Durga Puja 2026: कल से शुरू हो रहा है दुर्गा पूजा का भव्य उत्सव, क्या है इन 5 दिनों के पूजा का क्रम और इसकी परंपरा?
Durga Puja 2026 Kab Se kab Tak: बंगाली समाज में दुर्गा पूजा केवल पर्व नहीं बल्कि एक ऐसा उत्सव है जिसमें बेटी यानी मां दुर्गा का मायके में आगमन होता है. मां दुर्गा का भव्य स्वागत कर भक्त उसकी उपासना करते हैं, नृत्य करते हैं और पारंपरिक अनुष्ठान किया जाता है.
इस साल शारदीय नवरात्र 12 अक्टूबर से शुरू हुआ लेकिन बंगाली समाज में होने वाली दुर्गा पूजा की शुरुआत 16 अक्टूबर को होगा और 21 अक्टूबर तक चलेगा. बंगाली दुर्गा पूजा में घर आई बेटी के रूप में मां का स्वागत करने का विधान है. दुर्गा पूजा को मां के मायके आने के उत्सव के रूप में मनाया जाता है. पूरे आदर और उत्साह के साथ बच्चे मां दुर्गा को आमंत्रण देते हैं और 4 दिन तक उत्सव मनाते हैं. हालांकि इस साल करीब 10 साल बाद ऐसा शुभ संयोग हुआ है जब यह उत्सव 5 दिन तक मनाया जाएगा. क्योंकि इस साल सप्तमी तिथि दो दिन है. आइए जानें इस पावन पर्व और पूरे कार्यक्रम के बारे में विस्तार से जानें.
तिथि और पूजा का क्रम
षष्ठी तिथि से ही बंगाली दुर्गा पूजा की शुरुआत होगी. षष्ठी तिथि का आरंभ 16 अक्टूबर 2026 को दोपहर के 03:25 बजे से होगा और तिथि का समापन समय 17 अक्टूबर 2026 को सुबह के 05:54 बजे होगा.
16 अक्टूबर 2026 को षष्ठी तिथि पर कल्पारंभ किया जाता है. देवी का बोधन, अधिवास और माता के आमंत्रण करने का दिन होता है.
17 और 18 अक्टूबर को सप्तमी तिथि पर नवपत्रिका स्नान कराया जाएगा और माता का प्राण-प्रतिष्ठा का दिन होगा.
19 अक्टूबर अष्टमी तिथि पर पुष्पांजलि की जाएगी और संधि पूजा की जाएगी जिसमें 108 दीये प्रज्वलित किए जाएंगे.
20 अक्टूबर नवमी तिथि पर ढाक की थाप बताई जाएगी और महिलाओं द्वारा धुनुची नृत्य किया जाएगा.
21 अक्टूबर दशमी तिथि पर महिलाओं द्वारा सिंदूर खेला जाएगा और माता की प्रतिमा का विसर्जन किया जाएगा.
बंगाली नवरात्रि उत्सव की अनोखी परंपराएँ
कल्पारंभ अनुष्ठान
दुर्गा पूजा का पहला दिन कल्पारंभ अनुष्ठान का होता है जिसमें सुबह घट स्थापना और संकल्प कर आगे के दिनों में विधि-विधान से मां की पूजा की जाती है. इसे नवपत्रिका पूजा या कोलाबोऊ पूजा से एक दिन पहले करते हैं. मां दुर्गा को बेल के पेड़ या कलश में पधारने के लिए उनको आमंत्रित करने का विधान है.
बेल के पेड़ से माता को निमंत्रण
षष्ठी तिथि की शाम को ही निमंत्रण की परंपरा है. धार्मिक मान्यता है कि मां बेल के पेड़ की शाखाओं में वास करती हैं. ऐसे में उन्हें बेल के पेड़ के पास जाकर अगले दिन यानी महासप्तमी तिथि पर पूजा के लिए आमंत्रण दिया जाता है. हालांकि इस साल षष्ठी तिथि शाम के पहले ही खत्म हो जाएगी. ऐसे में पंचमी तिथि की शाम को भी इस परंपरा को निभाया जा सकेगा.
अधिवास की परंपरा
सूर्यास्त से करीब 2 घंटे 24 मिनट पहले बेल के पेड़ की पूजा की जाएगी और उसमें मां दुर्गा का प्रतीकात्मक वास करवाया जाएगा जिसे
अकाल बोधन
धार्मिक मान्यता है कि दक्षिणायन के समय देवता सोए रहते हैं, ऐसे में शाम के समय मां को प्रार्थना करके जगाया जाएगा. इसके लिए बेल वृक्ष के नीचे कलश को स्थापित कर 'अकाल बोधन' किया जाएगा यानी माता का असामयिक आह्वान.
नवपत्रिका पूजा की परंपरा
महासप्तमी के दिन नवपत्रिका पूजा की जाती है जिसमें नौ तरह के पौधों से बनी 'नवपत्रिका' को स्नान कराया जाएगा और देवी कालरात्रि की उपासना कर निशा पूजा को संपन्न किया जाएगा.
दो तिथियों का संधि पूजा
महाष्टमी के अंत के 24 मिनट से लेकर महानवमी की शुरुआत के 24 मिनट के समय में यानी कुल 48 मिनट के समय को 'संधिकाल' कहा गया है जिसमें मिट्टी के 108 दीपक जलाकर उत्सव मनाया जाता है.
ढाक की थाप और धुनुची नृत्य की परंपरा
ढाक एक विशाल पारंपरिक ढोल को इस दिन बजाने का विधान है. इस ढाक को एक विशेष लय के साथ बजाया जाता है तो उसकी गूंज से पूरा पंडाल सकारात्मकता से भर जाता है और उत्सव में चार चांद लग जाता है. शाम की आरती के समय धुनुची में यानी मिट्टी के एक पात्र में नारियल के छिलके को जलाया जाता है. इसमें कपूर और धुना जलाकर मां की उपासना की जाती है और महिलाएं भक्तिमय नृत्य करती हैं. इस दिन धुनुची लेकर ढोल की ताल पर नृत्य किया जाता है.
(डिस्क्लेमर- यह सामग्री धार्मिक मान्यताओं, प्रचलित परंपराओं एवं उपलब्ध धार्मिक स्रोतों पर आधारित है. विभिन्न क्षेत्रों, समुदायों और परंपराओं के अनुसार व्रत-त्योहारों की तिथि, पूजा-विधि एवं मान्यताओं में अंतर संभव है. पाठक इसे सामान्य धार्मिक जानकारी के रूप में देखें.)
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