गंगोत्री धाम यात्रा: जानिए किसने बनवाया था ये पावन मंदिर, पास की खूबसूरत जगहें और पहुंचने का आसान रास्ता
गंगोत्री धाम उत्तराखंड का प्रमुख तीर्थ स्थल है. इस खबर में 18वीं सदी में बने इस मंदिर का इतिहास, पास में स्थित हर्षिल और गोमुख जैसी सुंदर जगहें और पहुंचने के पूरे रास्ते के बारे में बताएंगे.
उत्तराखंड की खूबसूरत वादियों में 3,100 मीटर की ऊंचाई पर बसा गंगोत्री धाम देश के सबसे पवित्र तीर्थों में से एक माना जाता है. कहा जाता है चार धाम के यात्रा के दौरान यहां दर्शन करना शुभ होता है. पौराणिक मान्यताओं के माने तो मां गंगा इसी जगह पर सबसे पहली बार उतरी थीं.
कहा जाता है कि राजा भगीरथ की सालों की कठिन तपस्या से खुश होकर मां गंगा पृथ्वी पर प्रकट हुई थीं और उनकी तेज धारा को संभालने के लिए भगवान शिव ने उन्हें अपनी जटाओं में धारण किया था.
चारों तरफ बर्फ से ढके पहाड़ों के बीच बना यह मंदिर श्रद्धालुओं के मन को अपार शांति देता है. आज हम इस मंदिर की पूरी जानकारी डिटेल से देंगे.
किसने बनवाया था ये ऐतिहासिक मंदिर?
गंगोत्री मंदिर से जुड़ा इतिहास काफी पुराना और अनोखा है. इस पावन मंदिर को 18वीं सदी की शुरुआत में गोरखा सेनापति अमर सिंह थापा ने बनवाया था.
इसके बाद जयपुर के राजा ने मंदिर की मरम्मत करवाकर इसे और बड़ा रूप दिया. मंदिर के पास ही भगीरथ शिला नाम का एक पवित्र पत्थर मौजूद है, जहां बैठकर राजा भगीरथ ने भगवान की पूजा की थी.
गंगोत्री से थोड़ा आगे चलने पर गोमुख ग्लेशियर आता है, जिसे गंगा नदी का असली जन्मस्थान माना जाता है. हर साल हजारों भक्त और पहाड़ चढ़ने के शौकीन लोग यहां पहुंचते हैं.
सेब के बागानों वाला हर्षिल गांव और भैरव घाटी के नजारे
गंगोत्री दर्शन के लिए आने वाले लोग आसपास की कई सुंदर जगहों की सैर भी कर सकते हैं. मंदिर के पास ही हर्षिल नाम का एक बेहद शांत और प्यारा गांव है, जो मीठे और रसीले सेब के बागानों के लिए जाना जाता है.
थोड़ी दूर आगे भैरव घाटी है, जहां दो नदियों का मिलन होता है और प्रसिद्ध भैरव नाथ जी का मंदिर बना हुआ है. पास में स्थित पांडव गुफा के बारे में माना जाता है कि यहां पांडवों ने कुछ समय बिताया था.
ठंड के मौसम में भागीरथी नदी का जलस्तर कम होने पर पानी में डूबा हुआ प्राकृतिक शिवलिंग भी दिखाई देता है.
एडवेंचर और ट्रैकिंग के शौकीनों के लिए बेस्ट
अगर आपको पहाड़ों पर पैदल चलना और नई जगहें देखना पसंद है, तो गंगोत्री आपके लिए सबसे बढ़िया जगह है. गंगोत्री से पैदल रास्ता तय करके आप सीधे गोमुख पहुंच सकते हैं, जहां से गंगा जी निकलती हैं.
गोमुख से थोड़ा और ऊपर चढ़ने पर तपोवन नाम का एक बड़ा और हरा-भरा मैदान आता है.
यहां से माउंट शिवलिंग और भागीरथी की ऊंची-ऊंची चोटियां बिल्कुल साफ और बेहद सुंदर दिखाई देती हैं. पहाड़ों के बीच फैला यह इलाका हर किसी का दिल जीत लेता है.
ट्रेन, बस और हेलीकॉप्टर से गंगोत्री पहुंचने की पूरी जानकारी
गंगोत्री जाने के लिए सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन ऋषिकेश, हरिद्वार और देहरादून में हैं. अगर आप कम समय में यात्रा पूरी करना चाहते हैं या हवाई सफर चुनना चाहते हैं, तो देहरादून से हेलीकॉप्टर की सुविधा भी मिल जाती है.
देहरादून हवाई अड्डे या किसी भी नजदीकी रेलवे स्टेशन पर उतरने के बाद आपको गंगोत्री के लिए आसानी से बसें, टैक्सी और प्राइवेट गाड़ियां मिल जाती हैं, जिनसे आगे का पहाड़ी सफर आराम से पूरा किया जा सकता है.
देहरादून, हरिद्वार और ऋषिकेश से सड़क मार्ग का पूरा रूट
सड़क के रास्ते गंगोत्री धाम जाना काफी आसान और सीधा है. अगर आप देहरादून से आ रहे हैं, तो मसूरी, उत्तरकाशी और हरसिल होते हुए गंगोत्री की दूरी करीब 240 किलोमीटर है.
इस सफर में गाड़ियों से लगभग 9 से 10 घंटे लग जाते हैं. वहीं अगर आप हरिद्वार या ऋषिकेश से यात्रा शुरू करते हैं, तो चंबा और उत्तरकाशी वाले रास्ते से होकर जाना पड़ता है.
ऋषिकेश से गंगोत्री 270 किलोमीटर और हरिद्वार से लगभग 290 किलोमीटर दूर है, जहां पहुंचने में 10 से 12 घंटे का समय लगता है.
(Disclaimer): यह लेख पौराणिक कथाओं, स्थानीय मान्यताओं और उत्तराखंड पर्यटन विभाग द्वारा दी गई जानकारियों पर आधारित है. पहाड़ी यात्रा पर निकलने से पहले मौसम की ताजा जानकारी जरूर लें.
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