तमिलनाडु के तिरुचिरापल्ली (त्रिची) जिले में स्थित तिरुवेल्लराई मंदिर इस समय चर्चा में है. 1 हजार साल से ज्यादा पुराने इस मंदिर में 125 फीट ऊंचा राजगोपुरम बन रहा है. कमाल की बात यह है कि इतने ऊंचे गोपुरम को बनाने में क्रेन या अन्य किसी मशीन का इस्तेमाल नहीं हो रहा है. बल्कि कारीगर छैनी-हथौड़े से इसे बना रहे हैं. यह गोपुरम 7 मंजिला ऊंचा होगा. इस मौके पर जानते हैं कि दक्षिण भारत के मंदिरों में गोपुरम का इतना महत्व क्यों है? और बिना क्रेन के इतने ऊंचे गोपुरम कैसे बनाए जाते हैं?
दक्षिण भारत में द्रविड़ शैली में बने मंदिरों के परिसर में एक विशाल, ऊंचा और अलंकृत प्रवेश द्वार होता है. जिस पर देवी-देवताओं, पौराणिक कथाओं की भव्य मूर्तियां गढ़ी जाती हैं. इन प्रवेश द्वारों को गोपुरम कहा जाता है. आमतौर पर गोपुरम काफी ऊंचे होते हैं और इनकी ऊंचाई मंदिर की मुख्य इमारत से ज्यादा होती है. साथ ही वे काफी भव्य होते हैं.
जिस तरह उत्तर भारतीय मंदिरों में मंदिर का शिखर या गुम्बद अहम होती है, वैसी ही द्रविड़ शैली के मंदिरों में गोपुरम का स्थान है. धार्मिक मान्यता है कि गोपुरम के दर्शन करना मंदिर के अंदर विराजमान भगवान के दर्शन करने के समान होता है.
गोपुरम या राजगोपुरम सिर्फ मंदिरों के प्रवेश द्वार नहीं होते हैं, बल्कि ये कई दृष्टि से अहम होते हैं. इन्हें बेहद ऊंचा बनाने के पीछे भी खास वजह है.
1. शक्ति और प्रतिष्ठा के प्रतीक : राजाओं के शासन काल में मंदिर के भव्य गोपुरम वहां के राजा की शक्ति, श्रेष्ठता और आर्थिक क्षमता दर्शाते थे. यह राजा-महाराजाओं के लिए प्रतिष्ठा का विषय होता था कि उनके राज्य के मंदिर के कितने ज्यादा ऊंचे और भव्य हैं.
2. देसी 'GPS' : ये ऊंचे-ऊंचे भव्य गोपुरम 10 से 15 किलोमीटर दूर से ही नजर आ जाते हैं. ऐसे में प्राचीन समय में जब ज्यादा ऊंची इमारतें नहीं हुआ करती थीं, तब गोपुरम दिशा बताने और बड़े लैंड मार्क की तरह काम करते थे. ऐसे में श्रद्धालु या राहगीरों को पता चल जाता था कि निकट ही कोई बड़ा मंदिर या नगर है.
3. धार्मिक आध्यात्मिक महत्व: गोपुरम के दर्शन करना भगवान के दर्शन करने के समान है, ऐसे में दूर के गांव के लोग जो आवागमन के साधनों की कमी के चलते रोज मंदिर नहीं आ पाते थे, वे गोपुरम के दर्शन कर लेते थे. वहीं आध्यात्मिक नजर से देखें तो ऊंचे गोपुरम बताते हैं कि भगवान विराट हैं और मनुष्य को अपना अहंकार त्याग कर ही मंदिर में प्रवेश करना चाहिए.
4. आकाशीय बिजली से बचाने वाले : इन गोपुरम को वैज्ञानिक पद्धति से बनाया जाता था. इनमें लगे पत्थर और शीर्ष पर लगे धातु के कलश आकाशीय बिजली को अवशोषित कर लेते थे, जिससे आसपास का इलाका सुरक्षित रहता था.
प्राचीन समय में बिना क्रेन या आधुनिक मशीनों के ऊंचे गोपुरम बनाने के लिए मंदिर से कई किलोमीटर दूर तक लंबा, ढलान वाला रैंप मिट्टी व रेत से बनाया जाता था, फिर हाथी, घोड़ों, मजदूरों की मदद से भारी पत्थरों को रस्सियों से बांधकर ऊपर चढ़ाया जाता था. फिर इन पत्थरों को सही जगह पर सेट करने के लिए लकड़ी के बड़े लीवर, पुली आदि औजारों, यंत्रों की मदद ली जाती थी.
(Disclaimer: यह जानकारी धार्मिक मान्यताओं और उपलब्ध जानकारियों पर आधारित है. Zee News इसकी पुष्टि नहीं करता है.)