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भारत में कई कमाल के मंदिर हैं जो अपने अनूठे इतिहास के लिए जाने जाते हैं. ऐसे ही एक चमत्कारिक मंदिर का नाम गौतमेश्वर महादेव मंदिर है.
ये मंदिर राजस्थान के प्रतापगढ़ जिले में स्थित है. इस मंदिर को मोक्ष प्रदान करने वाले तीर्थ के रूप में पूजा जाता है. इस मंदिर के चारों ओर घने जंगल हैं.
इस मंदिर की शिखर के ऊपर से एक प्राकृतिक झरना बहता है. जो इस मंदिर को और खूबसूरत बनाती है. जैसा कि हम जानते हैं सनातन धर्म में किसी भी खंडित मूर्ति या शिवलिंग की पूजा करना वर्जित माना जाता है.
लेकिन गौतमेश्वर धाम एकमात्र ऐसा मंदिर है, जहां तीन टुकड़ों में बंटे खंडित शिवलिंग की बहुत ही श्रद्धा से पूजा की जाती है. आज हम इस मंदिर की पूरी जानकारी डिटेल से देंगे.
इस मंदिर के शिवलिंग के तीन भागों में होने का भी अपना इतिहास है. कहा जाता है कि आक्रमणकारी महमूद गजनवी देश के मंदिरों को बर्बाद करता हुआ यहां पहुंचा, तो उसने इस शिवलिंग पर भी प्रहार किया.
उसने जब पहली बार गदा से वार किया तो शिवलिंग से दूध की धार फूट पड़ी. दूसरे वार पर दही की धारा निकली.
लेकिन जैसे ही उसने तीसरी बार शिवलिंग पर हमला किया, उसमें से अचानक लाखों मधुमक्खियों का हमलावर झुंड बाहर निकल आया.
मधुमक्खियों ने गजनवी और उसकी पूरी सेना पर ऐसा हमला बोला कि उन्हें जान बचाकर भागना पड़ा. तभी से इस खंडित शिवलिंग का पूजन जारी है.
गौतमेश्वर महादेव मंदिर को अंचल के आदिवासियों का हरिद्वार भी कहा जाता है. मंदिर परिसर में एक बेहद पवित्र जल कुंड है, जिसे मंदाकिनी कुंड के नाम से पुकारा जाता है.
मान्यता है कि इस कुंड के पानी में डुबकी लगाने से इंसान के जन्मों-जन्मांतर के सारे पाप धुल जाते हैं.
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार सप्तऋषियों में शामिल महर्षि गौतम पर एक बार गौ-हत्या का बड़ा कलंक लग गया था.
इस पाप के प्रायश्चित के लिए ऋषि गौतम ने इसी मंदाकिनी कुंड में स्नान करके भगवान शिव की कठोर तपस्या की थी.
तपस्या से प्रसन्न होकर भोलेनाथ ने उन्हें पाप से मुक्त कर दिया था. इस कुंड का जल कभी नहीं सूखता है.
इस मंदिर की सबसे हैरान करने वाली बात ये है कि यहां लोगों को पाप से मुक्ति पाने का लिखित प्रमाण पत्र दिया जाता है.
परिसर में वहां के आदिवासियों का पुराना न्यायालय काम करता है. कोई भी अगर अपने पाप से मुक्ति पाना चाहता है, तो वो वहां के मंदाकिनी कुंड में स्नान करता है.
जिसके बाद उन्हें मंदिर उन्हें लिखित प्रमाण पत्र दिया जाता है. जिसके लिए मंदिर ट्रस्ट द्वारा करीब 11 रुपये की तय रसीद काटा जाता है.
इस मंदिर में दर्शन करने बस राजस्थान से ही लोग नहीं आते हैं. यहां हर साल वैशाख के महीने में बहुत बड़े मेले का आयोजन किया जाता है.
जिसमें राजस्थान, मध्य प्रदेश, गुजरात और महाराष्ट्र से लाखों लोग दर्शन करने पहुंचते हैं. वहां भक्त मंदाकिनी कुंड में डुबकी लगाते हैं और अपने पापों का प्रायश्चित करते हैं.
नहाने के बाद श्रद्धालु इस कुंड के जल को गंगाजल के समान पवित्र मानकर कांच की बोतलों में भरकर अपने घर ले जाते हैं. ऐसा माना जाता है कि इस जल को घर में रखने से खुशहाली आती है.
(Disclaimer): यह लेख स्थानीय धार्मिक मान्यताओं, पौराणिक कथाओं और मंदिर ट्रस्ट द्वारा दी गई जानकारियों पर आधारित है.