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दक्षिण भारत के मंदिरों में गोपुरम इतने ऊंचे क्‍यों? तिरुवेल्लराई में बिना क्रेन के बन रहा 125 फीट का राजगोपुरम, जानिए सीक्रेट

दक्षिण भारत के गोपुरम सिर्फ सजावट के लिए नहीं होते हैं, बल्कि इनका धार्मिक-आध्‍यात्मिक महत्‍व होने के अलावा व्‍यावहारिक महत्‍व भी है. त्रिची के तिरुवेल्लराई में 125 फीट ऊंचा गोपुरम बन रहा है.

Written ByShraddha Jain
Published: Oct 22, 2026, 11:28 AM IST|Updated: Oct 22, 2026, 02:17 PM IST
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दक्षिण भारत के मंदिरों में गोपुरम इतने ऊंचे क्‍यों? तिरुवेल्लराई में बिना क्रेन के बन रहा 125 फीट का राजगोपुरम, जानिए सीक्रेट
Image Credit: प्राचीन काल में मंदिर के गोपुरम का निर्माण. (PHoto:AI)

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Shraddha Jain

Shraddha Jain

पत्रकारिता में 15 वर्षों का व्यापक अनुभव रखने वाली श्रद्धा जैन वर्तमान में Zee News की नेशनल डिजिटल टीम में बतौर असिस्‍टेंट न्‍यूज एडिटर सक्रिय हैं. जहाँ वे धर्म, ज्योतिष, ग्रह गोचर, अंक शास्‍त्र और वास्तु शास्त्र जैसे विषयों पर अपनी विशेषज्ञता के लिए जानी जाती हैं। उन्होंने मास कम्युनिकेशन में पोस्ट ग्रेजुएशन और सिम्बॉयसिस इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी से क्रिएटिव राइटिंग की पढ़ाई की है. बतौर फोटो जर्नलिस्ट करियर शुरू करने वाली श्रद्धा ने दूरदर्शन, दैनिक भास्कर और चौथी दुनिया जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में अपनी सेवाएं दी हैं.12 वर्षों की फील्ड रिपोर्टिंग के दौरान राजनीति और सामाजिक मुद्दों पर गहरी पकड़ बनाने के बाद, उन्होंने डिजिटल मीडिया की ओर रुख किया और देश 24*7 जैसे पोर्टल्स में नेतृत्व की भूमिका निभाई. वर्तमान में धर्म, ज्योतिष, वास्तु और हस्तरेखा जैसे विषयों पर गहन अध्ययन और लेखन करते हुए जटिल विषयों को सरल और रोचक भाषा में पाठकों के सामने पेश कर रही हैं.
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तमिलनाडु के तिरुचिरापल्ली (त्रिची) जिले में स्थित तिरुवेल्लराई मंदिर इस समय चर्चा में है. 1 हजार साल से ज्‍यादा पुराने इस मंदिर में 125 फीट ऊंचा राजगोपुरम बन रहा है. कमाल की बात यह है कि इतने ऊंचे गोपुरम को बनाने में क्रेन या अन्‍य किसी मशीन का इस्‍तेमाल नहीं हो रहा है. बल्कि कारीगर छैनी-हथौड़े से इसे बना रहे हैं. यह गोपुरम 7 मंजिला ऊंचा होगा. इस मौके पर जानते हैं कि दक्षिण भारत के मंदिरों में गोपुरम का इतना महत्‍व क्‍यों है? और बिना क्रेन के इतने ऊंचे गोपुरम कैसे बनाए जाते हैं?  

गोपुरम क्‍या है?

दक्षिण भारत में द्रविड़ शैली में बने मंदिरों के परिसर में एक विशाल, ऊंचा और अलंकृत प्रवेश द्वार होता है. जिस पर देवी-देवताओं, पौराणिक कथाओं की भव्य मूर्तियां गढ़ी जाती हैं. इन प्रवेश द्वारों को गोपुरम कहा जाता है. आमतौर पर गोपुरम काफी ऊंचे होते हैं और इनकी ऊंचाई मंदिर की मुख्‍य इमारत से ज्‍यादा होती है. साथ ही वे काफी भव्‍य होते हैं.

मंदिर के दर्शन के समान गोपुरम दर्शन

जिस तरह उत्‍तर भारतीय मंदिरों में मंदिर का शिखर या गुम्‍बद अहम होती है, वैसी ही द्रविड़ शैली के मंदिरों में गोपुरम का स्‍थान है. धार्मिक मान्‍यता है कि गोपुरम के दर्शन करना मंदिर के अंदर विराजमान भगवान के दर्शन करने के समान होता है.

गोपुरम का महत्‍व

गोपुरम या राजगोपुरम सिर्फ मंदिरों के प्रवेश द्वार नहीं होते हैं, बल्कि ये कई दृष्टि से अहम होते हैं. इन्‍हें बेहद ऊंचा बनाने के पीछे भी खास वजह है.

1. शक्ति और प्रतिष्‍ठा के प्रतीक : राजाओं के शासन काल में मंदिर के भव्‍य गोपुरम वहां के राजा की शक्ति, श्रेष्‍ठता और आर्थिक क्षमता दर्शाते थे. यह राजा-महाराजाओं के लिए प्रतिष्‍ठा का विषय होता था कि उनके राज्‍य के मंदिर के कितने ज्‍यादा ऊंचे और भव्‍य हैं.

2. देसी 'GPS' : ये ऊंचे-ऊंचे भव्‍य गोपुरम 10 से 15 किलोमीटर दूर से ही नजर आ जाते हैं. ऐसे में प्राचीन समय में जब ज्‍यादा ऊंची इमारतें नहीं हुआ करती थीं, तब गोपुरम दिशा बताने और बड़े लैंड मार्क की तरह काम करते थे. ऐसे में श्रद्धालु या राहगीरों को पता चल जाता था कि निकट ही कोई बड़ा मंदिर या नगर है.

3. ध‍ार्मिक आध्‍यात्मिक महत्‍व: गोपुरम के दर्शन करना भगवान के दर्शन करने के समान है, ऐसे में दूर के गांव के लोग जो आवागमन के साधनों की कमी के चलते रोज मंदिर नहीं आ पाते थे, वे गोपुरम के दर्शन कर लेते थे. वहीं आध्‍यात्मिक नजर से देखें तो ऊंचे गोपुरम बताते हैं कि भगवान विराट हैं और मनुष्‍य को अपना अहंकार त्‍याग कर ही मंदिर में प्रवेश करना चाहिए.

4. आकाशीय बिजली से बचाने वाले : इन गोपुरम को वैज्ञानिक पद्धति से बनाया जाता था. इनमें लगे पत्‍थर और शीर्ष पर लगे धातु के कलश आकाशीय बिजली को अवशोषित कर लेते थे, जिससे आसपास का इलाका सुरक्षित रहता था. 

बिना क्रेन के कैसे बनते थे ऊंचे गोपुरम?  

प्राचीन समय में बिना क्रेन या आधुनिक मशीनों के ऊंचे गोपुरम बनाने के लिए मंदिर से कई किलोमीटर दूर तक लंबा, ढलान वाला रैंप मिट्टी व रेत से बनाया जाता था, फिर हाथी, घोड़ों, मजदूरों की मदद से भारी पत्‍थरों को रस्सियों से बांधकर ऊपर चढ़ाया जाता था. फिर इन पत्‍थरों को सही जगह पर सेट करने के लिए लकड़ी के बड़े लीवर, पुली आदि औजारों, यंत्रों की मदद ली जाती थी.

(Disclaimer: यह जानकारी धार्मिक मान्यताओं और उपलब्‍ध जानकारियों पर आधारित है. Zee News इसकी पुष्टि नहीं करता है.)

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