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श्रीनगर के बीचों-बीच स्थित सदियों पुराने ऐतिहासिक शीतलनाथ मंदिर में एक बार फिर घंटियों की आवाज गूंज उठी है. ये वही ऐतिहासिक स्थान है जहां महात्मा गांधी ने कभी शांति और एकता की उम्मीद देखी थी. आज, श्रीनगर के बीचों-बीच, सदियों पुराने शीतलनाथ मंदिर के फिर से खुलने से कश्मीरी पंडित समुदाय में घर वापसी की नई उम्मीद जगी है.
स्मार्ट सिटी की श्रीनगर हेरिटेज रिवाइवल स्कीम के तहत, 34 साल बाद शीतलनाथ जी भैरव के ऐतिहासिक मंदिर का नए रूप और आधुनिक तरीके से जीर्णोद्धार किया गया. अधिकारियों ने कहा कि आने वाली पीढ़ियों के लिए ऐसी जगहों की सुरक्षा और संरक्षण करना समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है.
जम्मू-कश्मीर के मुख्य सचिव अतुल डुल्लू, जिन्होंने जीर्णोद्धार किए गए मंदिर का उद्घाटन किया, ने मंदिर के गहरे महत्व पर जोर दिया. उन्होंने बताया कि शीतलनाथ को उन आठ भैरवों में से एक माना जाता है जो श्रीनगर शहर की रक्षा करते हैं.
मुख्य सचिव अतुल डुल्लू ने कहा, "शीतनाथ जी भैरव मंदिर सदियों पुराना है. मान्यता है कि यह श्रीनगर के अष्ट भैरव में से एक है, जो शहर की रक्षा की जिम्मेदारी संभालते हैं. 1991 में जब यह मंदिर हवनशाला के साथ जल गया था, तब शीतनाथ आश्रम सभा' ने इसके जीर्णोद्धार और इसे फिर से जीवंत करने के लिए लगातार काम किया. 2011 में कुछ मरम्मत का काम शुरू हुआ था, लेकिन 2023 में 'स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट' के तहत 'श्रीनगर स्मार्ट सिटी लिमिटेड' ने इसके जीर्णोद्धार और अपग्रेडेशन का काम हाथ में लिया, जो आज पूरा हो गया है. यह सिर्फ स्मार्ट सिटी का मामला नहीं है; यह संस्कृति विभाग की एक योजना है जिसके तहत विरासत स्मारकों - जिनमें मंदिर, मस्जिद, सूफी दरगाह, गुरुद्वारे और अन्य गैर-धार्मिक संरचनाएं शामिल हैं - के जीर्णोद्धार की परियोजनाएं चलाई जा रही हैं. विरासत का अर्थ है अपनी धरोहर को संजोना और उसे अगली पीढ़ी तक पहुंचाना. यह हमारी विरासत है और समाज के तौर पर हमारी जिम्मेदारी है कि हम अपनी विरासत की रक्षा करें और इसे आने वाली पीढ़ियों को सौंपें."
इस मंदिर का जीर्णोद्धार 2023 में शुरू हुआ था और अभी इसका उद्घाटन हुआ है. भक्तों ने सनातन धर्म सभा का आभार व्यक्त किया कि उन्होंने मंदिर के पुनर्निर्माण और उद्घाटन को राजनीति से दूर रखा.
इस जगह का आध्यात्मिक महत्व इसे कश्मीर के अन्य सभी मंदिरों में खास बनाता है. यह सदियों पुराना मंदिर है और इसे बहुत सम्मान दिया जाता है.
मंदिर के फिर से खुलने के मौके पर मौजूद पंडितों ने कहा कि उन्हें यहां अपना बचपन महसूस होता है और दिखाई देता है. कई भावुक दृश्य देखने को मिले.
भक्तों ने नम आंखों से कहा कि यह वही मंदिर है जहां देश और जम्मू-कश्मीर की लगभग सभी बड़ी हस्तियां आ चुकी हैं. उन्होंने बताया कि महात्मा गांधी भी यहां आए थे और कहा था कि उन्हें यहां शांति और एकता की उम्मीद की किरण दिखाई दी थी.
इसी जगह के रहने वाले रविंदर आनसधन, जो इस कार्यक्रम के लिए दिल्ली से आए थे, ने कहा:- “मैं यहीं का रहने वाला हूं, इसी इलाके का निवासी हूं. जब 1992 में उग्रवाद का दौर शुरू हुआ, तो यह मंदिर पहली बार जलाया गया था. उग्रवादी इतने से संतुष्ट नहीं हुए, उन्होंने 1993 में इसे फिर से जला दिया. उसके बाद, हमने इस मंदिर को पूरी तरह से बंद कर दिया, और फिर, 22 फरवरी 2022 को हमने इसे दोबारा खोला. हमने यहां पूजा-अर्चना शुरू की, भैरवनाथ की पूजा की, क्योंकि यहां शीतलनाथ भैरवनाथ की प्रतिमा स्थापित है. फिर इस पर सबका ध्यान गया. केंद्र और राज्य सरकारों ने यहां की कमान संभाली, और हमने यहां मंदिर खोला; 2022 में काम शुरू हुआ, और आज देखिए, 2027 में, 5 साल बाद स्मार्ट सिटी ने बहुत अच्छा काम किया है, हमारे लिए बहुत अच्छा मंदिर और एक अच्छी हवनशाला बनाई है. आज बचपन की यादें फिर से ताजा हो गईं. यह वही इलाका था जहां कश्मीरी पंडित इकट्ठा हुआ करते थे. यहीं से कश्मीरी पंडितों का हर कार्यक्रम शुरू होता था क्योंकि यह एकमात्र ऐसा मंदिर है जिसका राजनीतिक महत्व है. यहीं पर महात्मा गांधी ने उम्मीद की किरण देखी थी. यहीं पर जवाहरलाल नेहरू ने भाषण दिया था. मधोक जी ने यहां बात की, वीर सावरकर, एल.के. आडवाणी, और उसके बाद हमारे राज्य के बख्शी गुलाम मोहम्मद साहब यहां आते थे, जन्माष्टमी मनाते थे, शेख मोहम्मद अब्दुल्ला आते थे, फारूक अब्दुल्ला आते थे, सब कुछ इसी तरह चलता रहता था. आज बहुत अच्छा महसूस हो रहा है; यह दिखाता है कि कश्मीरियत कभी खत्म नहीं होती, कश्मीरियत हमेशा बनी रहती है, संस्कृति हमेशा जीवित रहती है. लेकिन हमें इसे बचाकर रखना होगा. इसके लिए राज्य सरकार, केंद्र सरकार और केंद्र शासित प्रदेश (UT) को आगे आकर हमारी मदद करनी चाहिए. तभी तो ऐसा हो पाएगा, है ना? यहां, यह इलाका ऐसा था कि यहां 115 हिंदू घर थे, यह उनका मंदिर था, और केवल 25 मुस्लिम घर थे. जब जमीन हड़पने वालों ने इस पर कब्जा करना शुरू किया, तो इन मुस्लिम भाइयों ने मुझे बुलाया- मैं दिल्ली से आया, और हमने मंदिर की रक्षा की और उन्हें मंदिर से बचाया.”
धार्मिक महत्व के अलावा, शीतलनाथ की ऐतिहासिक भूमिका ने इस मंदिर को एक सामुदायिक केंद्र बना दिया है. यहां जन्माष्टमी और बसंत पंचमी पर कार्यक्रम हुआ करते थे.
यह सिर्फ एक धार्मिक स्थल नहीं था; पूरा समुदाय यहां इकट्ठा होता था और सामाजिक मिलन-जुलन के कार्यक्रम भी यहां होते थे. इस मंदिर के बनने का कोई आधिकारिक रिकॉर्ड नहीं है, लेकिन कहा जाता है कि जब हरि पर्वत का इलाका पानी सूखने के बाद जमीन में बदल गया (जिसे पहले सतीसर कहा जाता था), तब यह मंदिर स्थापित किया गया था.
मान्यता है कि शहर की रक्षा के लिए आठ भैरव हैं; माता पार्वती के रूप 'माता शारिका' ने शहर को आठ हिस्सों में बांटा था और भगवान शिव के रूप माने जाने वाले ये आठ भैरव श्रीनगर शहर की रक्षा करते हैं, जिनमें से एक शीतलनाथ भैरव थे.
एक भक्त, दिलीप लंगू ने कहा: “आज मनाया जा रहा यह भव्य त्योहार शीतलेश भैरव और शीतलनाथ शिव को समर्पित है. यह कश्मीर में तीर्थ स्थलों की संरचना को दर्शाता है, जहां शीतलनाथ भैरव, हरि पर्वत क्षेत्र के आसपास माने जाने वाले आठ भैरवों में से एक हैं. उन्हें देवी की आठ संतानें माना जाता है, और इस क्षेत्र को शीतलनाथ कहा जाता है. ‘सथु’ का अर्थ है पानी; यहां कभी हर जगह पानी हुआ करता था. आज आप जो जमीन और सड़क देख रहे हैं, वे पूरी तरह से पानी के नीचे थीं. इस जगह की एक पुरानी परंपरा है जहां स्थानीय लोग, आस-पड़ोस के निवासी और आस-पास के वे लोग, जिनके कुल देवता (इष्ट देवता) शीतलनाथ भैरव हैं, पूजा-अर्चना करने आते हैं. हमारे समुदाय में, कश्मीरी पंडित समुदाय को देवताओं के आठ अलग-अलग समूहों में बांटा गया है. हमारे यहां आनंदेश्वर भैरव हैं, इन लोगों के यहां शीतलनाथ भैरव हैं, जबकि दूसरों के यहां तोशराज भैरव, मंगलेश्वर भैरव या बोखत केश्वर भैरव हैं. श्रीनगर का पूरा क्षेत्र इन आठ इलाकों में बंटा हुआ था, और इन देवताओं को उन संबंधित क्षेत्रों के रक्षक के रूप में पूजा जाता था. मंदिर की प्राचीनता की बात करें तो यह हरि पर्वत जितना ही पुराना है, और कोई भी इसकी सही उम्र नहीं बता सकता - कुछ लोग इसे सैकड़ों साल पुराना कहते हैं, तो कुछ हजारों साल, लेकिन यह सबसे पुराने बचे हुए स्थानों में से एक है. हम आज यहां पूजा कर पा रहे हैं क्योंकि इसका जीर्णोद्धार किया गया है. मैं इस पवित्र स्थान को पुनर्जीवित करने की पहल करने के लिए समिति को दिल से बधाई देता हूं. हमें उम्मीद है कि बच्चे फिर से यहां शांति से खेलेंगे और इस धरती पर खुशियां लौटेंगी, और हम उनके आशीर्वाद की कामना करते हैं. यह कश्मीरी समुदाय की वापसी की दिशा में एक कदम है, और हम नवंबर में श्रीनगर में ‘सॉन्ग ऑफ रिटर्न’ (वापसी का गीत) का आयोजन भी कर रहे हैं, साथ ही भारत भर की विभिन्न ऐतिहासिक सड़कों की यात्रा भी कर रहे हैं. यह गीत हर उस व्यक्ति के लिए एक संदेश के रूप में हर जगह गाया जाएगा जो वापस लौटना चाहता है. यहां जो हो रहा है, वह शायद ईश्वर की कृपा है कि इस मिट्टी पर खुशियां एक बार फिर लौट रही हैं.”
कश्मीर के इस ऐतिहासिक मंदिर के फिर से खुलने पर, जो कभी कश्मीर का राजनीतिक केंद्र भी हुआ करता था, यहां की पुरानी परंपरा के अनुसार एक सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किया गया.
जब भी यहां कोई कार्यक्रम होता था, तो पारंपरिक कश्मीरी धार्मिक गीत गाने का रिवाज था. खास बात यह है कि गायक अक्सर कश्मीरी मुस्लिम होते थे जो पंडितों के भजन गाते थे और साथ में नृत्य और जश्न भी होता था.
आज भी वही भावना देखने को मिली. एक कश्मीरी मुस्लिम लोक गायक ने एक जीवंत माहौल बना दिया, जिससे एक बार फिर भाईचारे वाली मिली-जुली कश्मीरी संस्कृति की झलक मिली.
कश्मीरी लोक गायक शब्बीर अहमद ने कहा:- "यही भाईचारा है. मैं पहले भी गाता रहा हूं, पंडितों के हर कार्यक्रम में. चाहे यहां हो या जम्मू में, चाहे मेहंदी रात हो या हवन, कोई भी कार्यक्रम हो, मैं खुद करता हूं. यही कश्मीर की परंपरा है. यह अच्छी बात है. अगर वे वापस आते हैं, तो यह रौनक और बढ़ेगी. उनमें और हममें कोई फर्क नहीं है."
ये कदम एक सार्थक और उम्मीद जगाने वाली पहल हैं. इन पवित्र स्थलों को फिर से शुरू करके, सरकार न केवल कश्मीरी पंडितों की समृद्ध सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत का सम्मान कर रही है, बल्कि सबको साथ लेकर चलने और अपनापन महसूस कराने का एक मजबूत संदेश भी दे रही है.
ऐसी कोशिशें पुराने जख्म भरने, भरोसा मजबूत करने और सुरक्षा व अपनापन का माहौल बनाने में मदद कर सकती हैं, जिससे और भी परिवार अपनी पुश्तैनी जमीन पर लौटने और कश्मीर के सामाजिक और सांस्कृतिक ताने-बाने में फिर से योगदान देने के बारे में सोच सकें.
खालिद हुसैन
जी मीडिया कश्मीर