जहां नहीं जलता रावण... जानिए अयोध्या की मूर्ति से कैसे शुरू हुआ विश्व प्रसिद्ध 'कुल्लू दशहरा'?
21 अक्टूबर से शुरू होने वाले ऐतिहासिक कुल्लू दशहरे में रावण दहन के बजाय 300 से अधिक देवी-देवताओं का मिलन होता है, इस खबर में राजा जगत सिंह और भगवान रघुनाथ जी से जुड़ा इसका 366 साल पुराने इतिहास के बारे में जानेंगे.
कुल्लू दशहरा एक ऐसा त्योहार है जिसे हिमाचल में मनाया जाता है. इस साल ये 21 अक्टुबर से शुरू होगा. ये लगभग एक सप्ताह यानी 7 दिन तक लगातार चलता है.
हर साल जब देशन के कोने-कोने में विजयादशमी के दिन सभी जगह रावण, कुंभकरण और मेघनाद के पुतले जलाए जाते हैं, उस समय कुल्लू में कुछ और होता है.
वहां ढालपुर मैदान में 300 से ज्यादा स्थानीय देवी-देवताओं का मिलन होता है. जो इसे भव्य बनाती है. कुल्लू में इसकी शुरूआत 1660 ईस्वी में हुई थी.
दरअसल उस समय कुल्लू में एक निर्दोष ब्राह्मण ने आत्मदाह कर लिया था. जिसका दोष उस समय के राजा जगत सिंह पर आ गया था. उनके ब्रह्म हत्या का दोष लग गया था.
उनको एक बीमारी भी थी जिसको कुष्ठ रोग कहा जाता है. अब ब्रह्म हत्या के दोष और कुष्ठ रोग से मुक्ति पानी थी तो राजा ने इस ऐतिहासिक पर्व का भव्य आयोजन शुरू करवाया था.
गरीब ब्राह्मण ने क्यों किया था आत्मदाह
राजा जगत सिंह ने 1637 से 1662 ईस्वी तक कुल्लू पर राज किया था. उस समय नग्गर रियासत की राजधानी हुआ करती थी.
राजा को एक गलत सूचना मिली कि मणिकर्ण घाटी के टिप्परी गांव में रहने वाले गरीब ब्राह्मण दुर्गादत्त के पास डेढ़ किलो मोती छिपे हैं.
राजा ने सच के बारे में पता किए बिना तुरंत मोतियों को राजमहल में जमा कराने का कड़ा फरमान जारी कर दिया.
अब राजा के खौफ और झूठे आरोप से परेशान होकर ब्राह्मण ने अपने पूरे परिवार के साथ आत्मदाह कर लिया. इसी घटना के बाद वो कुष्ठ रोग से परेशान हो गए.
अयोध्या से चोरी-छिपे लाई गई थी पवित्र मूर्ति
अब बीमारी से राजा कुछ ज्यादा ही तड़प रहे थे तो झीड़ी के सिद्ध संत पयोहारी बाबा किशन दास से मदद मांगी. उन्होंने राजा को एक रास्ता बताया.
बाबा ने सलाह दी कि अगर अयोध्या के त्रेतानाथ मंदिर से श्रीराम और माता सीता की मूर्ति लाकर कुल्लू में स्थापित की जाए और राज-पाट भगवान को सौंप दिया जाए, तो उन्हें इस पाप से मुक्ति मिल सकती है.
फिर क्या था, बाबा के चेले दामोदर दास 1651 में अयोध्या से मूर्ति लेकर मकड़ाह गांव पहुंचे. माना जाता है कि ये मूर्तियां त्रेता युग में खुद भगवान राम द्वारा अश्वमेध यज्ञ के समय में बनवाई गई थीं.
इन मूर्तियों को 1653 में मणिकर्ण में रखा गया और फिर 1660 में कुल्लू के रघुनाथ मंदिर में विधि-विधान से स्थापित किया गया.
अनोखे दशहरा उत्सव की नींव कैसे पड़ी?
भगवान रघुनाथ जी की स्थापना के बाद राजा जगत सिंह ने अपना पूरा राज-पाट प्रभु के चरणों में समर्पित कर दिया और स्वयं उनके सेवक बन गए.
राजा के इस त्याग के बाद कुल्लू रियासत के सभी 365 देवी-देवताओं ने भी भगवान रघुनाथ को अपना ईष्ट देव स्वीकार कर लिया है.
भगवान के आशीर्वाद से राजा जगत सिंह की बीमारी पूरी तरीके से ठीक हो गई. इस चमत्कारिक अनुभव और रोगमुक्ति की खुशी में राजा ने 1660 में सभी 365 देवी-देवताओं का एक विशाल सम्मेलन बुलाया.
तभी से कुल्लू में इस अनोखे दशहरा उत्सव की परंपरा की नींव पड़ी, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी आज तक चली आ रही है.
रियासती मेले से अंतरराष्ट्रीय महाउत्सव तक
ये शुरुआत में तो स्थानीय देवी-देवताओं और आसपास की रियासतों तक ही सीमित था. लेकिन धीरे-धीरे इसका धार्मिक, सांस्कृतिक और व्यापारिक महत्व पूरे देश में फैल गया.
हिमाचल सरकार ने साल 1966 में कुल्लू दशहरा को राज्य स्तरीय उत्सव का दर्जा दिया था.
इसके बाद 1970 में इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर का बनाने का ऐलान किया गया, मगर आधिकारिक तौर पर 2017 में इसे अंतरराष्ट्रीय उत्सव का दर्जा मिला.
इसके अलावा कुल्लू में बसंत पंचमी से लेकर 40 दिनों तक चलने वाली अनोखी होली भी मनाई जाती है. रघुनाथपुर मंदिर के सम्मान में साल भर में 46 बड़े धार्मिक उत्सव आयोजित किए जाते हैं.
1971 के भीषण गोलीकांड के बाद टूट गई थी दो साल पुरानी परंपरा
इस ऐतिहासिक उत्सव के पन्नों में एक दर्दनाक दौर भी दर्ज है, जब ढालपुर मैदान में दो सालों तक बिल्कुल शांति बनी रही.
साल 1971 में दशहरा उत्सव के दौरान ढालपुर मैदान में अचानक भीषण गोलीकांड हो गया था. इस घटना से मैदान में भारी भगदड़ मच गई और कई लोग घायल हो गए थे.
इसके बाद 1972 और 1973 में सुरक्षा कारणों से ढालपुर मैदान में मुख्य आयोजन नहीं हो सका और सदियों पुरानी परंपरा पहली बार टूट गई थी.
(Disclaimer): यह लेख हिमाचल प्रदेश के स्थानीय इतिहास, कुल्लू रघुनाथ मंदिर के ऐतिहासिक अभिलेखों, प्रचलित लोक मान्यताओं और राज्य पर्यटन विभाग द्वारा उपलब्ध कराई गई जानकारियों पर आधारित है. हमारा उद्देश्य पाठकों तक केवल प्रामाणिक और ऐतिहासिक जानकारी पहुंचाना है. किसी भी धार्मिक मान्यता या आस्था को ठेस पहुंचाने का हमारा कोई उद्देश्य नहीं है.
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