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Pitru Paksha Tripindi Shraddha: महादेव की धरती वाराणसी से मोक्ष प्राप्ति का रास्ता खुलता है. यहां के पिशाच मोचन कुंड का हिंदू धर्म में बड़ा महत्व है जो एक अति रहस्यमयी जगह है. इस तीर्थ पर उन आत्माओं का तर्पण और श्राद्ध किया जाता है जिनकी अकाल मृत्यु हुई हो या जिनका विधि अनुसार श्राद्ध या तर्पण न किया जा सका हो. 26 सितंबर से पितृ पक्ष शुरू होने वाला है. पितृ पक्ष पितृ लोक में रहने वाले पितरों और प्रेत योनियों में भटकने वाली आत्माओं के लिए मुक्ति द्वार माना गया है. इस दौरान पितरों का श्राद्ध किया जाता है. ऐसे में इस मौके पर श्राद्ध और तर्पण वाली जगह पिशाच मोचन कुंड के बारे में आइए विस्तार से जानें.
ऐसी आत्माएं जिनकी अकाल मृत्यु हुई हो या जिनका विधि-विधान से तर्पण न हुआ हो उनकी आत्मा भटकती ही रहती हैं और कई पीढ़ियों तक अपने वंशजों को परेशान भी कर सकती हैं. ऐसे में काशी स्थित पिशाच मोचन कुंड में उनके निमित्त त्रिपिंडी श्राद्ध कर्म किया जाता है और नारायण बली से इन आत्माओं की शांति व मोक्ष प्राप्ति की प्रार्थना की जाती है. यहां पर देश-विदेश से लोग तर्पण करने के लिए पहुंचते हैं जिससे उनके पितर शांत हो सकें और पितृ दोष दूर हो सके.
गरुड़ पुराण में भी पिशाचमोचन कुंड का वर्णन है. गंगा के धरती पर आने से पहले से ही पिशाच मोचन तीर्थ स्थल यहां स्थित था. कुंड के किनारे बैठकर अकाल मृत्यु को प्राप्त पितर के लिए श्राद्ध कर्म करने से उनकी आत्मा शांत होती है और वे प्रेत योनि से मुक्ति हो पाते हैं. कुंड अनादि काल से पिशाचमोचन में है. एक समय था जब इसे विमलोदक सरोवर कहा जाता है.
काशी को प्रथम पिंड के रूप में जाना जाता है. सबसे पहले लोग काशी में पिशाचमोचन कुंड पर आते हैं और तर्पण व पिंडदान करते हैं. इसके बाद गया जाते हैं और फिर अंत में केदारनाथ को प्रस्थान करते हैं. पिशाचमोचन तीर्थ पर अश्वदान करने को भी बहुत महत्व दिया गया है. प्रेत कुंड में पिंड अश्वदान के बाद ही डाला जा सकता है.
पिशाचमोचन में स्थित पीपल के पेड़ की अपनी मान्यताएं हैं. पेड़ पर लोग सिक्का रखकर पितरों का उधार चुकाते हैं ताकि पितृ ऋण से मुक्त हो सकें. पिशाचमोचन कुंड के पीपल के पेड़ में ठोंके गए सिक्के और कील किसी न किसी अतृप्त आत्मा से संबंधित है. मृत व्यक्ति की तस्वीर से लेकर उनके किसी न किसी निशानी को भी पीपल के पेड़ पर लगाने का विधान हैं. पिशाचमोचन कुंड में तर्पण और पिंडदान तो पितृपक्ष में ही होता है लेकिन पेड़ में सिक्के या कील गाड़ने की परंपरा सालभर निभाई जाती है.
(Disclaimer- इस लेख में दी गई जानकारी धार्मिक मान्यताओं, पौराणिक कथाओं, स्थानीय परंपराओं और उपलब्ध ऐतिहासिक विवरणों पर आधारित है. इसका उद्देश्य केवल सूचना देना है, किसी मान्यता या दावे की पुष्टि करना नहीं.)