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आश्विन शुक्ल चतुर्थी को कपर्दिश गणेश चतुर्थी कहा जाता है. आज 14 अक्टूबर 2026, बुधवार को कपर्दिश गणेश चतुर्थी है. आमतौर पर विघ्नहर्ता, मंगलकर्ता और बुद्धि के देवता भगवान गणेश के सौम्य रूप की ही पूजा की जाती है, लेकिन कपर्दिश चतुर्थी ऐसा दिन है जब भगवान गणेश के रौद्र रूप की पूजा की जाती है. यह उनका वह स्वरूप है, जब उन्होंने अपने पिता भगवान शिव की तरह जटाएं रखीं, शरीर पर भस्म लगाई और रौद्र रूप धारण किया.
‘कपर्दिश’ शब्द मुख्य रूप से दो शब्दों से मिलकर बना है- ‘कपर्द‘ और ‘ईश‘. ये दोनों संस्कृत शब्द हैं. कपर्द का हिंदी अर्थ है 'जटा' या कौड़ी. वहीं 'ईश' का अर्थ होता है भगवान या स्वामी.
‘कपर्दी’ मूल रूप से भगवान शिव का नाम है, क्योंकि वे अपने मस्तक पर विशाल जटाएं धारण करते हैं. जब भगवान गणेश ने अपने पिता शिव के समान ही तपस्वी रूप धारण किया तो उन्हें कपर्दिश गणेश कहा गया.
यह व्रत भगवान गणेश के इस अद्भुत विशेष रूप की पूजा के कारण तो खास है ही, साथ ही इसलिए भी अहम है क्योंकि गणपति के इस रूप की पूजा से भगवान शिव की पूजा का भी फल मिलता है. यानी कि एक व्रत से 2 भगवानों की कृपा प्राप्त होने की मान्यता है.
धर्म-शास्त्रों के अनुसार, जब जीवन में बड़ा संकट या समस्या आ जाए और उसका हल न मिल रहा हो तब भगवान गणेश के कपर्दिश रूप की पूजा-आराधना करना, समस्याओं से निजात पाने में मदद करता है.
पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक अत्यंत मायावी और शक्तिशाली असुर था. उसने भगवान शिव की घोर तपस्या करके यह वरदान प्राप्त कर लिया था कि उसे संसार का कोई भी राजा, देवता या सामान्य अस्त्र-शस्त्र धारण करने वाला व्यक्ति पराजित नहीं कर सकेगा. उसका वध केवल वही कर सकता था, जो पूर्ण रूप से ‘वैरागी’ (तपस्वी) हो और जिसने अपने मस्तक पर जटाएं धारण की हों. वह जानता था कि ऐसा व्यक्ति स्वयं भगवान शिव ही हैं. चूंकि उन्होंने ही उसे वरदान दिया है इसलिए वे तो उसका वध करेंगे नहीं.
लिहाजा ऐसा वरदान पाकर वह असुर निरंकुश हो गया. उसने स्वर्ग पर आक्रमण कर दिया और सभी शुभ कार्यों, यज्ञों और अनुष्ठानों में भयंकर बाधाएं (विघ्न) डालने लगा. सभी देवता त्राहि-त्राहि करते हुए भगवान शिव और माता पार्वती की शरण में कैलाश पर्वत पहुंचे. देवताओं की रक्षा और उस असुर के वरदान का मान रखने के लिए, भगवान श्री गणेश ने अपना अत्यंत भव्य रूप प्रकट किया. उन्होंने अपने राजसी वस्त्रों और आभूषणों का त्याग कर दिया. उन्होंने अपने मस्तक पर पिता शिव के समान विशाल ‘जटाएं‘ (कपर्द) धारण कर लीं, शरीर पर भस्म लगा ली और एक पूर्ण योगी का रूप ले लिया.
भगवान गणेश के इसी जटाधारी स्वरूप को ‘कपर्दी‘ या ‘कपर्दिश‘ कहा गया. तपस्वी गणेश रणभूमि में पहुंचे. असुर ने जब देखा कि एक जटाधारी बाल-योगी युद्ध के लिए आया है, तो वह जोर-जोर से हंसने लगा. लेकिन कपर्दिश गणेश ने अपनी योग-शक्ति और हुंकार मात्र से उस विशाल असुर की सारी माया को नष्ट कर दिया और अपने पाश (रस्सी) से उसे बांधकर उसका वध कर दिया.
देवताओं ने प्रसन्न होकर भगवान गणेश के इस तपस्वी स्वरूप की पुष्प वर्षा कर वंदना की. तभी से यह मान्यता हो गई कि जो भी भक्त चतुर्थी तिथि के दिन भगवान गणेश के ‘कपर्दिश’ स्वरूप की पूजा करेगा, उसके जीवन के सबसे बड़े और असंभव विघ्न भी पल भर में दूर हो जाएंगे.
(Disclaimer: इस लेख में वर्णित धार्मिक प्रसंग पौराणिक मान्यताओं और संबंधित कथा-स्रोतों पर आधारित हैं. अलग-अलग ग्रंथों और परंपराओं में इनके विवरण भिन्न हो सकते हैं.)