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क्या आप भी दान और दक्षिणा को एक ही समझते हैं? अंतर जान लें वरना पुण्य फल हो जाएगा शून्य

शास्त्रों के अनुसार दान-दक्षिणा एक नहीं हैं. इनके नियमों को जाने बिना दान और दक्षिणा देना आपके पुण्य फल को शून्य कर सकता है. शास्त्रों में दोनों के उद्देश्य और नियम अलग-अलग बताए गए हैं. दक्षिणा दिए बिना यज्ञ पूजा नहीं होता है और दान के नियमों का ध्यान न दें तो पुण्य प्राप्त नहीं होता.

क्या आप भी दान और दक्षिणा को एक ही समझते हैं? अंतर जान लें वरना पुण्य फल हो जाएगा शून्य

दान और दक्षिणा को लेकर लोगों में गहरा कन्फ्यूजन होता है, कइयों को तो ये लगता है कि ये दोनों एक ही हैं लेकिन ऐसा नहीं है. पुराने समय से ही दान और दक्षिणा दी जाती रही है और दोनों में ही कई अंतर हैं. सबसे बड़ी बात तो ये है कि दोनों ही क्रियाओं में सबसे बड़ा अंतर उद्देश्य का है. दान या दक्षिणा देते समय नियमों का हेर-फेर होने से पुण्य फल तुरंत शून्य हो जाएगा. हिंदू धर्मग्रंथों के अनुसार दक्षिणा यज्ञ, पूजा और अनुष्ठान के संपन्न होने के बाद दी जाती है. अगर दक्षिणा न दी जाए तो कोई भी कार्य-प्रयोजन को पूर्ण नहीं माना जाता है. वहीं, दूसरी ओर दान हमेशा जरूरतमंदों की मदद के भाव से किया जाता है. आइए जानें दान-दक्षिणा में अंतर और इन्हें देने के नियम क्या हैं?

दान और दक्षिणा के बीच अंतर

दक्षिणा का मतलब है कि किसी भी योग्य व्यक्ति को ही श्रद्धा, सम्मान और कृतज्ञता के भाव से शुद्ध और जरूरी वस्तुओं का दान देना चाहिए. पुराने समय में जब यज्ञ संपन्न हो जाता था तो पंडितों या ऋषियों को दक्षिणा दी जाती थी. गुरुकुल परंपरा में भी शिक्षा संपन्न होने पर शिष्य अपने गुरु को गुरु-दक्षिणा देते थे. यह केवल वस्तुओं का लेनदेन नहीं है बल्कि किसी योग्य व्यक्ति के लिए श्रद्धा और सेवा भाव से उसके प्रति आभार देने का एक माध्यम है. हालांकि, जब दान की बात आती है यह दक्षिणा से बिल्कुल अलग हो जाता है. कई बार लोग अपने मन की शांति और पुण्य प्राप्ति के लिए भी जरूरतमंदों में दान देते हैं. असहायों की मदद दान देकर करते हैं और समय-समय पर सामाजिक हित के लिए भी धन या सेवा का दान देते हैं. व्रत के अगले दिन भी दान किया जाता है ताकि व्रत का पूर्ण फल प्राप्त हो सके. मूल रूप से देखें तो दान और दक्षिणा को देते समय उससे जुड़े विचारों और उद्देश्यों में फर्क होता है. दान पुण्य कमाने के लिए दिया जाता है तो वहीं दक्षिणा योग्य व्यक्ति को आभार व सम्मान व्यक्त करने के लिए दिया जाता है.

दान और दक्षिणा देने के नियमों में भी अंतर

दक्षिणा देने का नियम
शास्त्रों के अनुसार, दक्षिणा देने का सबसे पहला नियम यही है कि किसी को भी हमेशा सच्चे हृदय से दी दक्षिणा दें न कि केवल दिखावे के लिए. जब दक्षिणा दी जाती है तो जरूरी होता है कि मन में श्रद्धा और प्रसन्नता की भावना हो. दक्षिणा छोटी हो या बड़ी हमेशा यज्ञ, पूजा या संस्कार पूर्ण होने के बाद विद्वान पंडित, आचार्य, धर्म के जानकार, धार्मिक आचरण करने वाले, सदाचारी और ज्ञान का पालन करने वाले को ही दें. व्यक्ति को दक्षिणा देने से जुड़े एक नियम का विशेष ध्यान देना चाहिए कि अपनी आर्थिक क्षमता के अनुसार ही किसी को दक्षिणा दें, न की किसी से धन मांगकर गलत तरह से धन कमाकर दक्षिणा दें.

दान देने का नियम
दान देने के भी कुछ नियम बताए गए हैं जैसे पूर्वाभिमुखी होकर दान दें और जो व्यक्ति दान ले रहा है वो उत्तराभिमुखी हो. इस तरह दिया गया दान आयु को बढ़ती है. इस तरह दान लेने वाले की आयु भी कम नहीं होती है. ध्यान रहे कि जब खुद जरूरतमंदों के पास जाकर दान दिया जाता है तो यह एक उत्तम दान माना जाता है. घर पर बुलाकर दिया गया दान मध्यम फलदायी माना गया है. किसी को भी दान दें इस बात का पूरा ध्यान रखें कि दान देते समय मन में घमंड की भावना न हो और न तो आप दान अकड़ में दे रहे हों.

शुभ वस्तुएं जो दक्षिणा में दी जाती हैं

दक्षिणा की वस्तुएं
आज के समय में दक्षिणा में लोग धन देना सबसे आसान समझते हैं. हालांकि, धन की जरूरत और उसका महत्व हर किसी के जीवन में है लेकिन पुराने समय में कई और वस्तुएं दक्षिणा में देना अति शुभ माना जाता है. पहले के समय गाय और अन्न दक्षिणा में देना उत्तम माना जाता था. धनी लोग अपनी क्षमता के अनुसार सोना और चांदी भी दक्षिणा में देते थे. वहीं, कम धनी या सामान्य लोग दक्षिणा में फल, गुड़, चना और तिल भी दक्षिणा में देते हैं. कुछ वैदिक यज्ञों और विशेष आयोजनों में घी, तिल और गुड़ भी दक्षिणा के रूप में देते हैं.  मान्यता के अनुसार इन चीजों को किसी भी अनुष्ठान के संपन्न होने के बाद देने से जीवन में समृद्धि आती है और पुण्य फलों की प्राप्ति होती है.

दान की वस्तुएं
जहां तक बात करें दान की तो कई ऐसे दान है जिन्हें शुभ और महादान माना गया है. किसी भी जरूरतमंद को गाय का दान, विद्या का दान, भूमि का दान, अंग का दान, सोने और धन का दान देना अति शुभ माना जाता है. ग्रंथ और पुस्तकों का दान भी अति शुभ माना जाता है. ब्राह्मणों और जरूरतमंदों को नए वस्त्र भी दान में दिए जा सकते हैं.

किन वस्तुओं को दान और दक्षिणा में न दें?

कौन सी वस्तुएं दक्षिणा में न दें
टूटे हुए बर्तन हो या खंडित प्रतिमाएं, फटे वस्त्र जैसी वस्तुएं दक्षिणा में देना अशुभ माना गया है. धार्मिक अनुष्ठान के बाद अगर दक्षिणा में अन्न, फल या मिष्ठान दे रहे हैं तो ध्यान रखें कि इनमें से कोइ भी चीज खराब, बासी या अशुद्ध नहीं होना चाहिए. बुरे तरीकों से कमाया गया धन को दान या दक्षिणा में नहीं देना चाहिए. अहंकार, प्रसिद्धि या प्रदर्शन के लिए अगर दक्षिणा दी गई हो तो इसका पुण्य फल प्राप्त नहीं होता है.

कौन सी वस्तुएं दान में न दें
बासी भोजन, फटे कपड़े का दान अशुभ माना गया है. इसके अलावा लोहे का सामान दान में देने से जीवन में शनि दोष बढ़ने लगता है. झाड़ू का दान देने से घर से देवी लक्ष्मी की कृपा चली जाती है और कैंची, चाकू जैसे धारदार सामानों का दान करने से रिश्ते बिगड़ते हैं. ध्यान रहे कि परिवार से झगड़कर अगर किसी को दान दिया जाए तो इसका अशुभ परिणाम दान देने वाले व्यक्ति के मृत्यु के बाद भी उसका पीछा नहीं छोड़ता है.

(डिस्क्लेमर: यह लेख धार्मिक मान्यताओं और शास्त्रों पर आधारित है. इसका उद्देश्य केवल जानकारी देना है, अंधविश्वास को बढ़ावा देना नहीं.)

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About the Author

Padma Shree Shubham

Padma Shree Shubham

पद्मा श्री शुभम् को पत्रकारिता के क्षेत्र में 10 साल का अनुभव. मॉस कम्‍युनिकेशन ग्रेजुएट और हिंदी लिटरेचर से पोस्‍ट ग्रेजुएट. मीडिया में डिजिटल प्लेटफॉर्म से करियर शुरू करने के बाद कई संस्थाओं में काम किया. Nedrick News, TFI Post जैसी संस्थाओं में कार्यरत रहीं. इसके बाद Zee News जॉइन किया. समाचार और वर्तमान घटनाओं पर लिखने पढ़ने में रुचि. धर्म और ज्योतिष में अधिक रुचि. वर्तमान में धर्म और ज्योतिष संबंधी लेख लिखने में कार्यरत. पद्मा से आप padma.shubham@India.com मेल के जरिए सीधे संपर्क कर सकते हैं.
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