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बिहार राज्य के कैमूर जिले में पंवरा पहाड़ी के शिखर पर एक शक्तिपीठ विराजमान है. यह माता मुंडेश्वरी धाम मंदिर है जो अद्भुत है और जिसका जिक्र मार्कंडेय पुराण में भी वर्णन मिलता है. धार्मिक मान्यता है कि माता के द्वार पर आकर जो भी भक्त अपनी इच्छा प्रकट करता है उसकी इच्छा पूरी होती है. नवरात्र के मौके पर मंदिर में भारी भीड़ लगती है. यह मंदिर रहस्यों से भरा है. विशेष बात ये है कि इस मंदिर में बिना रक्त बहाए ही बकरे की बलि दी जाती है. इस मंदिर से जुड़ी कई धार्मिक मान्यताएं हैं, जैसे गर्भ गृह के मध्य में एक पंचमुखी शिवलिंग स्थापित है, जिसका रंग सूर्य के प्रकाश के साथ बदलता हुआ प्रतीत होता है. आइए मंदिर की पौराणिक मान्यता और यहां के सात्विक बलि के बारे में विस्तार से जानेंगे.
मां मुंडेश्वरी मंदिर के एक शिलालेख के अनुसार मंदिर में रखी मूर्तियां उत्तर गुप्त काल की हैं. वहीं, यह पत्थर से बना हुआ अष्टकोणीय मंदिर है. मान्यता के अनुसार इस क्षेत्र में चंड और मुंड नाम के असुर रहा करते थे जो लोगों को सताते हैं. इस असुर को बचाने के लिए माता भवानी पृथ्वी पर आईं और सबसे पहले चंड का वध किया. इसके बाद मुंड युद्ध करते हुए पहाड़ी में ही छिप गया. लेकिन माता इस पहाड़ी में घुसकर मुंड का कर दिया. इसी के बाद माता मुंडेश्वरी देवी के नाम से जानी गईं.
मंदिर के अंदर मां वाराही रूप में विराजमान हैं. महिष मां का वाहन है और माता की मूर्ति की भव्यता इतनी है कि उस पर किसी की भी नजर अधिक देर तक नहीं टिक पाती है. 608 फुट उंची पंवरा पहाड़ी पर यह मंदिर स्थित है जहां पर शारदीय नवरात्र, चैत्र नवरात्र से लेकर श्रावण मास, वसंत पंचमी, महाशिवरात्रि पर बड़ा मेला लगता है.
इस मंदिर में प्राचीन काल से ही एक अनोखी बलि की प्रथा है. इस मंदिर में बकरे की बलि दी जाती है लेकिन यह बलि अन्य बलि प्रथा से अलग है. यहां बलि चढ़ जाती है लेकिन खून नहीं बहता है. प्रथा है कि पूजा होने के बाद बलि देने के लिए एक बकरे को मंदिर के गर्भ गृह में माता के सामने लाया जाता है. अब मंदिर के पुजारी बकरे के चारों पैरो को मजबूती से पकड़ते हैं व माता के चरणों में स्पर्श कर मंत्र का उच्चारण करते हैं. अब बकरे पर पूजा किया हुआ चावल छिड़का जाता है. चावल पड़ते ही बकरा अचेत हो जाता है. जब पुजारी कुछ मंत्र पढ़कर माता के चरण में पड़े फूल को बकरे पर फेंकते हैं तो बकरा नींद से जाग जाता है. इस पूरी प्रक्रिया को सात्विक बलि कहते हैं.
(डिस्क्लेमर- यह सामग्री धार्मिक मान्यताओं, प्रचलित परंपराओं एवं उपलब्ध धार्मिक स्रोतों पर आधारित है. विभिन्न क्षेत्रों, समुदायों और परंपराओं के अनुसार व्रत-त्योहारों की तिथि, पूजा-विधि एवं मान्यताओं में अंतर संभव है. पाठक इसे सामान्य धार्मिक जानकारी के रूप में देखें.)