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400 साल पुराने मंदिर का रहस्य... सूर्यास्त के बाद खुद जंगल में घूमती हैं देवी; जानिए बिहटा के 'वन देवी मंदिर' का सच

इस खबर में हम बिहार के बिहटा में स्थित 400 साल पुराने वन देवी मंदिर रहस्य के बारे में जानेंगे. साथ ही क्यों सूर्यास्त के बाद यहां रुकना मना है और बॉलीवुड फिल्म द वान से इसका क्या कनेक्शन है ये भी बताएंगे.

Written ByHarsh Singh
Published: Oct 10, 2026, 08:26 PM IST|Updated: Oct 10, 2026, 08:30 PM IST
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400 साल पुराने मंदिर का रहस्य... सूर्यास्त के बाद खुद जंगल में घूमती हैं देवी; जानिए बिहटा के 'वन देवी मंदिर' का सच

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    Harsh Singh

    Harsh Singh

    हर्ष सिंह जी न्यूज डिजिटल में एक अनुभवी और धारदार शैली के पत्रकार हैं. उन्होंने मार्च 2024 में जी न्यूज जॉइन किया था. वर्तमान में हर्ष धर्म और ज्योतिष से जुड़ी खबरों की खास कवरेज कर रहे हैं. वे देश-दुनिया के धार्मिक आयोजनों, अध्यात्म और ज्योतिषीय गणनाओं से जुड़े जरूरी अपडेट्स दर्शकों तक पूरी सटीकता के साथ पहुंचाते हैं. हर्ष को उनकी फैक्ट-आधारित और भरोसेमंद लेखन शैली के लिए जाना जाता है.बनारस के महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ से मास कम्युनिकेशन में पोस्ट-ग्रेजुएशन करने वाले हर्ष अपनी पूरी ऊर्जा और समझ के साथ धर्म-कर्म और ऐस्ट्रो की दुनिया के खबरों को सरल भाषा में पाठकों तक पहुंचा रहे हैं.अगर आप हर्ष सिंह से संपर्क करना चाहते हैं या उनसे जुड़ा कोई सुझाव साझा करना चाहते हैं, तो उन्हें इस ईमेल आईडी पर लिख सकते हैं: Harsh.singh@India.com
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    बिहार की राजधानी पटना के पास बिहटा का वन देवी मंदिर इन दिनों अपनी 400 साल पुरानी मान्यताओं को लेकर हमेशा चर्चा रहती है.

    घने जंगलों के बीच बसा ये पावन धाम केवल श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र नहीं है, बल्कि अब बॉलीवुड सिनेमा की वजह से भी पर्यटकों के आकर्षण का बड़ा केंद्र बन गया है.

    कहा जा रहा है कि सिद्धार्थ मल्होत्रा और तमन्ना भाटिया की फिल्म द वान की कहानी इसी मंदिर से प्रेरित है.

    घने जंगलों के बीच स्थित ये मंदिर अपनी कई अनोखी परंपराओं के लिए दूर-दूर तक जाना जाता है.

    जंगल के बीच विराजित हैं मां वन देवी

    ये मंदिर पटना से लगभग 35 किलोमीटर दूर बिहटा के पास अमहरा, राघोपुर और कंचनपुर गांवों की सीमाओं पर स्थित है.

    ये कोई बहुत बड़ा भव्य मंदिर नहीं है, बल्कि एक छोटा और बेहद खास पवित्र स्थान है. स्थानीय लोक मान्यताओं के मुताबिक वन देवी को पूरे जंगल और वहां रहने वाले जीव-जंतुओं की रक्षक माना जाता है.

    मंदिर के भीतर माता की कोई मूर्ति स्थापित नहीं है. यहां भक्त माता रानी की पूजा एक पवित्र पिंड के रूप में करते हैं.

    सूर्यास्त के बाद पसड़ जाता है सन्नाटा

    इस मंदिर से जुड़ा सबसे बड़ा रहस्य यहां की शाम की परंपरा है. सूरज ढलते ही मंदिर के कपाट पूरी तरह बंद कर दिए जाते हैं.

    शाम के बाद मंदिर परिसर या आसपास के जंगल में किसी भी व्यक्ति के रुकने की सख्त मनाही है. स्थानीय लोगों का मानना है कि रात के समय वन देवी खुद पूरे जंगल में भ्रमण करती हैं.

    इसी खौफ और आस्था के कारण रात में कोई भी इंसान उस इलाके में जाने की हिम्मत नहीं करता. फिल्म की कहानी भी इसी अलौकिक रहस्य पर बनी है.

    मिर्जापुर से जुड़ी है स्थापना की कथा

    मंदिर की स्थापना को लेकर क्षेत्र में एक बहुत ही पुरानी कथा प्रचलित है. बहुत साल पहले इस इलाके के निवासी विद्यानंद मिश्रा मां विंध्यवासिनी के बहुत बड़े भक्त थे.

    वे अक्सर दर्शन के लिए उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जाया करते थे. जब बुढ़ापे के कारण उनका लंबा सफर तय करना मुश्किल हो गया, तब मां विंध्यवासिनी ने उन्हें सपने में दर्शन दिए.

    माता ने उन्हें अपने पवित्र पिंड का एक अंश स्थानीय जंगल में स्थापित करने का निर्देश दिया. इसके बाद यहाँ पिंड की स्थापना की गई.

    तीन गांवों की सीमा पर हुई स्थापना

    मां विंध्यवासिनी के आदेश का पालन करते हुए अमहरा, राघोपुर और कंचनपुर गांव की सीमा पर इस पावन पिंड को स्थापित किया गया.

    जिस समय यह स्थापना हुई, उस दौर में यह पूरा इलाका काफी घने जंगलों से घिरा हुआ था. चारों तरफ घने पेड़ और सन्नाटा होने के कारण स्थानीय लोग माता को वन देवी के नाम से पुकारने लगे.

    समय बीतने के साथ-साथ इस जगह की महिमा बढ़ती गई और आज यह लाखों लोगों की आस्था का एक अटूट केंद्र बन चुका है.

    बॉलीवुड कनेक्शन से बढ़ी लोकप्रियता

    रिपोर्ट्स के अनुसार इस फिल्म की शुरुआत करने से पहले मेकर्स ने खुद इस मंदिर में आकर माथा टेका था.

    उन्होंने स्थानीय लोगों और ग्रामीणों से मिलकर मंदिर के इतिहास और कहानियों को अच्छी तरह समझा.

    बॉलीवुड फिल्म की आधिकारिक घोषणा होने के बाद से ही इस गुमनाम मंदिर की प्रसिद्धि अचानक बहुत बढ़ गई है.

    अब हर दिन सैकड़ों की संख्या में श्रद्धालु और पर्यटक इस रहस्यमयी मंदिर के दर्शन करने और इसकी अलौकिक ऊर्जा को महसूस करने पहुंच रहे हैं.

    (Disclaimer): यह लेख स्थानीय लोक मान्यताओं, पारंपरिक कथाओं और सार्वजनिक मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है. इसका उद्देश्य पाठकों को सांस्कृतिक और धार्मिक धरोहरों की जानकारी देना है.

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