक एक्टिव हो जाते हैं.
वो काली शक्तियों को जगाने के लिए तंत्र साधना भी करते हैं. बहुत पहले से ऐसे नेगेटिव शक्तियों या नजर दोष से अपने बच्चों को बचाने के लिए हमारी मम्मी या माता लोग कुछ खास उपाय करती आई हैं.
आपने देखा होगा कि हमारे देश की माताएं काले रंग के कपड़े में ताबीज बनाकर बच्चों को पहनाती हैं, जिसमें पीली सरसों के साथ सुई को थोड़ा सा तोड़कर लपेट देती थी.
उनका मानना होता था कि इससे उनके बच्चों को नजर नहीं लगेगी.
(Disclaimer): इस लेख में दी गई समस्त जानकारी धार्मिक मान्यताओं, पारंपरिक लोक-विश्वासों और शास्त्रों में वर्णित नियमों पर आधारित है.