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रामायण-महाभारत से जुड़ी हैं शस्त्र पूजा की जड़ें: विजयादशमी पर क्यों निभाई जाती है यह परंपरा, क्या है इसका शमी के पेड़ से संबंध?

Vijayadashami shastra Puja 2026: दशहरे पर शस्त्र पूजा की परंपरा बहुत पुरानी है. इस दिन पूरे विधि-विधान और सम्मान भाव के साथ शस्त्रों की पूजा की जाती है. आइए इस लेख में विस्तार से जानें कि आखिर शस्त्र पूजा की परंपरा का क्या महत्व है और इसका रामायण-महाभारत से क्या संबंध है.

Written ByPadma Shree Shubham
Published: Oct 16, 2026, 09:33 AM IST|Updated: Oct 16, 2026, 09:39 AM IST
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रामायण-महाभारत से जुड़ी हैं शस्त्र पूजा की जड़ें: विजयादशमी पर क्यों निभाई जाती है यह परंपरा, क्या है इसका शमी के पेड़ से संबंध?

About the Author

Padma Shree Shubham

Padma Shree Shubham

पद्मा श्री शुभम् को पत्रकारिता के क्षेत्र में 10 साल का अनुभव. मॉस कम्‍युनिकेशन ग्रेजुएट और हिंदी लिटरेचर से पोस्‍ट ग्रेजुएट. मीडिया में डिजिटल प्लेटफॉर्म से करियर शुरू करने के बाद कई संस्थाओं में काम किया. Nedrick News, TFI Post जैसी संस्थाओं में कार्यरत रहीं. इसके बाद Zee News जॉइन किया. समाचार और वर्तमान घटनाओं पर लिखने पढ़ने में रुचि. धर्म और ज्योतिष में अधिक रुचि. वर्तमान में धर्म और ज्योतिष संबंधी लेख लिखने में कार्यरत. पद्मा से आप padma.shubham@India.com मेल के जरिए सीधे संपर्क कर सकते हैं.
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दशहरा केवल पर्व नहीं बल्कि यह एक ऐसा उत्सव है जो बताता है कि युग चाहे कोई भी हो बुराई पर अच्छाई की जीत होगी और धर्म हमेशा अधर्म को हराया जाएगा. विजयादशमी विजय पर्व है, एक तरफ भगवान श्रीराम ने रावण का वध करके जीत हासिल की तो वहीं दूसरी तरफ मां दुर्गा ने महिषासुर का वध करके धरती से बुराई का अंत किया. जहां तक विजयादशमी पर शस्त्र पूजा की परंपरा को निभाने की बात करें तो ऐसा पुराने समय से चला आ रहा है कि इस शुभ मौके पर अस्त्र-शस्त्रों को साफ कर उसकी विधि-विधान से पूजा की जाती है. आइए इस लेख में विस्तार से जानें कि दशहरे पर शस्त्र पूजन क्यों करते हैं और इसके पीछे की धार्मिक मान्यताएं क्या हैं. साथ ही ये भी जानेंगे कि किस तरह शस्त्र पूजा की जड़ें रामायण से लेकर महाभारत तक से जुड़ी हैं?

शस्त्र पूजा का धार्मिक महत्व और संदेश

हिंदू धर्म में शस्त्र पूजा का बड़ा महत्व हैं. शस्त्र पूजा करने के पीछे की भावना ये होती है कि शस्त्रों और शक्ति का उपयोग हमेशा ही धर्म, न्याय के साथ ही आत्मरक्षण और दूसरों की रक्षा के लिए करना चाहिए. वहीं, दूसरी ओर हिंदू परंपरा में शस्त्र शक्ति, साहस, आत्मरक्षा का प्रतीक है जो बताता है कि अपने भीतर की क्षमता और शक्ति का हमेशा सदुपयोग ही करना चाहिए. शस्त्र पूजा हमें संदेश देता है कि हथियार हों या रोज इस्तेमाल में लाए जानें वाले उपकरण, इन्हें हमेशा अनुशासन, सावधानी और सही उद्देश्य के लिए काम में लाना चाहिए. काम के साधनों के प्रति सम्मान और कृतज्ञता रखनी चाहिए. शस्त्र पूजन की परंपरा हमें बताती है कि कोई भी जीत तभी सार्थक है जब उसका उद्देश्य न्याय, धर्म की रक्षा और शांति स्थापित करना हो.

रामायण से शस्त्र पूजा का संबंध

विजयदशमी के दिन शस्त्र पूजा क्यों होती है, इसे लेकर कई धार्मिक मान्यताएं हैं. इसी तरह दशहरे पर शस्त्र पूजन का संबंध रामायण काल में हुए श्रीराम-रावण युद्ध से भी जोड़ा जाता है. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, राम जी ने अपनी सेना के साथ जब लंका पर चढ़ाई की और युद्ध के मैदान में उतरें तो उससे पहले शक्ति पूजा की और शस्त्र पूजा की. अंत में राम जी ने रावण का वध कर अधर्म का नाश किया.

महाभारत से जुड़ी है शस्त्र पूजा की परंपरा

शस्त्र पूजा से संबंधित एक मान्यता महाभारत से भी जुड़ी है. पौराणिक कथा व परंपरा के अनुसार, जब पांडव अपने अज्ञातवास में थे तब उन्होंने अपने अस्त्र-शस्त्र को शमी के पेड़ में छिपाकर रख दिया था. वहीं, जब पांडवों का पता लगाने के लिए विराट नगर को कौरवों ने युद्ध के लिए ललकार तब अर्जुन अपना गांडीव उसी समी के पेड़ से उतारने गए. तब उन्होंने अपने गांडीव की पूजा तो की ही इसके साथ ही उन्होंने समी के पेड़ की भी पूजा की. इसके बाद उन्होंने राजा विराट की सहायता करते हुए कौरवों की सेना युद्ध कर उन्हें हरा दिया. इस प्रसंग को विजयादशमी से जोड़ते हुए इस दिन शमी वृक्ष की पूजा की जाती है और शस्त्र पूजा की परंपरा को निभाई जाती है.

शस्त्र पूजा कैसे की जाती है?

शस्त्र पूजा की विधि हर जगह अलग-अलग है, कई बार यह परिवारिक परंपरा के अनुसार भी की जाती है. सामान्य तरीके की बात करें तो सबसे पहले शस्त्रों को इकट्ठा किया जाता है, उन्हें साफ किया जाता है और फिर उन पर गंगाजल छिड़का जाता है. शस्त्रों को हल्दी व कुमकुम का तिलक लगाया जाता है. इसके बाद शमी के पत्तों को शस्त्रों पर चढ़ाया जाता है. शस्त्रों के सामने दीपक जलाया जाता है. शस्त्र पूजा में नाबिलग बच्चों का उपस्थित होना वर्जित होता है. दक्षिण भारत में आयुध पूजा के मौके पर कामकाज के साधनों के लिए सम्मान व्यक्त किया जाता है और उनकी पूजा की जाती है. कई जगह पर ये भी परंपरा है कि पूरे 9 दिन की शक्ति पूजा के बाद दसवें दिन माता चंद्रिका का स्मरण कर शस्त्र पूजा की जाती है. इस पूजा के साथ ही मन ही मन माता से कामना की जाती है कि जीवन के हर क्षेत्र में जीत मिले. विजयादशमी पर मां भवानी और माता काली की उपासना कर शस्त्र पूजन करने की पंरपरा है.

(Disclaimer: यहां दी गई जानकारी धार्मिक मान्यताओं, पौराणिक ग्रंथों और लोक परंपराओं पर आधारित है, इसका वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। पाठक विवेक और श्रद्धा से निर्णय लें।) 

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