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हिंदू धर्म में पितृ पक्ष का समय पूर्वजों के प्रति श्रद्धा-सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त करने का समय होता है. धार्मिक मान्यता है कि इस दौरान पितरों की आत्मा की शांति के लिए श्राद्ध, तर्पण और दान करने से उनका आशीर्वाद प्राप्त होता है. जीवन में सुख-समृद्धि आती है. परिवार फलता-फूलता है. हालांकि कई लोगों के लिए समय की कमी या अन्य कारणों से सभी 16 दिन पितृ कर्म करना संभव नहीं हो पाता है. ऐसे में कुछ खास तिथियों पर श्राद्ध-तर्पण करके भी पितरों की कृपा पा सकते हैं. जानिए ये विशेष तिथियां कौन-सी हैं और इस साल कब पड़ रही हैं.
इस तिथि का संबंध भरणी नक्षत्र से है. यानी कि इस दिन भरणी नक्षत्र रहता है. धार्मिक मान्यता है कि इस दिन श्राद्ध करने से परिवार के उन सभी पितरों की आत्मा को शांति मिलती है, जो अविवाहित रहे हों या जिनकी असमय मृत्यु हो गई है. इस दिन ऐसे ज्ञात-अज्ञात पितरों के लिए श्राद्ध-तर्पण करें.
पितृ पक्ष की नवमी तिथि परिवार की दिवंगत महिलाओं को समर्पित है. इस दिन सभी महिला पूर्वजों के लिए श्राद्ध-तर्पण किया जाता है इसलिए इसे मातृ नवमी कहते हैं. इस दिन दादी, नानी, बहन, सास, मां आदि महिला रिश्तेदारों में जिनका भी निधन हो चुका है और उनकी तिथि ज्ञात न हो तो उन सभी के लिए मातृ नवमी पर श्राद्ध करें. इस दिन ब्राह्मणों और कन्याओं को भोजन कराना उत्तम माना गया है.
पितृ पक्ष के दौरान जिस दिन दोपहर में मघा नक्षत्र पड़ता है उस दिन मघा श्राद्ध किया जाता है. जो कि इस साल 7 अक्टूबर को पड़ रहा है. मघा नक्षत्र के देवता पितृ माने गए हैं, ऐसे में मान्यता है कि इस दिन तर्पण करने से पितृ तृप्त होते हैं. साथ ही जिन पूर्वजों का वास्तविक तिथि पर श्राद्ध नहीं हो पाया, उनका भी इस दिन तर्पण-पिंडदान कर सकते हैं.
यह सबसे अहम तिथियों में से एक है. इस दिन सभी पितरों के लिए श्राद्ध करके पितरों को विदाई दी जाती है. यह पितृ पक्ष का अंतिम दिन होता है. जिन पितरों की मृत्यु तिथि पता नहीं है, उनका श्राद्ध भी इस दिन किया जाता है.
(Disclaimer: पितृ पक्ष, श्राद्ध और तर्पण से जुड़ी मान्यताएं धार्मिक आस्था और परंपराओं पर आधारित हैं. तिथि एवं पूजा विधि के लिए अपने स्थानीय पंचांग और कुल-परंपरा के अनुसार निर्णय लें.)