आज घर-घर होता है कन्या पूजन, पर सबसे पहले किसने की थी छोटी बच्चियों की पूजा? अष्टमी-नवमी तिथि ही क्यों चुनी?
नवरात्र पर्व का समापन हर घर में कन्या पूजन से ही होता है. पर कभी सोचा है कि ये परंपरा कहां से आई और किसने पहली बार कन्या पूजन किया था? साथ ही इसके लिए अष्टमी-नवमी तिथि ही क्यों चुनी गई.
नवरात्र की अष्टमी-नवमी तिथि पर हवन और कन्या-पूजन होता है. धार्मिक मान्यता है कि बिना कन्या-पूजन किए नवरात्र और पूजा का पूरा फल नहीं मिलता है. इस साल 11 अक्टूबर 2026 को नवरात्र प्रारंभ हुईं और 19 अक्टूबर को अष्टमी व नवमी तिथि एकसाथ पड़ रही हैं. ऐसे में 19 अक्टूबर को कन्या पूजन करना शुभ माना जा रहा है. घर-घर में हर साल नवरात्र पर कन्या पूजन होता है. छोटी बच्चियों को सम्मानपूर्वक आमंत्रित करके पैर धुलाए जाते हैं, उनको तिलक लगाकर, पैर छूकर भेंट देते हैं. खीर-पूरी, हलवा, आदि खिलाया जाता है. जानिए कन्या पूजन की ये परंपरा कब और किसने शुरू की.
देवराज इंद्र ने किया था कन्या पूजन
मार्कंडेय पुराण और अन्य हिंदू धार्मिक ग्रंथों में जो वर्णन मिलता है, उसके अनुसार सबसे पहले देवराज इंद्र ने कुमारी कन्याओं का पूजन किया था. इसके पीछे एक पौराणिक कथा भी है. एक बार इंद्र देव किसी संकट में फंस गए. वे मां दुर्गा को प्रसन्न करके उनकी कृपा पाना चाहते थे. उन्होंने ब्रह्मा जी से इसका उपाय पूछा.
तब ब्रह्मा जी ने इंद्र देव से कहा कि देवी माता को प्रसन्न करने के लिए उनकी पूजा करने के साथ-साथ छोटी कन्याओं को मां दुर्गा का रूप मानकर उनकी पूजन भी करो. इससे देवी दुर्गा प्रसन्न होंगी. ब्रह्मा जी की सलाह मानकर देवराज इंद्र ने विधि-विधान से देवी दुर्गा की पूजा की. फिर छोटी-छोटी कुंवारी कन्याओं का भी पूजन किया, उन्हें भोजन कराया. इंद्रदेव के सेवा भाव से माता प्रसन्न हुईं और उन्हें आशीर्वाद दिया. मान्यता है कि, तभी से कन्या पूजन की परंपरा शुरू हुई. वहीं किसी व्यक्ति द्वारा सबसे पहले कन्या पूजन करने को लेकर कोई सर्वमान्य ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है.
हर उम्र की कन्या का अलग नाम
आमतौर पर 2 से 10 साल की कन्याओं का पूजन करने का विधान बताया गया है. साथ ही पुराणों में इन कन्याओं के विशेष नाम भी बताए गए हैं. यानी कि 2 साल की कन्या का नाम कुमारी बताया गया है, 3 साल की कन्या का नाम त्रिमूर्ति आदि.
उम्र - कन्या का नाम
2 साल - कुमारी
3 साल - त्रिमूर्ति
4 साल - कल्याणी
5 साल - रोहिणी
6 साल - कालिका
7 साल - चंडिका
8 साल - शाम्भवी
9 साल - दुर्गा
अष्टमी-नवमी पर ही कन्या पूजन क्यों?
कन्या पूजन नवरात्र के समापन दिनों अष्टमी और नवमी तिथि पर किया जाता है. महाअष्टमी-महानवमी को ही कन्या पूजन क्यों किया जाता है इसके पीछे 2 प्रमुख वजहें हैं. पहली- इन दोनों तिथियों को विशेष माना गया है. दूसरा - मान्यता है कि अष्टमी-नवमी तिथि पर नवरात्र चरम पर होती हैं, इस समय विशेष पूजा-अर्चना करने पर मां दुर्गा जल्द प्रसन्न होती हैं और मनोकामनाएं पूरी होती हैं.
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(डिस्क्लैमर: यह लेख धार्मिक मान्यताओं और पौराणिक परंपराओं पर आधारित है. अलग-अलग ग्रंथों और क्षेत्रों में कन्या पूजन से जुड़ी कथाएं और रीति-रिवाज अलग हो सकते हैं.)