हमेशा से ही कश्मीरी पंडितों की आस्था का केंद्र रहे शारदा पीठ आज के समय में भले ही पूरी तरह से खंडहर हो गया हो लेकिन इसकी मान्यताएं और इसका इतिहास इसे आज भी महाशक्तिपीठों में महत्वपूर्ण बनाता है. पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में स्थित शारदा शक्ति पीठ करीब 5000 साल पुराना मंदिर है. आइए इस प्राचीन मंदिर के बारे में विस्तार से जानेंगे.
एक ऐसा भी समय था जब शारदा पीठ मंदिर आस्था के साथ ही शिक्षा का भी एक प्रमुख केंद्र हुआ करता था. शारदा पीठ मुजफ्फराबााद से लगभग 140 किलोमीटर दूर और कुपवाड़ा से लगभग 30 किलोमीटर दूर पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में नीलम नदी के किनारे स्थित है. इतिहासकारों का मानना है कि अमरनाथ और अनंतनाग के मार्तंड सूर्य मंदिर के जैसे ही शारदा पीठ मंदिर कभी श्रद्धा का केंद्र हुआ करता था. 14 वीं शताब्दी तक शारदा पीठ प्राकृतिक आपदाओं से क्षति ग्रस्त होता रहा और समय बीतने के साथ विदेशी आक्रांताओं ने मंदिर को खूब नुकसान पहुंचाया. आज स्थिति ऐसी है कि शारदा देवी मंदिर में पिछले 70 सालों से पूजा हुई ही नहीं है.
शारदा पीठ को लेकर ऐसी पौराणिक कथा है कि भगवान शिव ने जब देवी सती के देह को तांडव करना शुरू किया तो विष्णु जी ने देवी सती के एक-एक अंग को अपने चक्र से काटना शुरू किया. ऐसे में देवी सती का दाहिना हाथ इसी जगह पर गिरा था जिसे 18 महाशक्ति पीठों में से एक शारदा पीठ माना गया है. धार्मिक मान्यता है कि शारदा पीठ शाक्त संप्रदाय को समर्पित पहला तीर्थ स्थल है, इसका मतलब ये हुआ कि कश्मीर के इसी मंदिर में मां शक्ति की उपासना सबसे पहले की गई. बाद में खीर भवानी और वैष्णो देवी मंदिर को स्थिपित किया गया. मान्यता है कि शारदा पीठ में पूज्य मां शारदा तीन शक्तियों का संगम हैं. पहली शिक्षा की देवी मां शारदा, दूसरा ज्ञान की देवी मां सरस्वती और वीणा धारण करने वाली वाग्देवी.
शारदा पीठ मंदिर का शंकराचार्य से भी गहरा संबंध है. ध्यान दें यह मंदिर ज्ञान की देवी मां सरस्वती को समर्पित है जहां पर पुराने समय में शिक्षण कार्य किया जाता था. प्राचीन समय से ही भारतीय उपमहाद्वीप में सर्वश्रेष्ठ मंदिर विश्वविद्यालयों में से एक में शारदा पीठ की गिनती होती थी. शैव संप्रदाय के जनक शंकराचार्य और वैष्णव संप्रदाय आगे बढ़ने वाले रामानुजाचार्य, इन दोनों ही महानुभावों ने शारदा पीठ आकर महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की.
(Disclaimer- इस लेख में दी गई जानकारी धार्मिक मान्यताओं, पौराणिक कथाओं, स्थानीय परंपराओं और उपलब्ध ऐतिहासिक विवरणों पर आधारित है. इसका उद्देश्य केवल सूचना देना है, किसी मान्यता या दावे की पुष्टि करना नहीं.)