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Pitru Paksha 2026: पितृ पक्ष में पूर्वजों को स्मरण किया जाता है और उनके प्रति श्रद्धा व्यक्त की जाती है. तिथि के अनुसार श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान करने का विधान है. इस साल पितृ पक्ष 26 सितंबर से 10 अक्तूबर तक चलेगा. वहीं, 7 अक्तूबर 2026 को मघा नक्षत्र का संयोग हो रहा है. हमारे मन में मघा नक्षत्र और पितृ पक्ष को लेकर कई सवाल उठते हैं. जैसे पितृ पक्ष में मघा नक्षत्र का संयोग क्यों सामान्य नहीं है, क्या मघा श्राद्ध केवल मघा नक्षत्र में जन्मे लोग ही कर सकते हैं, मघा श्राद्ध को किन पूर्वजों के लिए विशेष माना गया है यानी इस नक्षत्र में किनका श्राद्ध हो सकता है? इन सभी सवालों के जवाब हम जानीमानी ज्योतिषाचार्य अनामिक सिंह से जानेंगे.
ज्योतिषाचार्य अनामिका सिंह इस बारे में गहरी जानकारी देती हैं. पितृ पक्ष में मघा नक्षत्र का संयोग विशेष धार्मिक महत्व रखता है. मघा के अधिदेवता पितृगण माने गए हैं, इसलिए ज्योतिषीय दृष्टि से भी इस नक्षत्र में किया गया श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता व्यक्त करने का विशेष अवसर माना जाता है. मघा श्राद्ध हमें बताता है कि हमारी पहचान सिर्फ वर्तमान से नहीं है, बल्कि अपनी पूरी वंशावली से जुड़ी है. उपलब्ध धर्मशास्त्रीय संदर्भों में गरुड़ पुराण, हेमाद्रि और निर्णयसिन्धु आदि परंपराओं में मघा और पितृकर्म का संबंध मिलता है.
हर पितृ पक्ष में मघा श्राद्ध पड़े ये जरूरी नहीं है. इसे ऐसे समझें कि मघा नक्षत्र हर महीने लगभग एक बार आता है लेकिन पितृ पक्ष के 16 दिनों में वह केवल तभी आ सकता है जब उस वर्ष की चंद्र गति के अनुसार मघा नक्षत्र उन दिनों में पड़े. हालांकि, मघा श्राद्ध के लिए केवल मघा नक्षत्र का आ जाना ही काफी नहीं है बल्कि मघा नक्षत्र का अपराह्ण काल में होना जरूरी है. यदि वह दो दिनों के अपराह्ण में आता है तो उसका अधिक हिस्सा जिस दिन अपराह्ण में हो उसे मघा श्राद्ध मान लिया जाता है.
ज्योतिषाचार्य अनामिका सिंह बताती हैं कि मघा श्राद्ध का मतलब यह नहीं है कि केवल जिनकी जन्म-कुंडली में चंद्रमा मघा नक्षत्र में है, वो ही यह श्राद्ध कर सकते हैं. पितृ पक्ष में सामान्य रूप में श्राद्ध मृत पूर्वज की मृत्यु-तिथि के अनुसार करने का विधान है.
जिनकी मृत्यु तिथि पता न हो.
जिनका किसी कारण नियमित श्राद्ध न हो पाया.
मघा श्राद्ध 7 अक्टूबर 2026 को है, ऐसे में आइए जानें इस दिन श्राद्ध तर्पण करने का शुभ मुहूर्त क्या है-
कुतुप मुहूर्त: सुबह 11:53 बजे से लेकर दोपहर 12:40 बजे तक.
रोहिणा मुहूर्त: दोपहर 12:40 बजे से लेकर दोपहर 01:27 बजे तक.
अपराह्न काल: दोपहर 01:27 बजे से लेकर दोपहर 03:50 बजे तक.
मघा श्राद्ध पर पितरों की आत्मा की शांति और उनकी तृप्ति के लिए पूरी विधि आइए जानें.
श्राद्ध के दिन सुबह जल्दी उठें, स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र पहनें.
पितरों का ध्यान करें और श्राद्ध करने का संकल्प लें.
मघा श्राद्ध मुख्य रूप से कुतुप मुहूर्त में या अपराह्न काल में ही करें.
योग्य ब्राह्मण को घर पर आमंत्रित कर उन्हें आसन पर बैठाएं और उनके पैर धोएं.
भोजन तैयार कर ब्राह्मण को जीमाने से पहले पंचबलि भोग निकालें.
इसमें गाय, कुत्ता, कौआ, देवादि और चींटियों के लिए भोजन निकालें.
ब्राह्मण को आदरपूर्वक सात्विक भोजन कराएं. सामर्थ्य के अनुसार वस्त्र और अनाज का दान करें. दक्षिणा दें.
तांबे या पीतल के बर्तन में स्वच्छ जल लें और उसमें गंगाजल, कच्चा दूध, जौ, काले तिल और कुशा मिलाएं.
तर्पण के समय अपना मुख दक्षिण दिशा की ओर रखें और अंगूठे व तर्जनी उंगली के बीच से जल को गिराएं.
हाथ की अनामिका उंगली में कुशा की अंगूठी पहने हुए ही तर्पण या पिंडदान करना अनिवार्य होता है.
जल अर्पित करते हुए पितरों का नाम लें और कहें, "हे पितृदेव! आपको यह जल तृप्त करे, कृपया इसे स्वीकारें.
मघा श्राद्ध के दिन घर में सात्विक माहौल बनाए रखें और तामसिक भोजन यानी लहसुन, प्याज, मांस, मदिरा का सेवन न करें.
इस विशेष दिन पर पितरों की प्रसन्नता के लिए कुछ चीजों का दान करें, जिन्हें महादान माना जाता है-
पितृ पूजा में काले तिल प्रिय वस्तुओं में से एक है. ऐसे में काले तिल का दान करें.
योग्य ब्राह्मण या जरूरतमंद को वस्त्र दान करें. धोती, कुर्ता या सफेद तौलिया दान करें.
गेहूं, चावल या किसी सात्विक अनाज का दान करें.
गुड़ और घी का दान करें तो दरिद्रता दूर होती है.
चांदी का संबंध पितरों से है. ऐसे में चांदी की कोई छोटी वस्तु या सिक्का दान करें.
ज्योतिष और पुराणों के अनुसार, आकाशमंडल के 27 नक्षत्रों में से मघा नक्षत्र के अधिष्ठाता देवता साक्षात "पितृगण" (Ancestors) माने गए हैं. किंवदंती है कि इस दिन ब्रह्मांड की ऊर्जा और पितृ लोक का द्वार पृथ्वी के सबसे करीब होता है. मान्यता है कि मघा नक्षत्र के दौरान स्वयं पितृ देव अपनी रश्मियों (किरणों) के माध्यम से पृथ्वी पर आते हैं. इसलिए इस नक्षत्र में दी गई आहुति या किया गया तर्पण सीधे पूर्वजों को तृप्त करता है. पौराणिक ग्रंथों में यह मान्यता अत्यंत प्रसिद्ध है कि यदि कोई व्यक्ति किसी कारणवश पितृ पक्ष के बाकी दिनों में श्राद्ध या तर्पण न कर पाया हो, तो वह अकेले मघा नक्षत्र के दिन श्राद्ध करके पूरे 16 दिनों के श्राद्ध का फल पा सकता है. किंवदंती के अनुसार, इस दिन किया गया तर्पण अतृप्त और प्रेत योनि में कष्ट पा रहे पूर्वजों को भी सीधे मुक्ति दिलाता है.
(डिस्क्लेमर- यह सामग्री धार्मिक मान्यताओं, प्रचलित परंपराओं एवं उपलब्ध धार्मिक स्रोतों पर आधारित है. विभिन्न क्षेत्रों, समुदायों और परंपराओं के अनुसार व्रत-त्योहारों की तिथि, पूजा-विधि एवं मान्यताओं में अंतर संभव है. पाठक इसे सामान्य धार्मिक जानकारी के रूप में देखें.)